सनातनी विचार !
महात्मा गांधी की दृष्टि में गौ रक्षा का महत्व
गाय
भारतीय संस्कृति का मूल आधार है। हमारे देश का संपूर्ण राष्टजीवन गाय पर
आश्रित है। गौमाता सुखी होने से राष्ट सुखी होगा और गौ माता दुखी होने से
राष्ट के प्रति विपत्तियां आयेंगी, ऐसा माना जा सकता है।
गाय
को आज व्यावहारिक उपयोगिता के पैमाने पर मापा जा रहा है किंतु यह ध्यान
रखना आवश्यक है कि आधुनिक विज्ञान की सीमाएं हैं। आज का विज्ञान गाय की
सूक्ष्म व परमोत्कृष्ट उपयोगिता के विषय में सोच भी नहीं सकता। भारतीय
साधु, संत तथा मनीषियों को अपनी साधना के बल पर गाय की इन सूक्ष्म
उपयोगिताओं के बारे में ज्ञान प्राप्त किया था। इसलिए ही उन्होंने गाय को
गौमाता कहा था। भारतीय शास्त्रों में गौ महात्म्य के विषय में अनेक कथाएं
मिलती हैं।
गाय
का सांस्कृतिक व आर्थिक महत्व है। संक्षेप में कहा जाए तो भारतीय ग्रामीण
अर्थ व्यवस्था का आधार गाय ही है। गाय के बिना भारत की ग्रामीण
अर्थव्यवस्था की कल्पना तक नहीं की जा सकती।
महात्मा
गांधी एक मनीषी थे। वह भारतीयता के प्रबल पक्षधर थे। उनका स्पष्ट मत था कि
भारत को पश्चिम का अनुकरण नहीं करना चाहिए। भारत को अपनी संस्कृति. विरासत
व मूल्यों के आधार पर विकास की राह पर आगे बढना चाहिए। गांधी जी ने अपनी
प्रसिद्ध पुस्तक हिन्द स्वराज में लिखा है – अंग्रेजों के विकास माडल को
अपनाने से भारत, भारत नहीं रह जाएगा और भारत सच्चा इंगलिस्तान बन जाएगा।
गांधी
जी का यह स्पष्ट मानना था कि देश में ग्राम आधारित विकास होने की आवश्यकता
है। ग्राम आधारित विकास के लिए भारत जैसे देश में गाय का कितना महत्व है,
उनको इस बात का अंदाजा था। गांधी जी ने गौ रक्षा को हिन्दू धर्म का
केन्द्रीय तत्व कहा है। गांधी जी कहते थे कि जो हिन्दू गौ रक्षा के लिए
जितना अधिक तत्पर है वह उतना ही श्रेष्ठ हिन्दू है। गौरक्षा के लिए गांधी
जी किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार थे।
महात्मा
गांधी ने गाय को अवमानवीय सृष्टि का पवित्रतम रुप बताया है। उनका मानना था
कि गौ रक्षा का वास्तविक अर्थ है ईश्वर की समस्त मूक सृष्टि की रक्षा।
उन्होंने 1921 में यंग इंडिया पत्रिका में लिखा “ गाय करुणा का काव्य है।
यह सौम्य पशु मूर्तिमान करुणा है। वह करोड़ों भारतीयों की मां है। गौ रक्षा
का अर्थ है ईश्वर की समस्त मूक सृष्टि की रक्षा। प्राचीन ऋषि ने, वह जो भी
रहा हो, आरंभ गाय से किया। सृष्टि के निम्नतम प्राणियों की रक्षा का
प्रश्न और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ईश्वर ने उन्हें वाणी नहीं दी है। ” (
यंग इंडिया, 6-11-1921)
गांधी
जी ने अत्यंत मार्मिक शब्दों में लिखा – “ गाय अवमानवीय सृष्टि का
पवित्रतम रुप है। वह प्राणियों में सबसे समर्थ अर्थात मनुष्यों के हाथों
न्याय पाने के वास्ते सभी अवमानवीय जीवों की ओर से हमें गुहार करती है। वह
अपनी आंखों की भाषा में हमसे यह कहती प्रतीत होती है : ईश्वर ने तुम्हें
हमारा स्वामी इसलिए नहीं बनाया है कि तुम हमें मार डालो, हमारा मांस खाओ
अथवा किसी अन्य प्रकार से हमारे साथ दुर्वव्यहार करो, बल्कि इसलिए बनाया है
कि तुम हमारे मित्र तथा संरक्षक बन कर रहो।” ( यंग इंडिया, 26.06.1924)
महात्मा
गांधी गौ माता को जन्मदात्री मां से भी श्रेष्ठ मानते थे। गौ माता
निस्वार्थ भाव से पूरे विश्व की सेवा करती है। इसके बदले में वह कुछ भी
नहीं मांगती। केवल जिंदा रहने तक ही नहीं बल्कि मरने के बाद भी वह हमारे
काम में आती है। अगर निस्वार्थ भाव से सेवा का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कहीं
देखने को मिलता है तो वह गौ माता है।
गांधी
जी लिखते हैं – “ गोमाता जन्म देने वाली माता से श्रेष्ठ है। हमारी माता
हमें दो वर्ष दुग्धपान कराती है और यह आशा करती है कि हम बडे होकर उसकी
सेवा करेंगे। गाय हमसे चारे और दाने के अलावा किसी और चीज की आशा नहीं
करती। हमारी मां प्राय: रुग्ण हो जाती है और हमसे सेवा करने की अपेक्षा
करती है। गोमाता शायद ही कभी बीमार पडती है। गोमाता हमारी सेवा आजीवन ही
नहीं करती, अपितु अपनी मृत्यु के उपरांत भी करती है। अपनी मां की मृत्यु
होने पर हमें दफनाने या उसका दाह संस्कार करने पर भी धनराशि व्यय करनी पडती
है। गोमाता मर जाने पर भी उतनी ही उपयोगी सिद्ध होती है जितनी अपने जीवन
काल में थी। हम उसके शरीर के हर अंग – मांस, अस्थियां. आंतें, सींग और चर्म
का इस्तमाल कर सकते हैं। ये बात हमें जन्म देने वाली मां की निंदा के
विचार से नहीं कह रहा हूं बल्कि यह दिखाने के लिए कह रहा हूं कि मैं गाय की
पूजा क्यों करता हूं। ”( हरिजन , 15.09-1940)
गांधीजी
गौ रक्षा के लिए संपूर्ण विश्व का मुकाबला करने के लिए तैयार थे। 1925 में
यंग इंडिया में उन्होंने इस बात का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है – “
मैं गाय की पूजा करता हूं और उसकी पूजा का समर्थन करने के लिए दुनिया का
मुकाबला करने को तैयार हूं। ” – (यंग इंडिया, 1-1-1925)
गांधीजी
का मानना था कि गौ हत्या का कलंक सिर्फ भारत से ही नहीं बल्कि पूरे देश से
बंद होना चाहिए। इसके लिए भारत से यह कार्य शुरु हो, यह वह चाहते थे।
उन्होंने लिखा है – “ मेरी आकांक्षा है कि गौ रक्षा के सिद्धांत की मान्यता
संपूर्ण विश्व में हो। पर इसके लिए यह आवश्यक है पहले भारत में गौवंश की
दुर्गति समाप्त हो और उसे उचित स्थान मिले ” – (यंग इंडिया, 29-1-1925)
आर्थिक
दृष्टि से लाभदायक न होने वाले पशुओं की हत्या की जो परंपरा पश्चिम में
विकसित हुई है गांधी जी उसकी निंदा करते थे। गांधीजी उसे ‘हृदयहीन
व्यवस्था’ कहते थे। उन्होंने बार-बार कहा कि ऐसी व्यवस्था का भारत में कोई
स्थान नहीं है। इस बारे में उन्होंने एक बार हरिजन पत्रिका में लिखा।
गांधीजी की शब्दों में – “ जहां तक गौरक्षा की शुद्ध आर्थिक आवश्यकता का
प्रश्न है, यदि इस पर केवल इसी दृष्टि से विचार किया जाए तो इसका हल आसान
है। तब तो बिना कोई विचार किये उन सभी पशुओं को मार देना चाहिए जिनका दूध
सूख गया है या जिन पर आने वाले खर्च की तुलना में उनसे मिलने वाले दूध की
कीमत कम है या जो बूढे और नाकारा हो गए हैं। लेकिन इस हृदयहीन व्यवस्था के
लिए भारत में कोई स्थान नहीं है , यद्यपि विरोधाभासों की इस भूमि के निवासी
वस्तुत: अनेक हृदयहीन कृत्यों के दोषी हैं। ” (हरिजन ,31.08. 1947)
महात्मा
गांधी ने गौ रक्षा को हिन्दू धर्म का केन्द्रीय तत्व कहा है। गौ के
महात्म्य के बारे में उन्होंने लिखा है – हिन्दू धर्म का केन्द्रीय तत्व
गोरक्षा है। मैं गोरक्षा को मानव विकास की सबसे अदभुत घटना मानता हूं। यह
मानव का उदात्तीकरण करती है। मेरी दृष्टि में गाय का अर्थ समस्त अवमानवीय
जगत है। गाय के माध्यम से मनुष्य समस्त जीवजगत के साथ अपना तादात्म्य
स्थापित करता है। गाय को इसके लिए क्यों चुना गया, इसका कारण स्पष्ट है।
भारत में गाय मनुष्य की सबसे अच्छी साथिन थी। उसे कामधेनु कहा गया। वह केवल
दूध ही नहीं देती थी, बल्कि उसी के बदौलत कृषि संभव हो पाई। ” – (यंग
इंड़िया, 6.10.1921)
महात्मा
गांधी ने गौ रक्षा को हिन्दू धर्म के संरक्षण के साथ जोडा है। उनके शब्दों
में – गो रक्षा विश्व को हिन्दू धर्म की देन है। हिन्दू धर्म तब तक जीवित
रहेगा जब तक गोरक्षक हिन्दू मौजूद है। ”- (यंग इंड़िया, 6.10.1921)
अच्छे
हिन्दुओं को हम कैसे परखेंगे। क्या उनके मस्तक से, तिलक से या मंत्रोच्चार
से। गांधी जी का स्पष्ट मानना था कि गौ रक्षा की योग्यता ही हिन्दू होने
का आधार है। गांधी जी के शब्दों में – “ हिन्दुओं की परख उनके तिलक,
मंत्रों के शुद्ध उच्चारण, तीर्थयात्राओं तथा जात -पात के नियमों के
अत्यौपचारिक पालन से नहीं की जाएगी, बल्कि गाय की रक्षा करने की उनकी
योग्यता के आधार पर की जाएगी। ” (यंग इंडिया . 6.10.1921)
गांधी
जी के उपरोक्त विचारों से स्पष्ट है कि बापू गौ रक्षा को कितना महत्वपूर्ण
मानते थे। लेकिन इसे त्रासदी ही कहना चाहिए कि गांधी के देश में गौ हत्या
धडल्ले से चल रही है। महात्मा गांधी के विचारों की हत्या कर दी गई है।
आवश्यकता इस बात की है कि गांधी जी के विचारों के आधार पर, भारतीय शाश्वत
संस्कृति व परंपराओं के आधार पर भारतीय व्यवस्था को स्थापित किया जाए और गौ
माता की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं, तभी गांधीजी के सपनों का राम
राज्य स्थापित हो पाएगा।