Monday, January 19, 2015

सनातनी विचार ! ''वेदवती'' , ''छाया सीता'', और ''द्रौपदी''  यानि ''त्रिहायणी''

सत्ययुग में भगवान शंकर के परम भक्त ''वृषध्वज'' को सूर्यनारायण ने शाप दे दिया जिससे ''वृषध्वज'' की सारी ''श्री'' नष्ट हो गई । शाप देने के पश्चयात शिव भक्त जान भगवान शंकर के भय से सूर्य ब्रह्मा की शरण में चले गए। तब शंकर अपने भक्त की मुक्ति के लिए वैकुण्ठ-वासी भगवान विष्णु के पास पहुचें। तब तक दैव की प्रेरणा से 21 युग बीत चूके थे। यधपि वैकुण्ठ में अभी आधी घडीं का ही समय बिता था।  किसी से भी ना रुकने वाले अत्यंत भयंकर कालचक्र ने ''वृषध्वज'' और उसके पुत्र ''रथध्वज'' को अपना ग्रास बना लिया था। ''रथध्वज'' के दो पुत्र ''धर्मध्वज'' और ''कुशध्वज'' भी सूर्य के शाप से इस वक्त ''श्रीहीन'' हो पृथ्वी पर विचर रहे थे और ये दोनों इस संकट की घडी में भी परम ''वैष्णव धर्म'' का पालन कर रहे थे और एकमात्र लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने दिन-रात प्रार्थना-रत ही उनका एकमात्र कर्म था। 
तब भगवान शंकर की प्रार्थना पर ''श्रीहरि''  बोले हे हरे ! अब इन दोनों भाइयों की पत्नियों के उदर में हमारी कृपा से भगवती लक्ष्मी अपनी एक कला से प्रकट होगी। तब वे दोनों नरेश लक्ष्मी संपन्न हो जायेंगे। कुछ काल के बाद इस दोनों भाइयों ने कठिन तपस्या से भगवती महालक्ष्मी को प्रसन्न कर अपना अभीष्ट मनोरथ को प्राप्त किया और महालक्ष्मी से वर- प्रसाद रूप में कन्या रत्न एवं प्रथ्वीपति होने का सौभाग्य प्राप्त किया। ''कुशध्वज'' की परम साध्वी भार्या का नाम ''मालावती'' था,जिसके गर्व से भगवती लक्ष्मी की अंशरूपा कन्या का जन्म हुआ जो पैदा होते ही सूतिकागृह में स्पष्ट स्वर में वेद के मंत्रो का उच्चारण करने लगी। इसलिए ही विद्द्वान पुरुषों ने उसका नाम ''वेदवती'' रखा। उत्पन्न होते ही कन्या ने स्नान किया और तपस्या करने ''वन'' की ओर चल दी। वह तपस्विनी कन्या एक मन्वंतर तक पुष्कर क्षेत्र में तपस्या करती रही। अत्यंत घोर तपोनिष्ठ रहने पर भी उसका शरीर हृष्ट -पुष्ट बना रहा। वह हमेशा नवयौवन बनी रही। एक दिन तपस्यारत ''वेदवती'' ने आकाशवाणी सुनी कहा गया सुंदरी ! दुसरे जन्म में भगवन ''श्रीहरि'' ही तुम्हारे पति होंगें।
आकाशवाणी सुनने के बाद ''वेदवती'' गंधमादन पर्वत पर चली गई और अधिक कठोर तप करने लगी। चिरकाल तक तपस्यारत ''वेदवती'' अपने तपोबल से पहले से भी अधिक सुंदरी लगाने लगी। एक दिन दुर्निवार रावण उधर से गुजरा वह वेदवती के रूप यौवन पर मोहित हो उस तपस्विनी का श्रंगार करने लगा। ''वेदवती'' ने अपने तपोबल से रावण को स्तंभित कर दिया जिससे वह जडवत होगया। तब भयभीत रावण ने मन ही मन उस देवी की शक्ति श्रोतों से उपासना की। देवी ''वेदवती'' शक्ति की उपासन कभी विफल नहीं होती कह कर संतुष्ट होकर उस पापी को स्तम्भन से मुक्त की और साथ ही उस पापिष्ठ को यह शाप देते हुए कहाँ  ''दुरात्मन''! रावण तू मेरे लिए ही अपने बंधू - बान्धवों के साथ काल का ग्रास बनेगा; क्योकि तूने काम भाव से मुझे स्पर्श कर लिया है अतः अब मैं इस शरीर को त्याग देती हूँ ; देख ले।' देवी ''वेदवती'' ने इस प्रकार कह कर वही ''योगद्वारा'' अपने शरीर के साथ भूमि में शमा गयी। रावण महान पश्च्याताप करता हुआ अपने घर की ओर प्रयाण किया।
 वही परम तपोनिष्ठ साध्वी ''वेदवती'' ही दुसरे जन्म में ''राजर्षि जनक'' द्वारा सोने के हल चलाये जाने पर भूमि से कन्या रूप में प्रकट हुई। और महाराजा जनक को वह सौभाग्य प्रदान किया जो बड़े-बड़े योगी-मुनियों को दुर्लभ था।जिसके कारण ही रावण को मृत्यु का मुख देखना पड़ा। ''वेदवती'' बड़ी तपस्विनी थी।  पूर्वजन्म की तपस्या के प्रभाव से स्वयं भगवान श्रीराम उनके पति हुएं। ये राम ही साक्षात् परिपूर्णतम श्रीहरि है। उस सुन्दरी देवी ने बहुत दिनों तक भगवान श्रीराम के साथ सुख भोग।  उसे पूर्वजन्म की बातें स्मरण थी। कुछ काल के पश्च्यात रघुकुलभूषण, सत्यसंघ भगवान श्रीराम पिता के सत्य की रक्षा करने के लिए ''वन'' पधारे। वे सीता और लक्ष्मण के साथ समुन्द्र के समीप ठहरे हुए थे। संत-वेशधारी सत्यवादी अग्नि देव ने चिंता ग्रस्त श्रीराम से भेट की और देवताओं का आश्रय बताया। संत-भेष धारी अग्नि ने कहाँ, हे राम ! जैसे की आप सर्वग्य है अब सीता माता के हरण का समय उपस्तिथ है। ये मेरी माँ है; इन्हें मेरे संरक्षण में रखकर आप छायामयी सीता को अपने साथ रखियें; फिर वापसी में अग्नि परीक्षा के समय इन्हें मैं आपको लौटा  दूँगा। परीक्षा-लीला भी हो जाएगी। इसी कार्य के लिए देवताओं ने मुझे यहाँ भेजा है। भगवान राम ने लक्ष्मण को भी बतायें बिना सीता को अग्नि के हाथों सौंप दिया। तब अग्नि ने योगबल से मायामयी सीता प्रकट की, उसके रूप और गुण साक्षात् सीता माता सामान ही थे। अग्निदेव ने उसे राम को दे दिया। आगे माया सीता के कहने पर श्री राम ने सुवर्णमय मृग का पीछा किया राम का वाण लगने पर माया मृग हां लक्ष्मण, हाँ लक्ष्मण कहते चित हो गया। वह मृग शरीर त्याग कर दिव्य देह से संपन्न हो गया और रत्न निर्मित दिव्य विमान पर सवार होकर वैकुण्ठ धाम को चला गया। वह मारीच था जो पूर्व जन्म में वैकुण्ठ धाम के द्वार पर वहां के द्वारपाल जय और विजय का किंकर था। वह वही रहता था वह बड़ा बलवान था।  उसका नाम था ''जित'' सनकादि ऋषियों के शाप से जय- विजय के साथ वह भी राक्षस- योनि में चला गया था। श्रीराम के वाण लगने से उद्दार हुवा वह राक्षस मारीच उन द्वारपालों से पहले वही श्रीहरि के निवास वैकुण्ठ धाम में चला गया जहाँ से संतों के अपमान के कारण पतन हुआ था। वहां रावण ने छाया सीता का खेल ही खेल में हरण कर लिया। राम यह देख विलाप करने लगे सीता को खोजने बारम्बार वन के चक्कर लगाने लगे। तब गोदावरी नदी के तट पर उन्हें जटायु द्वारा सीता का समाचार मिला। राम ने बानर बने देवताओं को अपना सहायक बनाकर समुन्द्र पर पुल बांधा। पुल के द्वारा लंका में पहुँचकर उन ''रघुश्रेष्ठ'' ने अपने बाणों से बंधू- बान्धवों सहित रावण बध कर डाला। तत्पश्चायत वापसी में श्रीराम ने छाया सीता की अग्नि परीक्षा करायी और असली सीता माता को अग्नि देव ने श्रीराम को सौप दिया और देवताओं का कार्य पूर्ण किया। तब श्रीराम ने छाया सीता से कहाँ देवी तुम पुण्य क्षेत्र पुष्कर में चली जाओं और अपनी तपस्या के बलपर ही तुम्हें स्वर्ग लक्ष्मी बनने का सुअवसर प्राप्त होगा । समयानुसार वही छाया सीता राजा द्रुपद के यहाँ यज्ञं वेदी से प्रकट हुई। उसका नाम द्रोपदी पड़ा और पाँचों पाण्डव उसके पतिदेव हुए।
जब असली सीता श्रीराम के साथ चली गई तो छाया सीता श्रीराम एवं अग्नि देव के सुझाव पर शंकर भगवान की घोर तपस्या करने लगी उस समय तपस्यारत उस सुंदरी ने व्यग्र होकर पांच बार कहाँ हे भगवान त्रिलोचन ! मुझे पति प्रदान कीजिये,+5 उस समय पांच बार पति की मांग करते देख भगवान शंकर जो परम रसिक है, छाया सीता की प्रार्थना से प्रसन्न होकर बोले जाओं तुम्हें पांच पति मिलेंगे। आगे चलकर द्वापर में उसका नाम 'द्रौपदी' पड़ा और पाँचों पाण्डव उसके पतिदेव हुए।
इस प्रकार सत्ययुग में वही कल्याणी ''वेदवती'' कुशध्वज की कन्या, त्रेतायुग में छायारूप से सीता बनकर भगवान राम की सहचरी बनी तथा द्वापर युग में द्रुपद कुमारी 'द्रौपदी' हुई। अतएव इसे ''त्रिहायणी'' कहा गया है। और तीनों युगों में यह तपस्विनी विधयमान रही है। वही 'वेदवती' , ''छाया सीता'' एवं 'द्रौपदी'। महालक्ष्मी की ही अंसभूता अब वैकुण्ठ में श्रीहरि के वाम-भाग में विराजित महालक्ष्मी में ही विलीन हो चुकी है। अपने भक्तों की पुकार पर भगवान की लीला को पूर्ण करने समय-समय पर अवतरित होती रहती है।
                                                                                           ''नयाल सनातनी''        

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