Saturday, January 10, 2015

सनातनी विचार !
कल्प के पूर्वार्ध में जब-जब श्रृष्टि का दुबारा आरम्भ करते है परमात्म श्री कृष्ण तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश, धर्म,सरस्वती,महालक्ष्मी और प्रकृति (दुर्गा )आदि देवी - देवताओं के अलावा जीव मात्र के कल्याण के लिए अपने ही शरीर से अपने ही समान गुणकारी गौवंश को भी उत्पन्न करते है। !! ब्रह्मवैवर्त पुराण-ब्रह्मखण्ड !! के अनुसार एक कल्प में भगवान श्रीकृष्ण के शरीर के रोमकूपों से नित्य सुस्थिर यौवन वाली गौएँ प्रकट हुई, जिनके रूप-रंग अनेक  प्रकार के थे।  बहुतेरे बलिवर्द  (सांड), सुरभि जाति की गौएँ, नाना प्रकार के सुन्दर- सुन्दर बछड़े और अत्यंत मनोहर, श्याम वर्ण वाली बहुत-सी कामधेनु गायें भी वहां तत्काल प्रकट हो गयीं।  उनमे से एक मनोहर बलीवर्द बैल को जो करोड़ों सिंहों के सामान बलशाली था, श्रीकृष्ण ने शिव को सवारी के लिए दे दिया।
आज सभी आर्यावर्त में पाई जाने वाली देशी गौवंश का सानिंध्य प्राप्त करना भगवान श्रीकृष्ण का अनुग्रह प्राप्त करना ही है। जो मानव एक भी भारतीय गाय या बैल को अपने जीवन काल में अपने घर में पालन-पोषण कर उनकी सेवा करता है, या अन्य मानव जाति से पलवता है, प्रेरणा देता है वह निश्चित ही अपने पितरो के तारणहार और खुद गोलोक धाम जाने का अधिकारी बन जाता है, हाँ संसार को दिखाने या लोगो को ठगने अनेक गौवंश को पाल कर उनको भूखा-प्यासा रखने वाला मनुष्य वेद-पुराणों का महान पण्डित भी है तो रौरव नरको का अधिकारी ही है। याद रहे भगवान से उत्पन्न गौवंश का हक़ मार कर वर्णशंकर गौवंश को पालने वालो या वर्णशंकर जाति को बढ़ावा देने वालो की कोई गति नहीं है। यही सनातन सत्य है।
                                ''नयाल सनातनी'';--- सर्वदलीय गौरक्षा मंच

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