सनातनी विचार !
तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि 'कवि' पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥
भावर्थ - वृक्ष अपने फल स्वयंग नहीं खाते, नदिया अपना जल खुद नहीं पीती परोकर के लिए ही ये उत्पन्न और लय होते है .
परमात्मा द्वारा उत्पन्न जड़ की अगर यह परोपकार प्रवृति है तो चेतन मानव की क्या होनी चाहिए ?
परोकर व सेवा जीवन के दो परम कर्तव्य है। यदि चेतन ( विवेकशील ) मनुष्य को यह समझ नहीं आया तो समझो पृथ्वी पर जन्म लेना बेकार गया।
''नयाल सनातनी''
तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि 'कवि' पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥
भावर्थ - वृक्ष अपने फल स्वयंग नहीं खाते, नदिया अपना जल खुद नहीं पीती परोकर के लिए ही ये उत्पन्न और लय होते है .
परमात्मा द्वारा उत्पन्न जड़ की अगर यह परोपकार प्रवृति है तो चेतन मानव की क्या होनी चाहिए ?
परोकर व सेवा जीवन के दो परम कर्तव्य है। यदि चेतन ( विवेकशील ) मनुष्य को यह समझ नहीं आया तो समझो पृथ्वी पर जन्म लेना बेकार गया।
''नयाल सनातनी''
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