Monday, January 26, 2015

सनातनी विचार !
भगवान श्रीमन-नारायण अजन्मा,अविकार,निराकार है, पर सच्चे भक्तों के कष्ट हरने हेतु अवतार लीला करते है। यही सनातन सत्य है। -------
राजर्षि अमरीश परम वैष्णव यानि ''भगवान नारायण'' के परम भक्त थे। महर्षि दुर्वासा ने द्द्वेश वस निर्दोष अमरीश को शाप दे दिया। शाप से मुक्ति के लिए राजा अमरीश एवं उनकी पत्नी ने अन्न-जल त्याग दिया और ''भगवान नारायण'' के ध्यान में बैठ गए। उधर अकारण निर्दोष राजा अमरीश को दुर्वासा ऋषि के शाप देते ही ''भगवान नारायण'' का सुदर्शन चक्र दुर्वासा के प्राण हर लेने उनके पीछे-पीछे चल दिया ऋषि दुर्वासा 3 लोक 14 भुवन तक भागते रहे 1 साल का वक्त बीत गया पर सुदर्शन ने पीछा नहीं छोड़ा।  भयभीत ''ब्राहमण दुर्वासा'' आखिर भगवान ब्रह्मा जी की शरण में गए ब्रह्मा जी के सुझाव पर दुर्वासा ने ''भगवान नारायण'' से प्रार्थना की।
 हे सुदर्शन चक्रधारी नाथ ! मुझे क्षमा करे मुझसे बड़ी भूल हुई, आपके सच्चे भक्तों पर क्रोध करना बड़ा भारी पाप है, मुझे क्षमा कीजिये। तब भगवान नारायण ने कहाँ तुम मेरे अपराधी नहीं हो, मैं क्षमा भी तभी करूँगा जब मेरा निर्दोष भक्त अमरीश तुम्हें क्षमा कर दें, तो समझ लेना मैंने क्षमा कर दिया। मेरे भक्त ने पिछले एक साल ने अन्न-जल त्याग रखा है इस कारण मैंने भी अन्न-जल त्याग रखा है। जिस प्रकार पुत्र के अन्न- जल त्याग देने से माँ भी चैन से नहीं रह पाती वैसे ही मेरी भी दशा है।  मेरा सच्चा भक्त जब बिपत्ति में होता है, तब तक यह समझों मैं नारायण भी बिपत्ति में ही हूँ। तब भगवान नारायण से आज्ञा प्राप्त कर ऋषि दुर्वासा राजा अमिरिश के पास गए राजा अमरीश राज दरवार में उचे सिंहासन पर बैठे अपनी जनता की सेवा और न्याय कार्य की समीक्षा कर रहे थे। ''ऋषि दुर्वासा'' को देखते ही राजा अमरीश सिंहासन छोड़ भागे-भागे आयें और ऋषि दुर्वासा के चरणों में गिर गए ''ऋषि दुर्वासा'' ने देखा और उठा कर गले लगा लिया, राजा अमरीश काफी कमजोर हो गया था और उसके ओठ सूखे हुए थे।  पिछले एक वर्ष से अन्न- जल छोड़ने के कारण राजा और रानी इतने कमजोर हो गए थे की पहचान में भी आना मुसकिल हो गया था । पर ''भगवान'' के इस सच्चे भक्त क्षत्रिय कुमार राजा अमरीश ने अपने कर्तव्य को नहीं छोड़ा था। तब राजा ने ''ब्राहमण दुर्वासा'' को सुन्दर छप्पन भोजन कराया और ऋषि आज्ञा से ''भगवान'' को भी छप्पन भोग लगा कर स्वयंग और अपनी पत्नी को अन्न-जल का पान कराया। तब भगवान नारायण ने उधर वैकुण्ठ में पुरे एक वर्ष के बाद भक्तों का लगाया भोग का पान किया ।
यह कथा स्वयंग ''भगवान नारायण'' धर्म से कहते है ब्रह्मवैवर्त पुराण में ।
                                                                                ''नयाल सनातनी''

Monday, January 19, 2015

सनातनी विचार ! ''वेदवती'' , ''छाया सीता'', और ''द्रौपदी''  यानि ''त्रिहायणी''

सत्ययुग में भगवान शंकर के परम भक्त ''वृषध्वज'' को सूर्यनारायण ने शाप दे दिया जिससे ''वृषध्वज'' की सारी ''श्री'' नष्ट हो गई । शाप देने के पश्चयात शिव भक्त जान भगवान शंकर के भय से सूर्य ब्रह्मा की शरण में चले गए। तब शंकर अपने भक्त की मुक्ति के लिए वैकुण्ठ-वासी भगवान विष्णु के पास पहुचें। तब तक दैव की प्रेरणा से 21 युग बीत चूके थे। यधपि वैकुण्ठ में अभी आधी घडीं का ही समय बिता था।  किसी से भी ना रुकने वाले अत्यंत भयंकर कालचक्र ने ''वृषध्वज'' और उसके पुत्र ''रथध्वज'' को अपना ग्रास बना लिया था। ''रथध्वज'' के दो पुत्र ''धर्मध्वज'' और ''कुशध्वज'' भी सूर्य के शाप से इस वक्त ''श्रीहीन'' हो पृथ्वी पर विचर रहे थे और ये दोनों इस संकट की घडी में भी परम ''वैष्णव धर्म'' का पालन कर रहे थे और एकमात्र लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने दिन-रात प्रार्थना-रत ही उनका एकमात्र कर्म था। 
तब भगवान शंकर की प्रार्थना पर ''श्रीहरि''  बोले हे हरे ! अब इन दोनों भाइयों की पत्नियों के उदर में हमारी कृपा से भगवती लक्ष्मी अपनी एक कला से प्रकट होगी। तब वे दोनों नरेश लक्ष्मी संपन्न हो जायेंगे। कुछ काल के बाद इस दोनों भाइयों ने कठिन तपस्या से भगवती महालक्ष्मी को प्रसन्न कर अपना अभीष्ट मनोरथ को प्राप्त किया और महालक्ष्मी से वर- प्रसाद रूप में कन्या रत्न एवं प्रथ्वीपति होने का सौभाग्य प्राप्त किया। ''कुशध्वज'' की परम साध्वी भार्या का नाम ''मालावती'' था,जिसके गर्व से भगवती लक्ष्मी की अंशरूपा कन्या का जन्म हुआ जो पैदा होते ही सूतिकागृह में स्पष्ट स्वर में वेद के मंत्रो का उच्चारण करने लगी। इसलिए ही विद्द्वान पुरुषों ने उसका नाम ''वेदवती'' रखा। उत्पन्न होते ही कन्या ने स्नान किया और तपस्या करने ''वन'' की ओर चल दी। वह तपस्विनी कन्या एक मन्वंतर तक पुष्कर क्षेत्र में तपस्या करती रही। अत्यंत घोर तपोनिष्ठ रहने पर भी उसका शरीर हृष्ट -पुष्ट बना रहा। वह हमेशा नवयौवन बनी रही। एक दिन तपस्यारत ''वेदवती'' ने आकाशवाणी सुनी कहा गया सुंदरी ! दुसरे जन्म में भगवन ''श्रीहरि'' ही तुम्हारे पति होंगें।
आकाशवाणी सुनने के बाद ''वेदवती'' गंधमादन पर्वत पर चली गई और अधिक कठोर तप करने लगी। चिरकाल तक तपस्यारत ''वेदवती'' अपने तपोबल से पहले से भी अधिक सुंदरी लगाने लगी। एक दिन दुर्निवार रावण उधर से गुजरा वह वेदवती के रूप यौवन पर मोहित हो उस तपस्विनी का श्रंगार करने लगा। ''वेदवती'' ने अपने तपोबल से रावण को स्तंभित कर दिया जिससे वह जडवत होगया। तब भयभीत रावण ने मन ही मन उस देवी की शक्ति श्रोतों से उपासना की। देवी ''वेदवती'' शक्ति की उपासन कभी विफल नहीं होती कह कर संतुष्ट होकर उस पापी को स्तम्भन से मुक्त की और साथ ही उस पापिष्ठ को यह शाप देते हुए कहाँ  ''दुरात्मन''! रावण तू मेरे लिए ही अपने बंधू - बान्धवों के साथ काल का ग्रास बनेगा; क्योकि तूने काम भाव से मुझे स्पर्श कर लिया है अतः अब मैं इस शरीर को त्याग देती हूँ ; देख ले।' देवी ''वेदवती'' ने इस प्रकार कह कर वही ''योगद्वारा'' अपने शरीर के साथ भूमि में शमा गयी। रावण महान पश्च्याताप करता हुआ अपने घर की ओर प्रयाण किया।
 वही परम तपोनिष्ठ साध्वी ''वेदवती'' ही दुसरे जन्म में ''राजर्षि जनक'' द्वारा सोने के हल चलाये जाने पर भूमि से कन्या रूप में प्रकट हुई। और महाराजा जनक को वह सौभाग्य प्रदान किया जो बड़े-बड़े योगी-मुनियों को दुर्लभ था।जिसके कारण ही रावण को मृत्यु का मुख देखना पड़ा। ''वेदवती'' बड़ी तपस्विनी थी।  पूर्वजन्म की तपस्या के प्रभाव से स्वयं भगवान श्रीराम उनके पति हुएं। ये राम ही साक्षात् परिपूर्णतम श्रीहरि है। उस सुन्दरी देवी ने बहुत दिनों तक भगवान श्रीराम के साथ सुख भोग।  उसे पूर्वजन्म की बातें स्मरण थी। कुछ काल के पश्च्यात रघुकुलभूषण, सत्यसंघ भगवान श्रीराम पिता के सत्य की रक्षा करने के लिए ''वन'' पधारे। वे सीता और लक्ष्मण के साथ समुन्द्र के समीप ठहरे हुए थे। संत-वेशधारी सत्यवादी अग्नि देव ने चिंता ग्रस्त श्रीराम से भेट की और देवताओं का आश्रय बताया। संत-भेष धारी अग्नि ने कहाँ, हे राम ! जैसे की आप सर्वग्य है अब सीता माता के हरण का समय उपस्तिथ है। ये मेरी माँ है; इन्हें मेरे संरक्षण में रखकर आप छायामयी सीता को अपने साथ रखियें; फिर वापसी में अग्नि परीक्षा के समय इन्हें मैं आपको लौटा  दूँगा। परीक्षा-लीला भी हो जाएगी। इसी कार्य के लिए देवताओं ने मुझे यहाँ भेजा है। भगवान राम ने लक्ष्मण को भी बतायें बिना सीता को अग्नि के हाथों सौंप दिया। तब अग्नि ने योगबल से मायामयी सीता प्रकट की, उसके रूप और गुण साक्षात् सीता माता सामान ही थे। अग्निदेव ने उसे राम को दे दिया। आगे माया सीता के कहने पर श्री राम ने सुवर्णमय मृग का पीछा किया राम का वाण लगने पर माया मृग हां लक्ष्मण, हाँ लक्ष्मण कहते चित हो गया। वह मृग शरीर त्याग कर दिव्य देह से संपन्न हो गया और रत्न निर्मित दिव्य विमान पर सवार होकर वैकुण्ठ धाम को चला गया। वह मारीच था जो पूर्व जन्म में वैकुण्ठ धाम के द्वार पर वहां के द्वारपाल जय और विजय का किंकर था। वह वही रहता था वह बड़ा बलवान था।  उसका नाम था ''जित'' सनकादि ऋषियों के शाप से जय- विजय के साथ वह भी राक्षस- योनि में चला गया था। श्रीराम के वाण लगने से उद्दार हुवा वह राक्षस मारीच उन द्वारपालों से पहले वही श्रीहरि के निवास वैकुण्ठ धाम में चला गया जहाँ से संतों के अपमान के कारण पतन हुआ था। वहां रावण ने छाया सीता का खेल ही खेल में हरण कर लिया। राम यह देख विलाप करने लगे सीता को खोजने बारम्बार वन के चक्कर लगाने लगे। तब गोदावरी नदी के तट पर उन्हें जटायु द्वारा सीता का समाचार मिला। राम ने बानर बने देवताओं को अपना सहायक बनाकर समुन्द्र पर पुल बांधा। पुल के द्वारा लंका में पहुँचकर उन ''रघुश्रेष्ठ'' ने अपने बाणों से बंधू- बान्धवों सहित रावण बध कर डाला। तत्पश्चायत वापसी में श्रीराम ने छाया सीता की अग्नि परीक्षा करायी और असली सीता माता को अग्नि देव ने श्रीराम को सौप दिया और देवताओं का कार्य पूर्ण किया। तब श्रीराम ने छाया सीता से कहाँ देवी तुम पुण्य क्षेत्र पुष्कर में चली जाओं और अपनी तपस्या के बलपर ही तुम्हें स्वर्ग लक्ष्मी बनने का सुअवसर प्राप्त होगा । समयानुसार वही छाया सीता राजा द्रुपद के यहाँ यज्ञं वेदी से प्रकट हुई। उसका नाम द्रोपदी पड़ा और पाँचों पाण्डव उसके पतिदेव हुए।
जब असली सीता श्रीराम के साथ चली गई तो छाया सीता श्रीराम एवं अग्नि देव के सुझाव पर शंकर भगवान की घोर तपस्या करने लगी उस समय तपस्यारत उस सुंदरी ने व्यग्र होकर पांच बार कहाँ हे भगवान त्रिलोचन ! मुझे पति प्रदान कीजिये,+5 उस समय पांच बार पति की मांग करते देख भगवान शंकर जो परम रसिक है, छाया सीता की प्रार्थना से प्रसन्न होकर बोले जाओं तुम्हें पांच पति मिलेंगे। आगे चलकर द्वापर में उसका नाम 'द्रौपदी' पड़ा और पाँचों पाण्डव उसके पतिदेव हुए।
इस प्रकार सत्ययुग में वही कल्याणी ''वेदवती'' कुशध्वज की कन्या, त्रेतायुग में छायारूप से सीता बनकर भगवान राम की सहचरी बनी तथा द्वापर युग में द्रुपद कुमारी 'द्रौपदी' हुई। अतएव इसे ''त्रिहायणी'' कहा गया है। और तीनों युगों में यह तपस्विनी विधयमान रही है। वही 'वेदवती' , ''छाया सीता'' एवं 'द्रौपदी'। महालक्ष्मी की ही अंसभूता अब वैकुण्ठ में श्रीहरि के वाम-भाग में विराजित महालक्ष्मी में ही विलीन हो चुकी है। अपने भक्तों की पुकार पर भगवान की लीला को पूर्ण करने समय-समय पर अवतरित होती रहती है।
                                                                                           ''नयाल सनातनी''        

Saturday, January 17, 2015

सनातनी विचार !
कटु- कठोर, और झूठी, एवं निन्दक वाणी का उच्चारण ना करें, इससे अपने भी पराये हो सकते है !  मूल सनातन धर्म में व्यक्ति बड़ा नहीं उसका व्योहार बड़ा माना गया है। विनम्र व्योहार परायों को भी अपना बना लेता है। भगवान ''श्रीराम'' को बन गमन के वक्त लाखों सेवा भावी लोग मिले पर ''निषाद राज'' एवं ''केवट'' सदा अपने विनम व्योहार और समर्पण की भावना के कारण याद किये जाते रहंगे। 
                                 ''नयाल सनातनी''

Thursday, January 15, 2015

सनातनी विचार !
 धर्म की जय हो - अधर्म का नाश हो - प्राणियो में सदभावना हो - विश्व का कल्याण हो - गोबध बंद हो - भारत अखंड हो - सनातन समिधान शास्त्रीय हो - धर्म और शिक्षा में सरकारी हस्तक्षेप बंद हो - ''धर्ममेण शासिते राष्टेय न च बधा प्रवर्तते'' - धर्म शासित राष्ट होगा तो कोई बाधा उत्पन्न हो ही नही सकती। .

धर्म यानि बैल जो भगवान शंकर का वाहन है {बैल} अगर वही नही बचेगा तो सब कुच्छ गुड गोबर हो जायेगा।  गोवंश कैसे बचे ? भारत फिर से विश्व गुरु कैसे बने आईये सनातन वेद - शास्त्रो के अनुसार विचार करे ?
 ''सा धेनुवर्र्दास्तु मे'' . ''नमस्ते जायमानायै जाताया उत ते नमः ! बालेभ्यः शफेभ्यो रुपयाध्न्ये ते नमः !!''
हे अवध्य गौ !
उत्पन्न होते समय तुम्हे नमस्कार और उत्पन्न होने पर भी तुम्हे प्रणाम . तुम्हारे रूप {शरीर } रोम और खुरो को भी प्रणाम। समुंदर मंथन के समय पांच गौए उत्पन हुई उनके नाम नंदा ,सुभद्रा , सुरभी , सुशीला और बहुला पडा।  ये सभी पाँचों गायों को लोक कल्याण निमित देवताओ को बलिष्ठ बनाये रखने के लिये हविष्य हेतु दूध ,दही ,घी की नदीया बहाने और ब्राह्मणो का सहयोग करने हेतु ''श्रीहरी'' द्वारा प्रकाटय किया गया। इनको हमारे विद्वान ब्राह्मण महर्षी जमदग्नी, महर्षि भारद्वाज, महर्षि असित, महर्षि वशिष्ठ और महर्षि गौतम मुनि को समर्पित किया गया।  क्योकी ब्राह्मणों में नारायण ने मंत्र बल की प्रतिष्ठा की है, इनके अलावा भगवान ने वेद और अग्नी को भी प्रगट किया ताकी ब्राह्मण वेदो को पडकर मन्त्रो से घी ''हविष्य'' के सहयोग से अग्नी में आहुती दे। और देवता बलिष्ठ होकर हम मानवो की रक्षा करे।  भगवान ने कहा गौए से उत्पन्न दूध, दही, घी, गोबर,गौमूत्र और गौ-रोचना ये छः अंग {गोषडण्ग} अत्यंत पवित्र है, प्राणियो के सभी पापो को समाप्त कर उन्हे शुद्द करने वाला है। ब्राह्मणो में मन्त्रो का निवास है, गायो में हविष्य स्थित है ; इन दोनो के संयोग से ही विष्णु स्वरूप यज्ञं संपन्न होते है {यज्ञो वै विष्णु : } गायों से ही यज्ञं की प्रवर्ति होती है और गायों में सभी देवताओं का निवास है।
 छहो अंगो शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छंद, जोतिषी और पद,जटा, शिखा, रेखा आदि क्रमो के साथ सभी वेद गायो में ही सुप्रतिष्ठीत है। गायों को बचाने के लिये वेद पडने वाले ब्राह्मणों को बढाना होगा।  वेदो की शिक्षा अनिवार्य करनी होगी।  जब वेद पाठी ब्राह्मण यज्ञं करेंगे तो शुद्ध गाय के घी की आवश्यकता होगी। एक वेदो को जानने वाला ही शुद्ध गाय के घी की महत्ता को समझ सकता है।  जब शुद्ध यज्ञं होंगे तब देवता बलिष्ठ, प्रसन्न हो कर समय पर वर्षा करेंगे, वर्षा से जल और हरे चारे की समुचित व्यवस्था होगी गायो को हरे चारे की प्रचुर मात्रा में प्राप्ति पर दूध की नदीया बहेंगी। गौ दूध खूब मिलने से सभी मानवों की बुद्धी सतोगुणी होगी, जीससे संसार में प्रेम और भाईचारे का वातावरण बनेगा।  जब भाई चारे का वातावरण ही हो जायेगा तो कोई भी एक दुसरे की निंदा ,हिंसा, अपकार नही करेगा।  इस सब के जड में गौ-माता के दूध का चमत्कार ही छुपा है।  आज पैकेट और सिंथेटिक दूध की वजह से मानव जाति का तन-मन-धन सब खतरे में है।  अगर हम सब लोग सिर्फ गौ-माता का ही दूध पीने का संकल्प ले लेंगे तो हर हालत में {गव्ली} दूध बेचने वाले को भी भैस और नकली दूध की जगह गायों को पालना पडेगा गाय के दूध का व्यापार करना पडेगा।  ताकी उसका व्यापार बंद ना हो।  इससे ग्वालों का धन और धर्म दोनो बचेगा, जीससे उसका इस लोक और परलोक सुधरेग। आप सब पाठकों ने देखा गाय के दूध पीने से कितने बडे -बडे सत्य धर्म का पालन अपने आप हो जाते है।
कृपया देशी गाय की दूध की मांग करें अपना सरल धर्म अपनायें। गौ चरणों के दास का निवेदन गोमाता के बेटो भक्तो से एक बार जरूर पडे .सायद आपके मन में विचार कोई परिवर्तन कर दें और आप गौ-दुग्ध की मांग करने लगें और गौवंश बचाने में आपके कदम बढ़ जाएँ।

                                                ''नयाल सनातनी'';--सर्वदलीय गौरक्षा मंच                         

Wednesday, January 14, 2015

सनातनी विचार !
आदि-अनादि ''सनातन धर्म'' के मुकुटमणि ''सनातन ब्रह्म'' सूर्य देव के उपासना का महान पर्व, ''आदि देव'' सूर्य की कृपा प्राप्त करने का महान पर्व मकर संक्रान्त्रि की हार्द्दिक शुभ कामना सभी ''सनातनी गौ-भक्त समाज'' को जय गौ माता की ।
भगवान सूर्य को ''आदि सनातन देव'' इसलिए भी कहाँ गया है सत्युग में घोर तपश्या के पुण्य से महर्षि कश्यप की संतान के रूप में ऋषि को सम्मान देने प्रकटे सूर्य नारायण, जब श्रीराम ने अवतार लिया त्रेता युग में तब भी आप संसार का अंधकार मिटा रहे थे और जब श्री कृष्ण अवतार हुआ द्वापर युग में तब भी आप मौजूद थे, और आज कल्युग में जब पुरे विश्व में आध्यतम के क्षेत्र में घोर अँधेरे का वातावरण है तो भी आप ही अज्ञान मिटाने मौजूद है अदितीय पुत्र। 
                                     ''नयाल सनातनी''

Tuesday, January 13, 2015

सनातनी विचार !
जो मनुष्य इन 7 चौपाइयों के अर्थ को समझ गया उसके जीवन के सातों दिन सफल हो गये। इन चौपाइयों में जीवन जीने का रहस्य छुपा हुआ है। पूरा भावर्थ जानने रामचरित मानस में इन सातों चौपाइयों को मनन करते हुए जरूर पड़ें। 
1 - मंगल भवन अमंगल हारी द्रवहु सुदसरथ अचर बिहारी --
2 - होइहै वही जो राम रचि राखा,, को करे तरफ़ बढ़ाए साखा --
3 - धीरज धरम मित्र अरु नारी, आपद काल परखिये चारी ---
4 - जेहिके जेहि पर सत्य सनेहू, सो तेहि मिलय न कछु सन्देहू ---
5 - जाकी रही भावना जैसी, प्रभु-रघु मूरति देखी तिन तैसी ---
6 - रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई ----
7 - हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता, कहहि सुनहि बहुविधि सब संता ---
सिया राम-सिया राम - जय जय राम
    ''नयाल सनातनी''

Saturday, January 10, 2015

सनातनी विचार !
तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि 'कवि' पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥
भावर्थ - वृक्ष अपने फल स्वयंग नहीं खाते, नदिया अपना जल खुद नहीं पीती परोकर के लिए ही ये उत्पन्न और लय होते है .
परमात्मा द्वारा उत्पन्न जड़ की अगर यह परोपकार प्रवृति है तो चेतन मानव की क्या होनी चाहिए ?
परोकर व सेवा जीवन के दो परम कर्तव्य है। यदि चेतन ( विवेकशील ) मनुष्य को यह समझ नहीं आया तो समझो पृथ्वी पर जन्म लेना बेकार गया।
                                    ''नयाल सनातनी''
सनातनी विचार !
कल्प के पूर्वार्ध में जब-जब श्रृष्टि का दुबारा आरम्भ करते है परमात्म श्री कृष्ण तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश, धर्म,सरस्वती,महालक्ष्मी और प्रकृति (दुर्गा )आदि देवी - देवताओं के अलावा जीव मात्र के कल्याण के लिए अपने ही शरीर से अपने ही समान गुणकारी गौवंश को भी उत्पन्न करते है। !! ब्रह्मवैवर्त पुराण-ब्रह्मखण्ड !! के अनुसार एक कल्प में भगवान श्रीकृष्ण के शरीर के रोमकूपों से नित्य सुस्थिर यौवन वाली गौएँ प्रकट हुई, जिनके रूप-रंग अनेक  प्रकार के थे।  बहुतेरे बलिवर्द  (सांड), सुरभि जाति की गौएँ, नाना प्रकार के सुन्दर- सुन्दर बछड़े और अत्यंत मनोहर, श्याम वर्ण वाली बहुत-सी कामधेनु गायें भी वहां तत्काल प्रकट हो गयीं।  उनमे से एक मनोहर बलीवर्द बैल को जो करोड़ों सिंहों के सामान बलशाली था, श्रीकृष्ण ने शिव को सवारी के लिए दे दिया।
आज सभी आर्यावर्त में पाई जाने वाली देशी गौवंश का सानिंध्य प्राप्त करना भगवान श्रीकृष्ण का अनुग्रह प्राप्त करना ही है। जो मानव एक भी भारतीय गाय या बैल को अपने जीवन काल में अपने घर में पालन-पोषण कर उनकी सेवा करता है, या अन्य मानव जाति से पलवता है, प्रेरणा देता है वह निश्चित ही अपने पितरो के तारणहार और खुद गोलोक धाम जाने का अधिकारी बन जाता है, हाँ संसार को दिखाने या लोगो को ठगने अनेक गौवंश को पाल कर उनको भूखा-प्यासा रखने वाला मनुष्य वेद-पुराणों का महान पण्डित भी है तो रौरव नरको का अधिकारी ही है। याद रहे भगवान से उत्पन्न गौवंश का हक़ मार कर वर्णशंकर गौवंश को पालने वालो या वर्णशंकर जाति को बढ़ावा देने वालो की कोई गति नहीं है। यही सनातन सत्य है।
                                ''नयाल सनातनी'';--- सर्वदलीय गौरक्षा मंच

Friday, January 9, 2015

सनातनी विचार ! सावधान भगवान की ''कथामृत'' बिकाऊ नहीं है -------------
कुछ कथा वाचक भगवान की ''कथामृत'' को भी बोली लगा कर बेच रहे है क्या उनका उद्धार संभव है ? जो अपना उद्धार नहीं कर सकते वे आपका उद्धार कर पाएंगे ? उन  विराट भगवान की कथाओं का प्रचार करने वाले भगवान शिव ने जहर पी कर भी भगवान की लीलाओं का निशुल्क गुणगान किया। माता सति भगवान की कथा का प्रचार-प्रसार हो इसलिए हवन कुण्ड की जलती अग्नि में कूद कर स्वाहा हो गई। काकभुशंडी जी हिमालय के कन्दराओं में रह कर पक्षियों को निशुल्क कथा अमृत पान कराते है।  नारद जी तीनो लोको में भगवान की कथा का निशुल्क प्रचार - प्रसार करते है। महर्षि वेद व्यास जी भगवान की कथाओं को निशुल्क लिखे और संसार के जीवों के कल्याण हो इसलिए अनेक पुराणों की रचना की । सनक, सनन्दन, सनातन, संतनकुमार 5 वर्ष के बालक के रूप  भगवान की कथा का निशुल्क प्रचार-प्रसार करते है। सुकदेव जी जो भागवत कथा के मुख्य प्रचारक कहें गए क्या उन्हों भगवान की कथा करने का कोई शुल्क लिया ? फिर आज के कथा वाचक क्यों अपनी फीस तय करते है ? येसा ना करें भगवान की कथा को बेचने वाला ''रौरव नरकों'' का भागी होता है।  कुछ लोगो ने पहले भागवत कथा में भगवान श्रीकृष्ण,राधा जी और सुदामा नाम को खूब बेचे, फिर श्री राम कथा में केवट और निषाद राज को बेचा, शिव पुराण कथा - दुर्गा, देवी भागवत कथा आदि बेचते-बचेते अब ''गौ कथा'' बेचने लगे है। सभी कथावाचकों से करबद्द निवेदन भगवान की पवित्र ''कथामृत'' का सौदा ना करें, पाखंड और ठगी वहां काम नहीं आती जहाँ आखिर में सबको जाना है । कभी-कभी सुदूर पहाड़ी गावं-देहात में जाकर गरीब और निसक्तों को भी कथा सुनाएँ ताकि भुत प्रेत ,टोटा-टमका,धर्म-परिवर्तन वाले अन्धविश्वास से गावों में रहने वाले मुक्त हो सकें। यह कठिन मार्ग है पर साधकों के लिए सुलभ भी है यही मार्ग से ही यह मानव जन्म धन्य होगा और मुक्ति मार्ग परस्त होगा। --- धर्म की जय हो, अधर्म का नास हो, ....
                                   ''नयाल सनातनी''

Thursday, January 8, 2015

Wednesday, January 7, 2015

सनातनी विचार !
 वाह जी वाह एक तरफ रामायण के रचियता महर्षि बाल्मीकि जी की पूजा और धूम
धाम से जन्म दिन मनाता है पूरा सनातन हिन्दू समाज क्योकि पूरा सनातन समाज ऋणी है महर्षि बाल्मीकि के उन्होंने श्री राम का चरित्र संसार में सर्वप्रथम प्रस्तुत किया।  दूसरी तरफ हमारे श्री राम, श्री कृष्ण और उनके स्वामी शिव -दुर्गा आदि मंदिरों में बाल्मीकि समाज के लोग पूजापाठ नहीं कर सकते। यहाँ तक की भारत के एक बड़े भू-भाग के मुख्य मंत्री बाल्मीकि होने के कारण मंदिर में प्रवेश पा तो जाते है, पर बाद में मंदिर का शुद्दिकरण किया जाता है।
जो परमब्रह्म परमात्मा जीव मात्र के हर ह्रदय की धड़कन है वह उसके बन्दों के पूजा -पाठ से या छूने से अपवित्र कैसे हो सकता है ? ऐसे में अगर कुछ लोग अन्य मत में जाते है, या अन्य तथाकथित धर्म अपनाते है तो फिर घर वापसी ! क्या वापस आने के बाद उनके साथ अपनों सा व्योहार होगा ? कृपया सुनिश्चित करके ही घर वापसी की जाय क्योकि कल जब इनकी बेटा - बेटीयाँ अविवाहित रह जायेंगे तो एक नई और बड़ी समस्या इनके साथ आएगी इस समस्या के दोषी कोन होगा सुनिश्चित होना चाहिए  !
                        ''नयाल सनातनी''

Tuesday, January 6, 2015

सनातनी विचार ! जैसी हरि इच्छा !
उस ब्रहम का कोन अपमान कर सकता है जिसने श्री राम और श्री कृष्ण को भी अपना प्रतिनिधि बना कर मृत्य लोक के मानवों को सत मार्ग बताया ? और सनातन धर्म के अहित में लगे दुष्टों का समय - समय पर संघाह करवाया- किया। आज तक अनेको बार राम जन्म हुआ है, अनेक बार कृष्ण का अवतार हुआ है ,प्रतेक कल्प में राम-कृष्ण का अवतार होता ही है। ये श्री राम- श्री कृष्ण भी एक पद है उस परम ब्रहम परमात्मा के बनाये हुए ये अपना रोल निभाने आते-जाते रहते है समयानुकूल । वह मूल ब्रहम कोन है ? वही जाना जिसको जनाने वाले भी वही है जो कभी प्रदर्शित नहीं हुआ। 
आमिर की p/k हो या परेश रावल की omg और ऐसे लाखों फिल्म भी मूल सनातन धर्म को, मूल सनातन ब्रहम को कोई हानि नहीं पंहुचा सकते। क्योकि अभिनाशी सनातन धर्म और अभिनाशी मूल परम ब्रहम परमात्मा का अपमान हो ही नहीं सकता एक नश्वर जीव से, हाँ नकली धर्म-पाखंड-धर्म के ठेकेदारों  का अपमान जरूर हो सकता है।
इन फिल्मो को विरोध कर हम इनका प्रचार ही कर रहे है। आज इन फिल्मों का इतना प्रचार हो गया की साधू-संत भी अब इन फिल्मों को देखने सनेमा घरों में दिखने लगे है। जो ये चाहते भी है इनका व्यापार खूब फल - फूल रहा है। 

                                    ''नयाल सनातनी''

Monday, January 5, 2015

सनातनी विचार !
पवित्र ऋषि मुनियों के आर्यावर्त में हर तीसरा आदमी हत्यारा ! मांसाहारी जब किसी भी जीव का मांस खाता है, शायद ही सोचता होगा की मेरे कारण मेरे जीभ के चटोरेपन के कारण, मेरे जिन्दा लाशों के कब्रगाह पेट के कारण आज एक जीव की हत्या हुई है। सनातन शास्त्रो के अनुसार प्रतेक जीव को भगवान ने किसी न किसी कारण (उद्देश्य ) से बनाया है। अकारण मनुष्य कोई कार्य कर सकता है ! पर परमात्मा नहीं करता। कहते है प्रतेक आत्मा में परमात्मा का वास है, जब तक जीवित आत्मा में परमात्मा बैठा है, तब तक ही जीव जिन्दा है जिस वक्त परमात्मा निकला उसी समय जीव निष्प्राण हुआ। बकरा-बकरी, मुर्गी- मुर्गा, मच्छली-अण्डे, गाय-बैल, भैंसे,हिरण आदि सबके अंदर एक जीवन था। उनकी हत्या कर मांस परोषने  वाले से अधिक दोषी है उन जीवों के मांस को खाने वाला। क्योकि अगर आप उस नर-पिचास द्वारा मारा गया जीव का मांस आज नहीं खाते तो वह कल और जीव हत्या नहीं करता। उससे पैसे देकर मांस खरीदने के मांग के कारण ही उसने आगे भी हत्यायें जारी रखी है।
सावधान जीव हत्यारा भगवान का प्रिय कभी नहीं हो सकता लाख पूजा-पाठ,भागवत, यज्ञं -अनुष्ठान करा लो। -----
  ''नयाल सनातनी'' ;----सर्वदलीय गौरक्षा मंच परिवार

Friday, January 2, 2015

सनातनी विचार !       !! मम दीक्षा गौ रक्षा !!
भारत में लगभग 2 कऱोड़ सफ़ेद एवं भगुवा वस्त्र धारी साधु-संत और सिर्फ 8 कऱोड देशी गौवंश बचा है !
एक और चौकाने वाला सत्य 1% ही बड़े साधु- संतो के पास जिनकी सम्पति 50 करोड़ से 2 हजार करोड़ तक है के पास ही सिर्फ कुछ गौवंश है बाकि ऋषि परम्परा  का निर्वाह न
हीं कर रहे आखिर क्यों ? 

यह सोचने का विषय है साधू - संतों के लिए भी !
60 लाख पूर्ण सक्षम साधु - संत हर संत के पास लगभग 25, 50 से 2000 एकड़ तक भूमि पर गौमाता के लिए स्थान नहीं। अगर इनमे से प्रतेक साधु- संत 50 -100 गौवंश पालने लगे,पलवाने की गारंटी ले लें तो गृहस्थ और किसान के लिए गौपालन के लिए गायें मिलना मुस्किल हो जाएँगी। सिर्फ गुरु मन्त्र के साथ गौ-सेवा का मन्त्र भी दे दें तो करोडो गौवंश बच जायेगा .

 क्योकि इन 60 लाख साधु- संतो के पास 30 से 80 करोड़ इनके अनुयाई है जो किसी न किसी रूप में खूब दान देते है। इनके अनुयाइयों में देश के प्रधानमंत्री से लेकर एक गावँ का गरीब किसान तक है । इतने साधु- संतो के होते हुए भी भोर होते - होते 1 लाख से अधिक गौ-वंश  रोज कट जायें ?
 यह साधु- संतो के लियें सोचनिय  विषय होना चाहियें। क्योकि अनादिकाल से संत समाज सनातन धर्म का पथ-प्रदर्शक रहा है .द्वापर युग में गुरु सान्दिपिनी जी ने भी अपने शिष्यों को गुरु दीक्षा में ''मम दीक्षा गौ रक्षा'' की दीक्षा दी थी तभी तो श्री कृष्ण और सुदामा वन- वन नंगे पाँव गौ माता के पीछे भागे .
सावधान सतयुग, त्रेता, द्वापर और कल्युग में भी पिछले 1 सौ वर्ष पूर्व तक सभी साधु - संतो, ऋषि - मुनियों ने गौमाता पाली थी और अपने शिष्यों को गौ-दीक्षा दी थी। तब मूल प्रकृति गौमाता पर इतना भारी संकट नहीं था। ''नयाल सनातनी'' संस्थापक अध्यक्ष ;-- ''सर्वदलीय गौरक्षा मंच''
सनातनी विचार !
राजनीति एवं धर्म शास्त्र के सम्यक ज्ञाता पुष्कर जी बोले .. 
हे भृगु नंदन परशुराम जी ! गायों को भोजन ग्रास देने से महान पुण्य की प्राप्ति होती है। अपने घर में या गौशाला में जितनी गौओंको रख सके रखें, पर अत्यंत सुखपूर्वक ही रखें "; उनमे से किसी को भी भूखी - प्यासी न रखें।
 हे परशुराम ! जो व्यक्ति अपने घर में गौओंको दुखी रखता है उसे नरक की ही प्राप्ति होती है, इसमें कोई संदेह नहीं। 
किसी दुसरे की गाय को भोजन देकर मनुष्य महान पुण्य का भागी होता है। पूरे जाड़ें भर किसी दुसरे की गाय को गौ -ग्रास प्रदान करने वाला व्यक्ति देवताओ के 600 दिव्य वर्षों तक श्रेष्ठ स्वर्ग का उपभोग करता है और जो व्यक्ति भोजन के समय पहले ही यदि 6 मास तक का गौ-ग्रास निकाल कर उन्हें नित्य प्रदान करता है तो वह स्वर्ग - सुख को प्राप्त करता है। 
गायों के हित में लगे हुए मनुष्यों का जो अहित चाहता है वह रौरव-नरक का भागी होता है। गौभक्ति , गौभक्त के राह में बाँधा पहुचने वालो के पहले के सब पुण्य कर्म नष्ट होकर उसकी अनेको पीडिया भी नरक में चली जाती है।
अतः हे भृगु नन्दन !
इस मानव योनि में आकर इस दिव्य देह से पुण्य हो सके तो अत्यंत आनन्द की बात है, पर याद रहे पापो से बचना जरूर चाहिए।
शास्त्र वचन ''नयाल सनातनी'' सर्वदलीय गौरक्षा मंच संस्थापक ....