कोटि कल्प काशी बसे मथुरा कल्प हजार। एक निमिष सरयू बसे तुले न तुलसी दास।।???
अब जबाब देना लाजमी हो गया जब किसी का सकारत्मक जबाब नहीं आया दो दिन बाद भी ------गोस्वामी बाबा तुलसी दास जी ने इस लिए शरयु को इतना महत्व दिया क्योकि शरयु की उत्तपति सिर्फ भगवान के अयोध्या में अवतार लेने के कारण महर्षि वशिष्ठ के घोर तपश्या के फल स्वरुप हुआ .साथ ही जब वशिष्ठ महामुनि शरयु नदी को भगवान शिव की घोर तपश्या के फलस्वरूप हिमालय पर्वत के सहायता से धरती पर ले आये तो बागेश्वर नामक उत्तर की काशी के पास एक शीला पर महर्षि मारकंडे की घोर तपश्या के कारण शरयु का मार्ग अवरूद्द हो गया .शरयु ने महर्षि वशिष्ठ को कहाँ आगे महर्षि मारकंडे तपश्या रत है अगर मेरा बेग उनको छू भी गया उनकी तपश्या भंग हुई तो महर्षि मारकंडे मेरा सारा जल का आचमन कर सुखा देंगे पहले उनको राह से हटाने की कोई तरकीब सोचो तब इस शरयु कुंड से मैं आगे प्रस्थान करुँगी . यह सुन वशिष्ठ महामुनि धर्म संकट में पड गए फिर से भगवान शिव की घोर तपश्या की भगवान शिव प्रकट हुए और सारी समस्या सुन महर्षि वशिष्ठ को कहा जाओं आपकी सबही मनोकामना पूर्ण होगी महर्षि मारकंडे को हम रास्ते से हटा देंगे . अब भगवान शिव ने भगवती पारवती से कहाँ प्रिये तुम गाय का रूप धरो और मैं बाघ का मैं आपके पीछे भागूँगा और तुम जोर जोर से राम्हाना पहले के संत ऋषि गौ की करुण पुकार सुन अपनी बड़ी से बड़ी तपस्या छोड़ गौ रक्षा को तत्पर रहते थे आज की तरह नहीं है की लाखो गौवंश नित्य कट रहा संतो को गहरी नीद का स्वाद लगा है .खैर जैसे ही गौमाता रंभाने लगी महर्षि मारकंडे ने गाय की करुण पुकार सुन तपस्या छोड़ अपने कमंडल का जल से कुछ छीटे गाय और बाघ के ऊपर डाले तो साक्षात् भगवान शिव और जगत जननी पारवती प्रकट हो गए .संत ने कहाँ भगवान यह क्या कौतुहल है आप और मेरी माँ इस रूप में क्यों ?भगवान शिव ने कहाँ पहले तुम बताओं तुम क्यों इतनी घोर तपस्या में हो की सदियों से वशिष्ठ के द्वारा अपने तप बल से लायी शरयु का रास्ता रोके खड़े हो . महर्षि मारकंडे बोले भगवन मेरा तपश्या का फल तो आपने दे दिया मेरा उद्देश्य जगत माता-पिता के एक साथ दर्शन करना था . भगवान शिव ने कहाँ अब आपका उद्देश्य पूर्ण हुआ अब शरयु को रास्ता दे दो तब महर्षि मारकंडे बोले भगवन एक और वरदान दे दीजिये की आप अब हमेशा के लिए इस स्थान पर बाघ और माता पारवती गाय के रूप में विराजमान हो जाईये .और कल्युग प्रयन्त जो भी गौ भक्त एक बार आपका इस रूप में दर्शन नहीं करेगा उसकी गौभक्ति पूर्ण नहीं मानी जाएगी .भगवान शिव ने कहाँ तथास्तु . जय शरयु को अयोध्या तक पहुचाने के लिए भगवानशिव को बाघ बनना पड़ा , भगवती पारवती को गाय बनना पड़ा, मारकंडे मुनि को घोर तपस्या छोड़नी पड़ी , वशिष्ठ महामुनि को घोर तपस्या के बल पर भगवान शिव की प्रसन्ता से हिमालय के माध्यम से धरती पर लाने का सौभाग्य प्राप्त हुवा भगवान श्री राम का कुल गुरु बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ . भगवान शिव के अपने अराध्य विष्णु के अवतार श्री राम के रूप में दर्शन प्राप्त हुआ .जिस शरयु के कारण पूरा अयोध्या क्षेत्र हरित क्रांति से लहलहा उठा जी कारण करोडो भगवान की प्रिय गायो को भरपेट हरा चारा मिला,जिस चारे के कारण गौ वंश इतना बड़ा की भगवान श्री राजा राम प्रति दिन लाखो गौ का दान किये . जिसके तट पर भगवान राम के एक से एक बलवान, ज्ञान वान पूर्वज पैदा हुए . जिस शरयु के तट पर परम तपस्वी मनु और सतरूपा , कश्यप और आदित्य को दसरथ और कौसल्या के रूप में जन्म लेना पड़ा . वह शरयु जिसके तट पर अयोध्या बसा और करोडो जीवो का उद्धार हुआ आज भी परम तपश्वी संत जन जहाँ तप रत है. जहाँ पर हनुमान जी आज भी मेरे गुरुदेव नृत्य गोपाल दास जी के रूप में हजारो-लाखो संत-महंत और तीर्थ यात्रियों की सेवा में लगे हुए है . भला उस शरयु के तट पर एक निमिष में कल्याण क्यों ना हो जीव का .इसीलिए गोस्वामी जिनका नाम गोस्वामी गाय की सेवा करने के कारण ही पड़ा यह क्यों ना कहे भला की .-----------------------------------कोटि कल्प काशी बसे मथुरा कल्प हजार। एक निमिष सरयू बसे तुले न तुलसी दास।। ''नयाल सनातनी'' गौ-चरणों का दास
अब जबाब देना लाजमी हो गया जब किसी का सकारत्मक जबाब नहीं आया दो दिन बाद भी ------गोस्वामी बाबा तुलसी दास जी ने इस लिए शरयु को इतना महत्व दिया क्योकि शरयु की उत्तपति सिर्फ भगवान के अयोध्या में अवतार लेने के कारण महर्षि वशिष्ठ के घोर तपश्या के फल स्वरुप हुआ .साथ ही जब वशिष्ठ महामुनि शरयु नदी को भगवान शिव की घोर तपश्या के फलस्वरूप हिमालय पर्वत के सहायता से धरती पर ले आये तो बागेश्वर नामक उत्तर की काशी के पास एक शीला पर महर्षि मारकंडे की घोर तपश्या के कारण शरयु का मार्ग अवरूद्द हो गया .शरयु ने महर्षि वशिष्ठ को कहाँ आगे महर्षि मारकंडे तपश्या रत है अगर मेरा बेग उनको छू भी गया उनकी तपश्या भंग हुई तो महर्षि मारकंडे मेरा सारा जल का आचमन कर सुखा देंगे पहले उनको राह से हटाने की कोई तरकीब सोचो तब इस शरयु कुंड से मैं आगे प्रस्थान करुँगी . यह सुन वशिष्ठ महामुनि धर्म संकट में पड गए फिर से भगवान शिव की घोर तपश्या की भगवान शिव प्रकट हुए और सारी समस्या सुन महर्षि वशिष्ठ को कहा जाओं आपकी सबही मनोकामना पूर्ण होगी महर्षि मारकंडे को हम रास्ते से हटा देंगे . अब भगवान शिव ने भगवती पारवती से कहाँ प्रिये तुम गाय का रूप धरो और मैं बाघ का मैं आपके पीछे भागूँगा और तुम जोर जोर से राम्हाना पहले के संत ऋषि गौ की करुण पुकार सुन अपनी बड़ी से बड़ी तपस्या छोड़ गौ रक्षा को तत्पर रहते थे आज की तरह नहीं है की लाखो गौवंश नित्य कट रहा संतो को गहरी नीद का स्वाद लगा है .खैर जैसे ही गौमाता रंभाने लगी महर्षि मारकंडे ने गाय की करुण पुकार सुन तपस्या छोड़ अपने कमंडल का जल से कुछ छीटे गाय और बाघ के ऊपर डाले तो साक्षात् भगवान शिव और जगत जननी पारवती प्रकट हो गए .संत ने कहाँ भगवान यह क्या कौतुहल है आप और मेरी माँ इस रूप में क्यों ?भगवान शिव ने कहाँ पहले तुम बताओं तुम क्यों इतनी घोर तपस्या में हो की सदियों से वशिष्ठ के द्वारा अपने तप बल से लायी शरयु का रास्ता रोके खड़े हो . महर्षि मारकंडे बोले भगवन मेरा तपश्या का फल तो आपने दे दिया मेरा उद्देश्य जगत माता-पिता के एक साथ दर्शन करना था . भगवान शिव ने कहाँ अब आपका उद्देश्य पूर्ण हुआ अब शरयु को रास्ता दे दो तब महर्षि मारकंडे बोले भगवन एक और वरदान दे दीजिये की आप अब हमेशा के लिए इस स्थान पर बाघ और माता पारवती गाय के रूप में विराजमान हो जाईये .और कल्युग प्रयन्त जो भी गौ भक्त एक बार आपका इस रूप में दर्शन नहीं करेगा उसकी गौभक्ति पूर्ण नहीं मानी जाएगी .भगवान शिव ने कहाँ तथास्तु . जय शरयु को अयोध्या तक पहुचाने के लिए भगवानशिव को बाघ बनना पड़ा , भगवती पारवती को गाय बनना पड़ा, मारकंडे मुनि को घोर तपस्या छोड़नी पड़ी , वशिष्ठ महामुनि को घोर तपस्या के बल पर भगवान शिव की प्रसन्ता से हिमालय के माध्यम से धरती पर लाने का सौभाग्य प्राप्त हुवा भगवान श्री राम का कुल गुरु बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ . भगवान शिव के अपने अराध्य विष्णु के अवतार श्री राम के रूप में दर्शन प्राप्त हुआ .जिस शरयु के कारण पूरा अयोध्या क्षेत्र हरित क्रांति से लहलहा उठा जी कारण करोडो भगवान की प्रिय गायो को भरपेट हरा चारा मिला,जिस चारे के कारण गौ वंश इतना बड़ा की भगवान श्री राजा राम प्रति दिन लाखो गौ का दान किये . जिसके तट पर भगवान राम के एक से एक बलवान, ज्ञान वान पूर्वज पैदा हुए . जिस शरयु के तट पर परम तपस्वी मनु और सतरूपा , कश्यप और आदित्य को दसरथ और कौसल्या के रूप में जन्म लेना पड़ा . वह शरयु जिसके तट पर अयोध्या बसा और करोडो जीवो का उद्धार हुआ आज भी परम तपश्वी संत जन जहाँ तप रत है. जहाँ पर हनुमान जी आज भी मेरे गुरुदेव नृत्य गोपाल दास जी के रूप में हजारो-लाखो संत-महंत और तीर्थ यात्रियों की सेवा में लगे हुए है . भला उस शरयु के तट पर एक निमिष में कल्याण क्यों ना हो जीव का .इसीलिए गोस्वामी जिनका नाम गोस्वामी गाय की सेवा करने के कारण ही पड़ा यह क्यों ना कहे भला की .-----------------------------------कोटि कल्प काशी बसे मथुरा कल्प हजार। एक निमिष सरयू बसे तुले न तुलसी दास।। ''नयाल सनातनी'' गौ-चरणों का दास

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