सनातनी विचार !
भगवान श्रीमन-नारायण अजन्मा,अविकार,निराकार है, पर सच्चे भक्तों के कष्ट हरने हेतु अवतार लीला करते है। यही सनातन सत्य है। -------
राजर्षि अमरीश परम वैष्णव यानि ''भगवान नारायण'' के परम भक्त थे। महर्षि दुर्वासा ने द्द्वेश वस निर्दोष अमरीश को शाप दे दिया। शाप से मुक्ति के लिए राजा अमरीश एवं उनकी पत्नी ने अन्न-जल त्याग दिया और ''भगवान नारायण'' के ध्यान में बैठ गए। उधर अकारण निर्दोष राजा अमरीश को दुर्वासा ऋषि के शाप देते ही ''भगवान नारायण'' का सुदर्शन चक्र दुर्वासा के प्राण हर लेने उनके पीछे-पीछे चल दिया ऋषि दुर्वासा 3 लोक 14 भुवन तक भागते रहे 1 साल का वक्त बीत गया पर सुदर्शन ने पीछा नहीं छोड़ा। भयभीत ''ब्राहमण दुर्वासा'' आखिर भगवान ब्रह्मा जी की शरण में गए ब्रह्मा जी के सुझाव पर दुर्वासा ने ''भगवान नारायण'' से प्रार्थना की।
हे सुदर्शन चक्रधारी नाथ ! मुझे क्षमा करे मुझसे बड़ी भूल हुई, आपके सच्चे भक्तों पर क्रोध करना बड़ा भारी पाप है, मुझे क्षमा कीजिये। तब भगवान नारायण ने कहाँ तुम मेरे अपराधी नहीं हो, मैं क्षमा भी तभी करूँगा जब मेरा निर्दोष भक्त अमरीश तुम्हें क्षमा कर दें, तो समझ लेना मैंने क्षमा कर दिया। मेरे भक्त ने पिछले एक साल ने अन्न-जल त्याग रखा है इस कारण मैंने भी अन्न-जल त्याग रखा है। जिस प्रकार पुत्र के अन्न- जल त्याग देने से माँ भी चैन से नहीं रह पाती वैसे ही मेरी भी दशा है। मेरा सच्चा भक्त जब बिपत्ति में होता है, तब तक यह समझों मैं नारायण भी बिपत्ति में ही हूँ। तब भगवान नारायण से आज्ञा प्राप्त कर ऋषि दुर्वासा राजा अमिरिश के पास गए राजा अमरीश राज दरवार में उचे सिंहासन पर बैठे अपनी जनता की सेवा और न्याय कार्य की समीक्षा कर रहे थे। ''ऋषि दुर्वासा'' को देखते ही राजा अमरीश सिंहासन छोड़ भागे-भागे आयें और ऋषि दुर्वासा के चरणों में गिर गए ''ऋषि दुर्वासा'' ने देखा और उठा कर गले लगा लिया, राजा अमरीश काफी कमजोर हो गया था और उसके ओठ सूखे हुए थे। पिछले एक वर्ष से अन्न- जल छोड़ने के कारण राजा और रानी इतने कमजोर हो गए थे की पहचान में भी आना मुसकिल हो गया था । पर ''भगवान'' के इस सच्चे भक्त क्षत्रिय कुमार राजा अमरीश ने अपने कर्तव्य को नहीं छोड़ा था। तब राजा ने ''ब्राहमण दुर्वासा'' को सुन्दर छप्पन भोजन कराया और ऋषि आज्ञा से ''भगवान'' को भी छप्पन भोग लगा कर स्वयंग और अपनी पत्नी को अन्न-जल का पान कराया। तब भगवान नारायण ने उधर वैकुण्ठ में पुरे एक वर्ष के बाद भक्तों का लगाया भोग का पान किया ।
यह कथा स्वयंग ''भगवान नारायण'' धर्म से कहते है ब्रह्मवैवर्त पुराण में ।
''नयाल सनातनी''
भगवान श्रीमन-नारायण अजन्मा,अविकार,निराकार है, पर सच्चे भक्तों के कष्ट हरने हेतु अवतार लीला करते है। यही सनातन सत्य है। -------
राजर्षि अमरीश परम वैष्णव यानि ''भगवान नारायण'' के परम भक्त थे। महर्षि दुर्वासा ने द्द्वेश वस निर्दोष अमरीश को शाप दे दिया। शाप से मुक्ति के लिए राजा अमरीश एवं उनकी पत्नी ने अन्न-जल त्याग दिया और ''भगवान नारायण'' के ध्यान में बैठ गए। उधर अकारण निर्दोष राजा अमरीश को दुर्वासा ऋषि के शाप देते ही ''भगवान नारायण'' का सुदर्शन चक्र दुर्वासा के प्राण हर लेने उनके पीछे-पीछे चल दिया ऋषि दुर्वासा 3 लोक 14 भुवन तक भागते रहे 1 साल का वक्त बीत गया पर सुदर्शन ने पीछा नहीं छोड़ा। भयभीत ''ब्राहमण दुर्वासा'' आखिर भगवान ब्रह्मा जी की शरण में गए ब्रह्मा जी के सुझाव पर दुर्वासा ने ''भगवान नारायण'' से प्रार्थना की।
हे सुदर्शन चक्रधारी नाथ ! मुझे क्षमा करे मुझसे बड़ी भूल हुई, आपके सच्चे भक्तों पर क्रोध करना बड़ा भारी पाप है, मुझे क्षमा कीजिये। तब भगवान नारायण ने कहाँ तुम मेरे अपराधी नहीं हो, मैं क्षमा भी तभी करूँगा जब मेरा निर्दोष भक्त अमरीश तुम्हें क्षमा कर दें, तो समझ लेना मैंने क्षमा कर दिया। मेरे भक्त ने पिछले एक साल ने अन्न-जल त्याग रखा है इस कारण मैंने भी अन्न-जल त्याग रखा है। जिस प्रकार पुत्र के अन्न- जल त्याग देने से माँ भी चैन से नहीं रह पाती वैसे ही मेरी भी दशा है। मेरा सच्चा भक्त जब बिपत्ति में होता है, तब तक यह समझों मैं नारायण भी बिपत्ति में ही हूँ। तब भगवान नारायण से आज्ञा प्राप्त कर ऋषि दुर्वासा राजा अमिरिश के पास गए राजा अमरीश राज दरवार में उचे सिंहासन पर बैठे अपनी जनता की सेवा और न्याय कार्य की समीक्षा कर रहे थे। ''ऋषि दुर्वासा'' को देखते ही राजा अमरीश सिंहासन छोड़ भागे-भागे आयें और ऋषि दुर्वासा के चरणों में गिर गए ''ऋषि दुर्वासा'' ने देखा और उठा कर गले लगा लिया, राजा अमरीश काफी कमजोर हो गया था और उसके ओठ सूखे हुए थे। पिछले एक वर्ष से अन्न- जल छोड़ने के कारण राजा और रानी इतने कमजोर हो गए थे की पहचान में भी आना मुसकिल हो गया था । पर ''भगवान'' के इस सच्चे भक्त क्षत्रिय कुमार राजा अमरीश ने अपने कर्तव्य को नहीं छोड़ा था। तब राजा ने ''ब्राहमण दुर्वासा'' को सुन्दर छप्पन भोजन कराया और ऋषि आज्ञा से ''भगवान'' को भी छप्पन भोग लगा कर स्वयंग और अपनी पत्नी को अन्न-जल का पान कराया। तब भगवान नारायण ने उधर वैकुण्ठ में पुरे एक वर्ष के बाद भक्तों का लगाया भोग का पान किया ।
यह कथा स्वयंग ''भगवान नारायण'' धर्म से कहते है ब्रह्मवैवर्त पुराण में ।
''नयाल सनातनी''