Sunday, March 1, 2015

सनातनी विचार !
एक समय की बात है एक महा शमशान में एक ''चाण्डालिनी'' एक मुर्दे को जलाने का अपना नित्य कर्म कर रही थी। उसी समय उस ओर से एक साधू -महात्मा निकले उन्हें यह देखा बड़ा अचरज हुआ कि वह ''चाण्डालनी'' शमशान की जलती अग्नि से ही लकड़ियाँ निकाल पास में ही बने एक चूल्हा जला दी उस चूल्हे पर उस चाण्डालनी ने अपने भोजन हेतु कुत्ते की खोपड़ी में कव्वे का माँस पकाने को रख दिया और उसको ऊपर से शमशान के ही एक पत्थर से ढक दिया। महात्मा से यह द्रश्य देख रहा न गया पूछ बैठे !  ऐ  ''चाण्डालनी'' तू इतना निकृष्ठ-नीच कर्म कर ही रही है कुत्ते की खोपड़ी में कव्वे का मांस पका रही है वह भी शमशान भूमि में शमशान की अग्नि से उसके बाद भी इस मांस को ढका क्यों है ?
चाण्डालनी बोली ! साधू बाबा कही किसी गौचर भूमि को कब्ज़ा करने वाले नीच की नजर इस मांस पर पड़ कर यह मांस अपवित्र ना हो जाय इसलिए यह कव्वे का मांस ढका हुआ है। दुनिया में सबसे नीच कर्म है गौवंश का हक़ खाना और गौचर भूमि में कब्ज़ा करना जो आजकल बहुत सारे उच्च पदों में बैठे लोग ही कर रहे है धिक्कार ।           ''नयाल सनातनी'' 

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