Friday, January 9, 2015

सनातनी विचार ! सावधान भगवान की ''कथामृत'' बिकाऊ नहीं है -------------
कुछ कथा वाचक भगवान की ''कथामृत'' को भी बोली लगा कर बेच रहे है क्या उनका उद्धार संभव है ? जो अपना उद्धार नहीं कर सकते वे आपका उद्धार कर पाएंगे ? उन  विराट भगवान की कथाओं का प्रचार करने वाले भगवान शिव ने जहर पी कर भी भगवान की लीलाओं का निशुल्क गुणगान किया। माता सति भगवान की कथा का प्रचार-प्रसार हो इसलिए हवन कुण्ड की जलती अग्नि में कूद कर स्वाहा हो गई। काकभुशंडी जी हिमालय के कन्दराओं में रह कर पक्षियों को निशुल्क कथा अमृत पान कराते है।  नारद जी तीनो लोको में भगवान की कथा का निशुल्क प्रचार - प्रसार करते है। महर्षि वेद व्यास जी भगवान की कथाओं को निशुल्क लिखे और संसार के जीवों के कल्याण हो इसलिए अनेक पुराणों की रचना की । सनक, सनन्दन, सनातन, संतनकुमार 5 वर्ष के बालक के रूप  भगवान की कथा का निशुल्क प्रचार-प्रसार करते है। सुकदेव जी जो भागवत कथा के मुख्य प्रचारक कहें गए क्या उन्हों भगवान की कथा करने का कोई शुल्क लिया ? फिर आज के कथा वाचक क्यों अपनी फीस तय करते है ? येसा ना करें भगवान की कथा को बेचने वाला ''रौरव नरकों'' का भागी होता है।  कुछ लोगो ने पहले भागवत कथा में भगवान श्रीकृष्ण,राधा जी और सुदामा नाम को खूब बेचे, फिर श्री राम कथा में केवट और निषाद राज को बेचा, शिव पुराण कथा - दुर्गा, देवी भागवत कथा आदि बेचते-बचेते अब ''गौ कथा'' बेचने लगे है। सभी कथावाचकों से करबद्द निवेदन भगवान की पवित्र ''कथामृत'' का सौदा ना करें, पाखंड और ठगी वहां काम नहीं आती जहाँ आखिर में सबको जाना है । कभी-कभी सुदूर पहाड़ी गावं-देहात में जाकर गरीब और निसक्तों को भी कथा सुनाएँ ताकि भुत प्रेत ,टोटा-टमका,धर्म-परिवर्तन वाले अन्धविश्वास से गावों में रहने वाले मुक्त हो सकें। यह कठिन मार्ग है पर साधकों के लिए सुलभ भी है यही मार्ग से ही यह मानव जन्म धन्य होगा और मुक्ति मार्ग परस्त होगा। --- धर्म की जय हो, अधर्म का नास हो, ....
                                   ''नयाल सनातनी''

2 comments:


  1. सनातनी विचार !
    तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
    कहि 'कवि' पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥
    भावर्थ - वृक्ष अपने फल स्वयंग नहीं खाते, नदिया अपना जल खुद नहीं पीती परोकर के लिए ही ये उत्पन्न और लय होते है .
    परमात्मा द्वारा उत्पन्न जड़ की अगर यह परोपकार प्रवृति है तो चेतन मानव की क्या होनी चाहिए ?
    परोकर व सेवा जीवन के दो परम कर्तव्य है। यदि चेतन ( विवेकशील ) मनुष्य को यह समझ नहीं आया तो समझो पृथ्वी पर जन्म लेना बेकार गया।
    ''नयाल सनातनी''

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