मेरे जीवन की एक सत्य घटना ''वीरभद्र'' के दर्शन !
बात उन दिनों की है जब बड़े भाई भूपेन्द्र सिंह नयाल के दिए वचन की मर्यादा रखने हमें बनना पड़ा दो महीने तक सन्यासी ( जोगी )।
काशी के पास ही रामनगर के सद्गृहस्थ संत पण्डित सचिदानन्द मिश्र जी महाराज शिव महापुराण, देवी भागवत के मर्मग्य एवं परम भगवताचार्य दो महीने के लिए चातुर्मास हेतु पहाड़ में तपस्या करने का मन बना लिए। महाराज जी का परिवार राम नगर के राजा जी का पुरोहित भी है। महाराज जी जब पहली बार हमारे गावं तिलोरा जिला अल्मोड़ा आये तो उन दिनों शिवरात्रि के अवसर पर फरवरी का महिना चाल रहा था। बड़ी भारी ठण्ड थी, भगवत कृपा से उन दिनों बर्फ भी गिर गई, महाराज जी अपने साथ 6 काशी के गण और भी लाये हुए थे। जिनमे डाक्टर साहब के आलावा प्रसिद्द तबला बादक अशोक पाण्डेय के दो सुपुत्र भजन गायक जय पाण्डेय और उनके छोटे भाई तबला बादक श्री पाण्डेय, सितार वादक सुखदेव भाई भी थे। जो इस यात्रा में काफी आनंदित भी हुए और परेशान भी।आन्दित इसलिए बर्फ का आनन्द लिए परेशान इसलिए ठण्ड में बीमार पड गए।महाराज जी को हमने अपनी वैकुण्ठ वासी माता जी के नाम पर बनाये गए श्रीमती मोहिनी देवी धर्मार्थ सत्संग भवन ( दाणिम खोला ) का उद्घाटन हेतु आमंत्रित किया था।महाराज जी उद्घाटन के बाद भी दो दिन तक वही रहे।क्योकि वही हमारे पिता जी द्वारा और बाद में हम भाइयों द्वारा जीर्णोधार किया शिव मंदीर में हमारे परिवार की ओर से ११ दिवसीय शिव-महापुराण का भव्य आयोजन रखा गया था। जिसमे व्यास पीठ हेतु पंडित सतीश लोहिनी जी ( भाई जी ) हल्द्वानी वाले और उनके विद्द्वान साथी ब्राहमण देवता आमंत्रित थे। उन दिनों मेरे बड़े भाई भूपेन्द्र सिंह जी महाराज जी की सेवा में रहे और प्रभावित होकर वचन दे बैठे की जब भी आप अगली बार आयेंगे मैं आपकी सेवा में रहूँगा। महाराज जी बोले मैं दो महीने यहाँ चातुर्मास में आऊंगा और तुम्हें पेंट-सर्ट छोड़ धोती पहन कर मेरी सेवा में रहना होगा सर मुड़ना पड़ेगा। भाई धार्मिक तो पहले से ही बहुत थे ही, सेवा ही उनका सबसे बड़ा धर्म था।पिता जी द्वारा आयोजित यज्ञं कर्म हो या भाई के जीवित रहते तक मेरे द्वारा आयोजित कथा-यज्ञं सब भाई के सेवा भाव के भरोशे से ही मेरे परिवार के द्वारा होते थे। भाई काशी के महाराज को जबान दे बैठे हां सब आपके अनुसार ही सेवा करूँगा। पर जब चातुर्मास आया लगभग 6 से 7 महीने बाद तब तक भाई वैकुण्ठ वासी हो गए। यह बात महाराज जी को भी मालूम नहीं और भाई जी द्वारा दी जुबान के बारे में मुझे भी मालूम नहीं था। अचानक महाराज जी का हैदराबाद में हमें फोन आया बोले नयाल जी हम अगले महीने आ रहे है दाणिम खोला, सत्संग भवन की सफाई करने को बोलना अपने भाई को और दो महीने के लिए ग्रहस्थ त्याग सेवा में रहने को बोलना। हम बोले महाराज भाई तो रहे नहीं अब क्या होगा ? महाराज जी बोले आपको सेवा देनी होगी अपने भाई की जुबान की मर्यादा रखनी है तो ! हम बोले महाराज हम ठाकुरों के पास जुबान के आलावा और कुछ है भी नहीं,मेरे भाई ने जुबान दी( वचन वद्द है ) है तो हम जरूर आपकी सेवा में रहेंगे। तब हमने अपना परिवार को राम जी के भरोशे छोड़कर और व्यापर को भगवती माँ के भरोशे छोड़ 2 महिना तक सर मुड़ाकर सेवा दी, वस्त्र धोती कुर्ता और एक गमछा धारण कर लिया । आखिर महाराज जी प्रसन्न होकर खूब सारा आशीर्वाद देकर काशी को गए। और आज तक समय-समय पर आशीर्वाद देते रहते है।उन दिनों एक विचित्र घटना घटी हम महाराज जी को साथ लेकर बागेश्वर धाम की यात्रा में जा रहे थे। कोट- भ्रामरी मंदीर में एक शाम वहां के पुजारी पप्पू तिवारी के अनुरोध पर मंदीर में ही रूक गए।रात महाराज जी की पुजारी जी ने खूब सेवा की और वहां का पूरा महात्म बताया, आधी रात तक सत्संग चलता रहा आखिर माँ के श्री चरणों में ही उस रात सो गए। दुसरे दिन जब निकल रहे थे सुबह में भारी बर्षा होने लगी पप्पू तिवारी जी बोले महाराज माँ बाण वर्षा कर रही है आप लोगो को नहीं जाने देना चाहती कुछ सत्संग और होना चाहिए। हम तपाक से बोले सत्संग करने ही तो महाराज जी काशी रामनगर से आये है। कुछ अधिक दिनों तक सत्संग चलता रहे येसी कुछ योजना बनाओं।पप्पू तिवारी जी बोले महाराज जी आप यहाँ देवी भागवत कथा कर दीजिये मैं सभी स्थानीय भक्तों को खबर कर लूँगा। महाराज जी एक हप्ते का समय देकर वहां से निकल गये अगले शुक्रवार से माँ को उनकी ही कथा सुनायेंगे कह कर चल दिए इस बीच उस पुरे इलाके में हम दोनों गुरु-चेले घुमते रहे। और सत्संग करते रहे। कुछ माताएं कहती थी ये दोनों सुन्दर नवजवान साधू क्यों जोगी बने होंगे ?महाराज जी बोलते माता जी हम जोगी नहीं है बस कुछ दिनों का व्रत लिया है धर्म प्रचार और शरीर साधना का। अब शुक्रवार आया तो हम अपनी गाडी से महाराज जी को लेकर पहुच गए कोट भ्रामरी मंदिर में। वहाँ थोड़ी तैयारी दिख तो रही थी पर इतनी सी की बस काम चल जाय।मैंने खुद ही व्यास पीठ सजा दी और माइक पर महाराज जी के बारे में बताना सुरु किया। जो साज सज्जा का सामान अपने सत्संग भवन से लाये थे उसी से काम चलाना सुरु किया। उस क्षेत्र में मेरा ससुराल था सास ससुर जी को मुख्य यजमान बना कर कथा में बिठा दिया। पहले दिन 70- 80 लोग पहुचे कथा भी सुनी और दुसरे दिन अधिक लोगो को लाने की प्रतिज्ञा करके चले गया। सच में अगले दिन 3 गुना अधिक जनता जनार्दन और कई स्थानीय निवासियों की ओर से आटा- तेल-गुड आने लगा। आखिर दिन आते- आते 40 टिन तेल और बहुत सारे बोर आटा जमा हो गया। आखिर दिन लगभग 5 हजार से अधिक भक्तों ने माँ का भण्डारा का भोजन पाया। हमसे हर वर्ष येसा ही आयोजन करने का अनुरोध किया। उस स्थान से मेरा गावं लगभग 50 किलोमीटर पर था मुझसे अत्यधिक प्रेम रखने वाले मेरा पूरा गावँ (तिलोरा ) आया कलश यात्रा लेकर मैंने बस की व्यवथा करा दी थी अपने ग्राम वासियों हेतु, मेरी दसा देख सब माताएं खूब प्यार से मेरे माथे पर हाथ भी फिरती और यह ताकीर देती जोगी मत बनना है। मेरी पत्नी को जब मेरी दसा के बारे में मालूम पड़ा तो उसने खाना-पीना छोड़ दिया। पर मैं संकल्पित था उनको दो महीने तक फोन से बात भी नहीं की।
उस सब बातो में एक बात जो सबसे चौकाने वाली थी जो अब बताने जा रहा हूँ मैं !
देवी भक्त वीरभद्र के दर्शन !
जब दुसरे दिन की देवी भागवत की कथा सुरु हुई मुझे लगा एक ब्राहमण देवता जो बिलकुल पीछे बैठे है उनके पास एक फटा सा झोली है उसमे से चिमटा निकाल कर, बजा- बजा कर कथा सुन कम रहे है, और गा ज्यादा रहे है। कथा के बाद वही ब्राहमण देवता पुरे नग्न अवस्था में जहाँ कुछ देर भैसे नहा रही थी उस कीचड़ से भरे तालाब में नहाये फिर कपडे पहन कर ऊपर हमारे पास में ही कुछ दुरी पर बैठ कर चिमटा बजा-बजा भजन करने लगे।और जब शाम में सबका भोजन चल रहा था कुछ माताएं बहनें भी भोजन हेतु बैठी थी। वे वीर भद्र पूरी तरह से निर्वस्त्र नग्न अवस्था में आये और भोजन करने लगे। इस समय कुछ खलबली भी मची कुछ माताएं उसको गाली देते हुए वहाँ से भागने लगी।पर वह मस्ती से भोजन किया अंत में हाथ धोकर कपडे पहना और फिर से चिमटा बजाते हुए भजन करने लगा। यह सब अटपटा मुझे और महाराज जी को भी लगा पर हम अंजान मार रहे थे, पर कही मन में उथल-पुथल तो थी उसके व्योहार से।रात को एक भक्त आया बोला नयाल जी वह पागल नंगा सोया है देखो मैं कौतुहल बस देखने गया सच में उस विचित्र प्राणी ने ठण्ड काफी थी फिर भी पुरे वस्त्र उतार कर सिराने रखे थे और निर्वस्त्र सोया था दिगंबर महात्माओं की तरह। सुबह वह कब जागा कब भागा हमें नहीं मालूम पर जब दोपहर को आया तो सब चौक गए उसके पास दो थैले लगभग 6 -7 किलो के चावल एवं आटा था। जो वह वहां कथा में सहयोग हेतु गावं-गावं भिक्षाटन करके लाया था। वह महाराज जी एवं हमारे मध्य रख कर बोला कल फिर लाऊंगा। हम सब सन्न रह गए। तभी महाराज जी के मुह से निकला ''वीरभद्र'' अब कुछ मत लाना समय पर आके कथा सुना करों तुम्हारी माँ प्रसन्न होगी । पर वह वैसे ही अगले 6 दिन तक थोडा-थोडा चावल आटा लाता रहा और नित्य नग्न अवस्था में भैसों के तालाब में नहाता, नग्न होकर भोजन करता, नग्न ही रात को ठण्ड में सोता। और जब तक हमने उस क्षेत्र में 4 कथाएं की विभिन्न स्थानों पर हर जगह वह दिखता पर रात को नहीं दिखता था।केवल माँ के दरवार में ही वह रात्रि हम लोगो के साथ रहा। उस क्षेत्र के सभी लोग उसे पागल बामन कहते थे। पर हमें उसमे सच में कुछ और दिखता था।उसके बाद भी कई बार उस क्षेत्र में गया हूँ पर अब उस वीरभद्र के दुबारा दर्शन नहीं होते।फिर एक बार उसे देखने को बार-बार मन लगन लगाये हुए है। ''नयाल सनातनी''