Thursday, July 24, 2014

सनातनी विचार ! विनम्रता ही मानव का भूषण--
राजा भोज के दरबार के महाकवि माघ विद्द्वान तो थे पर विनम्रता !
                  एक बार महाकवि वनविहार के समय राह भटक गए। जंगल में एक झोपड़ी दिखाई दी उसमे से एक बुढियां बहार निकली महाकवि ने पूछा।
१- सवाल - यह रास्ता किधर जाता है ? वृद्दा का उत्तर - रास्ता तो कही नहीं जाता पर पथिक आते -जाते है। 
२- अब वृद्धा का सवाल - आप कौन है ? उत्तर महाकवि - हम यात्री।  वृद्धा ने मुस्कराते हुए सहज भाव से कहा यात्री तो दो ही है इस संसार में एक सूर्य दूसरा चन्द्रमा आप इनमे से कौन है सच - सच बताइये।

महाकवि थोड़ा अचरज में पास गये और संभलकर बोले, हम राजा है। महाकवि ने सोचा बुढ़िया पर इसका प्रभाव पड़ेगा और आगे प्रशन नहीं करेगी। पर वृद्धा ने अगले ही पल कहा नहीं तुम राजा कैसे हो सकते हो ? राजा तो शास्त्र अनुसार दो हो सकते है। एक इंद्र  दूसरा यम आप कौन है ?
महाकवि यह सुनकर विचलित हो गए फिर बोले माँ हम क्षणभंगुर मनुष्य है। तब वृद्धा ने तत्पर कहा क्षणभंगुर भी दो ही होते है पहला धन, दूसरा यौवन। सनातन शास्त्र -पुराण कहते है कि इन दोनों का विश्वास नहीं करना चाहिए।

अब महाकवि माघ ने अंतिम दाँव फेंका। कहा हम सबको माफ़ करने वाली आत्मा है। वृद्धा ने तुरन्त कहा संसार में सबको माफ़ करने वाले तीन ही है।एक पृथ्वी दूसरी गौ, तीसरी नारी । आप इन तीनो की बराबरी किस प्रकार कर सकते हो ? महाकवि माघ अवाक् रह गए।

तब वृद्धा बोली, महाकवि माघ ! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानती हूँ।  किताबी विद्दता के साथ मनुष्य में विनम्रता भी होनी चाहिये न क़ि अहंकार। '' यह सुनकर माघ का गर्व सदैव के लिए चूर हो गया।  पर क्या यह सब जानने के बाद भी अपनी गलती पर आज के विद्द्वानो का गर्व सदैव के लिए चूर होता है ?
                                                    ''नयाल सनातनी'' 

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