Saturday, February 28, 2015

सनातनी विचार ! करो आत्मचिंतन ।
अपने कर्म और अपने को सबकुछ मान लेना ! अहंकार रूपी कल्युग के इस महाभूत से कही आप भी तो परेशान नहीं ?
अहंकार से बचने के लिए आत्मचिंतन जरूरी है। हमेशा हमें यह सोचना चाहिए की जो वस्तु हमारे पास है वह क्षणभंगुर है। यह भी सत्य है कि मूल्य, अच्छाइयां, धन, दौलत और ज्ञान सब उस परम सत्य परमात्मा की ही देन है। फिर अभिमान करने का कोई मतलब नहीं है।
                           ''नयाल सनातनी''

Wednesday, February 25, 2015

सनातनी विचार !
हमारी मर्जी से हम एक पल भी नहीं जी सकते। पर परमात्मा कृष्ण एवं उसकी प्यारी गौ की कृपा हो जाय तो निरोगी काया के साथ-साथ मोक्ष भी सुलभ है।
 वह कोन है ? वह है कृष्ण , गौमाता और गौमाता का अमृत-मयी पञ्च गव्य।
                         ''नयाल सनातनी''

Monday, February 23, 2015

सर्वदलीय गौरक्षा मंच की प्रेस विज्ञप्ति बताया गया है की ''माँ नन्द एवं नैना देवी'' के पुण्य भूमि नैनीताल जिल्ले के हल्द्वानी में मंच की ओर से आदर्श गौ-निवास ''श्री गिरधर गोपाल गौशाला'' रजिस्टर्ड का निर्माण कार्य बहुत तेजी से हो रहा है। जल्द ही उत्तरखंड के मुख्य मंत्री जी से इस गौ-निवास के उद्घाटन की कोशिस जारी है। गौशाला में वर्तमान में तीन सेड बन चुके है, जिनके लगभग 100 गौवंश के लिए पर्याप्त स्थान है। साथ ही सहयोग से आगे 45 x 30 का  पक्का गौ-निवास भी बनाने का विचार है जिसमे पहले माले पर 16 संस्कार केंद्र एवं गौ आधारित प्रसिक्षण केंद्र स्थापना की योजना है । साथ ही कुट्टी- हरा -सुखा चारे हेतु एक बड़े कमरे का निर्माण भी पूर्ण हो चूका है।  गौशाला में एक सुन्दर रेम्प बना कर उच्च स्थान में श्री गिरधर गोपाल भगवान का पहाड़ की आकार का सुन्दर मंदिर निर्माण चल रहा है, जो गौशाला के साथ-साथ गौभक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र होगा। गौशाला समिति के अनुसार गौशाला में पहाड़ की देशी गौवंश को संग्रक्षित करने के आलावा यहाँ पर देश भर की 28 प्रजाति की देशी गौवंश की ब्रिड को संग्रक्षित करने पर भी विचार किया जा रहा है। इस आदर्श गौशाला के प्रारम्भ के बाद जल्द ही ''सर्वदलीय गौरक्षा मंच'' पुरे उत्तराखण्ड के हर जिल्ले में एक आदर्श गौ-निवास की स्थापना की योजना पर भी कार्य कर रही है ताकि आवारा और ग्राम वासियों के लिए बेकार गौवंश को संगरक्षण दिया जा सके। पुरे देश में गौवंश पर हो रहे अत्याचार की तरह यहाँ पहाड़ में भी गौवंश को गावं से निकाल कर जंगलों में छोड़ दिया जा रहा है। यह छोड़ा हुआ गौवंश या तो बाघ शेर का निवाला बनाता है,या कसाई इन्हें उठा ले जाते है। कुछ घटनाएँ तो येसी सुनने में आई खेतो का नुकसान होता देख ग्राम वासी गौवंश को जंगल में किसी पेड़ पर कस कर बाध कर आ जाते है जिससे गौवंश भूख प्यास से अपने प्राण त्याग देते है। इस सब परिस्तिथियों को देख कर ही मंच ने अब पहाड़ में गौ सेवा का कार्य सुरु किया है क्योकि शहर में सेवा और सहयोगी बहुत हो जाते है पर गावँ में सहयोग ही महान पुण्य का कार्य है।
भूमि अधिग्रहण --- सनातनी विचार !
   सिर्फ किसानों की भूमि अधिग्रहण के खिलाफ ही नहीं ''अन्ना हजारे जी'' को भूमि एवं किसानों की मूल गाय की हत्या के खिलाफ भी आवाज उठानी चाहिए तभी सार्थक पहल मानी जाएगी। बर्ना किसान एवं जमीन की माँ + बाप ''गाय और बैलों'' की हत्या से किसान एवं भूमि दोनों को आगे जाकर आत्महत्या जैसे हालातों से फिर भी गुजना ही होगा।
                         ''नयाल सनातनी''

Friday, February 20, 2015

सनातनी विचार !
सिर्फ जय श्री राम बोल देने से कोई भी मनुष्य प्रमाणित राम भक्त नहीं हो जाता ! समय पड़ने पर हनुमान जी की तरह राम भक्ति का परिचय भी देना होगा। श्री राम, श्री कृष्ण ने जो जगत कल्याण के कार्य किये है उस राह पर चलना भी होगा। वैसे ही सिर्फ फेसबुक, वाटसफ,
''सोसियल मिडिया'' पर जय गौमाता की कहने से गाय का पेट नहीं भरता ना ही कसाई आप की जय गौ-माता बोलने से गौ-माताओं के गले पर से छुरी हटायेगा। अब समय आ गया है, अब  ''सोसियल मिडिया'' से बाहर निकल कर सार्वजनिक गौशालायें  बनायें गौ-माता के प्राण बचायें . या जो कृष्ण के भक्त गौ-प्रेमी गौशाला निर्माण कर रहे है उनकी यथा शक्ति सहयोग करें। जब आज का मानव अपने लिए 50 लाख,एक करोड़ का मकान बना सकता है तो उसका 100वा हिस्सा तो गौसेवा में लगा ही सकता है।
सोचो आपकी सोच से यह जमाना बदल सकता है। गौवंश बच सकता है। धरती से पाप कुछ कम हो सकता है। ---
''नयाल सनातनी''

Monday, February 16, 2015

सनातनी विचार ! अति पावन ''शिव-रात्रि'' की कोटि-कोटि शुभ कामना विश्व-जनमानस को ---
       भगवान शंकर एवं भारतीय देशी गौमाता के गुणोँ में हमें तनिक भी अन्तर नहीं दिखता। जहाँ भगवन शंकर देवताओं के हित में हलाहल विष पीकर स्वार्थी देवताओं के लिए अमृत  छोड़ देते है।  उसी प्रकार हमारी देशी प्रजाति की गौमातायें भी मानव-प्रदत्त कूड़ा-कर्कट,जहर युक्त पोलथिन,प्रदूषित जल, रासायनिक जहरीला घास खाकर भी अमृत स्वरुप दूध स्वार्थी मानव को सदा परोषती आयी है।
यह इसलिए भी ''कैलाश वाले भोले बाबा'' का परिवार सदा दोनों हाथो से लूटाता रहा है। ( इसलिए इनको संसार देवता यानि देने वाला कहता है ) ये जो भारतीय गौमाता है यही माता जगदम्बा है। इनका स्वाभाव ही है देना। इस माता ने अपने ही पुत्र को संसार के स्वामी शिव एवं संसार भर के मानव जाती के हित में  भार उठाने वाला बना दिया ''नन्दी बैल महाराज'' को इससे बड़ा त्याग क्या होगा एक माँ का हम स्वार्थी मानव न समझे थे न समझंगे ?
गौ-भक्त मित्रों जब आप कामधेनु की तस्वीर देखते हो उसमे अनेक देवी-देवता का निवास दिखता है। किसी का पीठ पर, तो किसी का मुख पर, किसी का पूछ पर, गोबर-गोमूत्र में भी देवता बसते है। इसप्रकार 33 कोटि देवी-देवता दिखायें गए है।  पर इस कामधेनु गौ में  भगवती जगदम्बा की तस्वीर कही नहीं होगी क्योकि ''भगवती जगदम्बा'' शिव भार्या शिवा-पार्वती जी ने ही कालन्तर में अपना एक रूप जगत कल्याण हेतु स्वयंग गौमाता का रखा था देव भूमि उत्तराखंड के पवित्र तीर्थ बागेश्वर धाम में । जय देव भूमि,जय गजद कल्याणी गौ-स्वरूपा शिवा, जय जगदाधार कल्याण कारक शिव-शंकर नमन, आपको एवं आपके परिवार को,आपके पवित्र धाम को भी हम सब भक्तों का नमन ।
                                                       ''नयाल सनातनी''

Sunday, February 15, 2015

सनातनी विचार !
गौ-निवास-गोष्ठ एवं आदर्श गौशाला ( 33 करोड़ देवी - देवताओं का देवालय ) जहाँ सिर्फ देश, भारतीय प्रजाति के गौवंश हो में किया गया सतकर्म करोड़ों-करोड़ों गुना आधिक फल देता है। ''गाय के विना गति नहीं, वेद के विना मति नहीं'' !
जैसे -----
1 - पुंसवन संस्कार ! गर्भस्थ शिशु के मानसिक विकास की दृष्टि से यह संस्कार उपयोगी समझा जाता है। गर्भाधान के दूसरे या तीसरे महीने में इस संस्कार को करने का विधान है। हमारे मनीषियों ने सन्तानोत्कर्ष के उद्देश्य से किये जाने वाले इस संस्कार को अनिवार्य माना है। गर्भस्थ शिशु से सम्बन्धित इस संस्कार को शुभ नक्षत्र में सम्पन्न किया जाता है। पुंसवन संस्कार का प्रयोजन स्वस्थ एवं उत्तम संतति को जन्म देना है। विशेष तिथि एवं ग्रहों की गणना के आधार पर ही गर्भधान करना उचित माना गया है। यह ''पुंसवन संस्कार'' अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ -शाला में अनेको गौमाताओं और नंदी बैल, एवं बछड़े - बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों  गुना पुण्य दायी होता है। 

2 -  सीमन्तोन्नयन संस्कार !  सीमन्तोन्नयन को सीमन्तकरण अथवा सीमन्त संस्कार भी कहते हैं। सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना। गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की मांग भरती हैं। यह संस्कार गर्भ धारण के छठे अथवा आठवें महीने में होता है।
 यह ''सीमन्तोन्नयन संस्कार'' अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी बैल भगवान , एवं बछड़े - बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों  गुना पुण्य दायी होता है। 

3 - नामकरण ! जन्म के ग्यारहवें दिन यह संस्कार होता है। हमारे धर्माचार्यो ने जन्म के दस दिन तक अशौच (सूतक) माना है। इसलिये यह संस्कार ग्यारहवें दिन करने का विधान है। महर्षि याज्ञवल्क्य का भी यही मत है, लेकिन अनेक कर्मकाण्डी विद्वान इस संस्कार को शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना उचित मानते हैं। नामकरण संस्कार का सनातन धर्म में अधिक महत्व है। हमारे मनीषियों ने नाम का प्रभाव इसलिये भी अधिक बताया है क्योंकि यह व्यक्तित्व के विकास में सहायक होता है। तभी तो यह कहा गया है राम से बड़ा राम का नाम हमारे धर्म विज्ञानियों ने बहुत शोध कर नामकरण संस्कार का आविष्कार किया। ज्योतिष विज्ञान तो नाम के आधार पर ही भविष्य की रूपरेखा तैयार करता है। अगर यह ''नामकरण संस्कार'' स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी बैल भगवान , एवं बछड़े - बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों  गुना पुण्य दायी होता है। 

4 - निष्क्रमण संस्कार ! दैवी जगत् से शिशु की प्रगाढ़ता बढ़े तथा ब्रह्माजी की सृष्टि से वह अच्छी तरह परिचित होकर दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करे यही इस संस्कार का मुख्य उद्देश निष्क्रमण का अभिप्राय है। 
बाहर निकलकर इस संस्कार में शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है। भगवान भास्कर के तेज तथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है। इसके पीछे मनीषियों की शिशु को तेजस्वी तथा विनम्र बनाने की परिकल्पना होगी। उस दिन देवी-देवताओं के दर्शन, 33 कोटि देवी देवताओं को धारण करने वाली गौमाताओं का दर्शन तथा उनसे शिशु के दीर्घ एवं यशस्वी जीवन के लिये आशीर्वाद ग्रहण कराया जाता है। जन्म के चौथे महीने इस संस्कार को करने का विधान है। तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये प्राय: तीन मास तक उसे बहुत सावधानी से घर में रखना चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो। विद्द्वानो के मतानुसार इस संस्कार के बाद माँ के दूध के आलावा गौमाता का दूध भी दिया जाना सुरु किया जाता है।
इस ''निष्क्रमण संस्कार'' की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े - बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी माना गया है। 

5 - अन्नप्राशन संस्कार ! इस संस्कार का उद्देश्य शिशु के शारीरिक व मानसिक विकास पर ध्यान केन्द्रित करना है। अन्नप्राशन का स्पष्ट अर्थ है कि शिशु जो अब तक पेय पदार्थो विशेषकर अपनी माता एवं गौमाता के दूध पर आधारित था अब अन्न जिसे शास्त्रों में प्राण कहा गया है उसको ग्रहण कर शारीरिक व मानसिक रूप से अपने को बलवान व प्रबुद्ध बनाए। तन और मन को सुदृढ़ बनाने में अन्न का सर्वाधिक योगदान है। शुद्ध, सात्विक एवं पौष्टिक आहार से ही तन स्वस्थ रहता है और स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। आहार शुद्ध होने पर ही अन्त:करण शुद्ध होता है तथा मन, बुद्धि, आत्मा सबका पोषण होता है। इसलिये इस संस्कार का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। हमारे धर्माचार्यो ने अन्नप्राशन के लिये जन्म से छठे महीने को उपयुक्त माना है। छठे मास में शुभ नक्षत्र एवं शुभ दिन देखकर यह संस्कार करना चाहिए। गौ दुग्ध से बनी खीर और मिठाईयां शिशु के अन्नग्रहण में अत्यधिक शुभ माना गया है। अमृत: क्षीरभोजनम् हमारे शास्त्रों में खीर को अमृत के समान उत्तम माना गया है। इस ''अन्नप्राशन संस्कार'' की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े - बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी माना गया है। 

6 - चूड़ाकर्म संस्कार ! चूड़ाकर्म को मुंडन संस्कार भी कहा जाता है। हमारे आचार्यो ने बालक के पहले, तीसरे या पांचवें वर्ष में इस संस्कार को करने का विधान बताया है। इस संस्कार के पीछे शुाचिता और बौद्धिक विकास की परिकल्पना हमारे मनीषियों के मन में होगी। मुंडन संस्कार का अभिप्राय है कि जन्म के समय उत्पन्न अपवित्र बालों को हटाकर बालक को प्रखर बनाना है। नौ-माह तक गर्भ में रहने के कारण कई दूषित किटाणु उसके बालों में रहते हैं। मुंडन संस्कार से इन दोषों का सफाया होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस संस्कार को शुभ मुहूर्त में करने का विधान है। वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ यह संस्कार अगर किसी पवित्र वातावरण वाले गौष्ठ या गौनिवास में सम्पन्न हो तो बहुत उत्तम माना गया है।
इस '' चूड़ाकर्म संस्कार'' की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े - बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी माना गया है। 

7 - विद्यारम्भ संस्कार ! विद्यारम्भ का अभिप्राय बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तो बालक को वेदाध्ययन के लिये भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था। माँ-बाप तथा गुरुजन पहले उसे मौखिक रूप से श्लोक, पौराणिक कथायें आदि का अभ्यास करा दिया करते थे ताकि गुरुकुल में कठिनाई न हो। हमारा शास्त्र विद्यानुरागी है। शास्त्र की उक्ति है सा विद्या या विमुक्तये अर्थात् विद्या वही है जो मुक्ति दिला सके। विद्या अथवा ज्ञान ही मनुष्य की आत्मिक उन्नति का साधन है। शुभ मुहूर्त में ही विद्यारम्भ संस्कार करना चाहिये। इस ''विद्यारम्भ संस्कार'' की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में विद्वान आचार्य अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े - बछियों  के पवित्र सानिंध्य में कराएँ तो बालक अनेकों गुना विद्द्वान विद्यार्थी होता है। 

8 -  कर्णवेध संस्कार ! हमारे मनीषियों ने सभी संस्कारों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के बाद ही प्रारम्भ किया है। कर्णवेध संस्कार का आधार बिल्कुल वैज्ञानिक है। बालक की शारीरिक व्याधि से रक्षा ही इस संस्कार का मूल उद्देश्य है। प्रकृति प्रदत्त इस शरीर के सारे अंग महत्वपूर्ण हैं। कान हमारे श्रवण द्वार हैं। कर्ण वेधन से व्याधियां दूर होती हैं तथा श्रवण शक्ति भी बढ़ती है। इसके साथ ही कानों में आभूषण हमारे सौन्दर्य बोध का परिचायक भी है।
यज्ञोपवीत के पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष के शुभ मुहूर्त में इस संस्कार का सम्पादन श्रेयस्कर है।
 इस ''कर्णवेध संस्कार'' की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े - बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी माना गया है। 

9 -  यज्ञोपवीत संस्कार ! यज्ञोपवीत अथवा उपनयन बौद्धिक विकास के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। धार्मिक और आधात्मिक उन्नति का इस संस्कार में पूर्णरूपेण समावेश है। हमारे मनीषियों ने इस संस्कार के माध्यम से वेदमाता गायत्री को आत्मसात करने का प्रावधान दिया है। आधुनिक युग में ब्रह्मलीन पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी आदि अनेको विद्द्वानो ने भी गायत्री मंत्र पर विशेष शोध किया है। गायत्री सर्वाधिक शक्तिशाली मंत्र है। यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं अर्थात् यज्ञोपवीत जिसे जनेऊ भी कहा जाता है अत्यन्त पवित्र है। प्रजापति ने स्वाभाविक रूप से इसका निर्माण किया है। यह आयु को बढ़ानेवाला, बल और तेज प्रदान करनेवाला है। इस संस्कार के बारे में हमारे धर्मशास्त्रों में विशेष उल्लेख है। यज्ञोपवीत धारण का वैज्ञानिक महत्व भी है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी उस समय प्राय: आठ वर्ष की उम्र में यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न हो जाता था। इसके बाद बालक विशेष अध्ययन के लिये गुरुकुल जाता था। यज्ञोपवीत से ही बालक को ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी जाती थी जिसका पालन गृहस्थाश्रम में आने से पूर्व तक किया जाता था। इस संस्कार का उद्देश्य संयमित जीवन के साथ आत्मिक विकास में रत रहने के लिये बालक को प्रेरित करना है। इस पवित्र ''यज्ञोपवीत संस्कार'' की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में विद्वान आचार्य अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े - बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी होता  है। 

10  - वेदारम्भ संस्कार ! ज्ञानार्जन से सम्बन्धित है यह संस्कार। वेद का अर्थ होता है ज्ञान और वेदारम्भ के माध्यम से बालक अब ज्ञान को अपने अन्दर समाविष्ट करना शुरू करे यही अभिप्राय है इस संस्कार का। शास्त्रों में ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई प्रकाश नहीं समझा गया है। स्पष्ट है कि प्राचीन काल में यह संस्कार मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व रखता था। यज्ञोपवीत के बाद बालकों को वेदों का अध्ययन एवं विशिष्ट ज्ञान से परिचित होने के लिये योग्य आचार्यो के पास गुरुकुलों में भेजा जाता था। वेदारम्भ से पहले आचार्य अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने एवं संयमित जीवन जीने की प्रतिज्ञा कराते थे तथा उसकी परीक्षा लेने के बाद ही वेदाध्ययन कराते थे। असंयमित जीवन जीने वाले वेदाध्ययन के अधिकारी नहीं माने जाते थे। हमारे चारों वेद ज्ञान के अक्षुण्ण भंडार हैं।
इस अति महत्वपूर्ण ''वेदारम्भ संस्कार''  की सुरुवात विद्द्वान आचार्य महोदय के श्रीमुख से स्वच्छ, सुन्दर वातावरण वाली गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े - बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी माना गया है। क्योकि सनातन धर्म के अनुसार ''गौमाता'' के सानिंध्य में किया गया वेद पाठ 33 करोड़ देवी-देवताओं के सानिंध्य में किया गया पाठ माना जाता है। 

11 - केशान्त संस्कार ! गुरुकुल में वेदाध्ययन पूर्ण कर लेने पर आचार्य के समक्ष यह संस्कार सम्पन्न किया जाता था। वस्तुत: यह संस्कार गुरुकुल से विदाई लेने तथा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का उपक्रम है। वेद-पुराणों एवं विभिन्न विषयों में पारंगत होने के बाद ब्रह्मचारी के समावर्तन संस्कार के पूर्व बालों की सफाई की जाती थी तथा उसे स्नान कराकर स्नातक की उपाधि दी जाती थी। केशान्त संस्कार शुभ मुहूर्त में किया जाता था।
पहले गुरुकुलों में ही बड़ी-बड़ी गौशालाएं हुआ करती थी पर अब वह समय नहीं रहा इस लिए इस  ''केशान्त संस्कार'' को अगर विद्द्वान आचार्य स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े - बछियों  के पवित्र सानिंध्य में करायें तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी होजाता है। 

12 - समावर्तन संस्कार !  गुरुकुल से विदाई लेने से पूर्व शिष्य का समावर्तन संस्कार होता था। इस संस्कार से पूर्व ब्रह्मचारी का केशान्त संस्कार होता था और फिर उसे स्नान कराया जाता था। यह स्नान समावर्तन संस्कार के तहत होता था। इसमें गौ-मूत्र, गंगा-जल,गुलाब-जल, सुगन्धित पदार्थो एवं औषधादि युक्त जल से भरे हुए वेदी के उत्तर भाग में आठ घड़ों के जल से स्नान करने का विधान है। यह स्नान विशेष मन्त्रोच्चारण के साथ होता था। इसके बाद ब्रह्मचारी मेखला व दण्ड को छोड़ देता था जिसे यज्ञोपवीत के समय धारण कराया जाता था। इस संस्कार के बाद उसे विद्या स्नातक की उपाधि आचार्य देते थे। इस उपाधि से वह सगर्व गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था। सुन्दर वस्त्र व आभूषण धारण करता था तथा आचार्यो एवं गुरुजनों से आशीर्वाद ग्रहण कर अपने घर के लिये विदा होता था।
 पहले तो गुरुकुलों में ही बड़ी-बड़ी गौशालाएं हुआ करती थी पर अब वह समय नहीं रहा इस लिए इस  ''केशान्त संस्कार'' को अगर विद्द्वान आचार्य स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े - बछियों  के पवित्र सानिंध्य में करायें तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी होजाता है। 

13 -  विवाह संस्कार ! प्राचीन काल से ही स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यज्ञोपवीत से समावर्तन संस्कार तक ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का हमारे शास्त्रों में विधान है। वेदाध्ययन के बाद जब युवक में सामाजिक परम्परा निर्वाह करने की क्षमता व परिपक्वता आ जाती थी तो उसे गृर्हस्थ्य धर्म में प्रवेश कराया जाता था। लगभग पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का व्रत का पालन करने के बाद युवक परिणय सूत्र में बंधता था।
हमारे शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है- ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, आसुर, गन्धर्व, राक्षस एवं पैशाच। वैदिक काल में ये सभी प्रथाएं प्रचलित थीं। हमारे देवभूमि उत्तराखण्ड के अलावा भी आज देश भर में कई प्रान्तों में रात्रि तमाम गोष्ठ यानि गौनिवास में शादी-विवाह करते है। ताकि 33 कोटि प्रत्यक्ष देवी-देवताओं का (गौमाता ) आशीर्वाद इस विवाह को मिल सके। जो सुसंस्कारी परिवार है उन्होंने ये परम्परा आज भी नहीं छोड़ी है। आज उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि हमारा समाज सभ्य और सुसंस्कृत है। पहले प्रतेक घर में एक गोष्ट या गौ निवास होता था पर अब समय बदल गया है इसलिए इस ''विवाह संस्कार'' को अगर विद्द्वान आचार्य स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े - बछियों के पवित्र सानिंध्य में ''सात फेरे'' करायें तो विवाह गठबंधन सात जन्म तक सुरक्षित रहता है यह मान्यता है हमारे सनातन शास्त्रों की जो सदा सत्य ही होती है।  

14 - अन्त्येष्टि संस्कार ! यहाँ तक की अंतिम संस्कार में भी बैतरणी पार करने हेतु गौ-दान और ''गौमाता'' के पूछ पकड़ा कर मृतक शरीर को गौ-लोक धाम की, वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति करायी जाती है। जिससे जीव की आत्मा फिर 84 के फेरे में यानि ''पुनरपि जननं, पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनं''
भज गोविन्दं, भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते !!  आदि जगद्गुरु शंकराचार्य जी ने लिखा ---
बार-बार जन्म लेने का दुःख, बार-बार मरने का दुःख और बार-बार माँ के पेट में रहने का दुःख क्यों भोग रहा है ? अरे मूढ़मति !! (इन दुखों को समाप्त करने के लिए) 33 करोड़ देवी-देवताओं का शुद्द निवास स्थान गौशाला में बैठ कर श्रीकृष्ण का स्मरण कर, श्रीकृष्ण का स्मरण कर, श्रीकृष्ण का स्मरण कर, या अपने-अपने इष्ट को भजों। --
 इस तरह सनातन धर्म के प्रतेक संस्कार में गौमाता एवं गौवंश का अतिमहत्वपूर्ण स्थान था, है, रहेगा। यहाँ तक की किसी कारण वस किसी के पितर नीच योनी में चले गयें है,या प्रेत योनी में गये अपने ही पितर पुरे परिवार को परेशान करते है तो सनातन शास्त्रों के अनुसार एक नंदी बैल को छोड़ा जाता है। गौदान किया जाता है। पर आज के समय में नंदी बैल को खुला छोड़ने का मतलब कसाई- गौहत्यारों को दावत देना और पाप को मोल लेना है। इसलिए आज का मानव भी अपने पितरों की तारण-तरन के निमित गाय, बछिया, बछड़े  या नंदी बैल का दान किसी सुरक्षित,पवित्र, स्वच्छ, सुन्दर गौशाला में करें तो वही पुण्य प्राप्त कर सकता है जो वेद पुराणों में वर्णित है । इसीलिए कहाँ गया है ''गाय के विना गति नहीं, वेद के विना मति नहीं'' -----
                               ''नयाल सनातनी''
'









Saturday, February 14, 2015

सनातनी विचार !
       सिर्फ एक गाय या बैल को गोद लेने से – सनातन धर्म की रक्षा, गरीब की रोटी, गौवंश के प्राण और गौलोक की प्राप्ति जैसे महान पुण्य सुलभ हो जाते है।


                                                           ''नयाल सनातनी''

Tuesday, February 10, 2015

सनातनी विचार !
       सिर्फ एक गाय या बैल को गोद लेने से – सनातन धर्म की रक्षा, गरीब की रोटी, गौवंश के प्राण और गौलोक की प्राप्ति जैसे महान पुण्य सुलभ हो जाते है।


                                                           ''नयाल सनातनी''
 ''सनातनी विश्लेषण'' !
विकास-विकास-विकास जो 9 महीने के बाद भी पैदा नहीं हुआ ! पर मान गये मोदी जी आपने अपने जैसे ही 67 'विकास पुरुष' ( A K 49 ) पैदा कर दिए इन 9  महीनों में।  इस देश को नया रास्ता दिखा दिया ''विकास'' पैदा करने का । अब ये 67 विकास पुरुष और इनके ''नवरत्न'' पुरे देश में फैलंगे और हजारो विकास पुरुष और पैदा करंगे। जल्द ही बिहार में चुनाव होंगे वहां भी बड़ी तादात में विकास पुरुष पैदा होंगे, क्योकि वहां की धार्मिक,विद्द्वान, सादगी पसंद जनता-जनार्दन भी नीतीश-लालू के झूठे वादो, आपसी कलह, जाति वाद से तंग हो चुके है, मांझी पहले ही नाव डूबा चुके है । और यह तो जग जाहिर है सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेश के टिकट पर चुनाव लड़ने को जो तैयार होगा वह कोई बहादुर ही होगा। दिल्ली चुनावों में ( A K 49 ) ने देश के ''महामहिम राष्ट्रपति'' की बेटी और 60 कोंग्रेश के उम्मीदवारों की जमानत जब्त कर दी।भाजपा की मुख्य मंत्री की उमीदवार जो सुरक्षित सीट से लड़ी उसको भी मात दें दिया। बड़े-बड़े भाजपाई दिग्गज अपनी सीट नहीं बचा पायें जबकि सारे मंत्री और 200 सांसद, भाजपा राष्ट्रिय अध्यक्ष ,प्रधान मंत्री जी स्वयंग चुनाव में खूब जम के प्रचार किये इस छोटे से प्रदेश में अब भी प्रतेक सुबह १ लाख से अधिक गौ-माता, गौवंश का कत्लेआम जारी रहा तो सायद ''विकास'' इतिहास न बन जाय  ! और ''विकास पुरुष'' वर्तमान  ---
 ''नयाल सनातनी'' संस्थापक -- ''सर्वदलीय गौरक्षा मंच''  
यह कलिकाल कठिन उरगारी। पाप परायन सब नर-नारी।।
गौ-भक्त मित्रो हरिद्वार हो या वृन्दावन और काशी हो, या तिरुपति अन्य तीर्थ स्थान हो या मठ -मंदिर !
सब जगह हमारे प्रतेक देवी-देवताओं के सामने दान के नाम पर भीख का कटोरा थमा कर आज के पाखंडियों ने धन्दा खूब चला रखा है। पर वह दान का धन सनातन धर्म के उत्थान में कितना आ रहा है यह जग जाहिर है।''सर्वदलीय गौरक्षा मंच परिवार '' सभी देश वासियों से हाथ जोड़कर निवेदन करता है की इस मंदिरो एवं आश्रमों में एक भी पैसा कैश नहीं चढ़ायें अगर किसी आश्रम और मंदिर में गौवंश है तो चारा या गौशाला निर्माण सामग्री या अपने या अपने पितरों के नाम से गौ-आश्रम बनायें , गौ वंश का दान करें ताकि गौवंश बचे और सनातन धर्म की नीव मजबूत हो। अब सरकार के भरोषे बिलकुल न रहें। अपने अपने तरह से गौवंश बचने के उपाय करें। तभी पर्यावरण एवं धर्म की रक्षा होगी।  जय गौ माता जय गोपाल।
                    ''सर्वदलीय गौरक्षा मंच''--   

Monday, February 9, 2015

सनातनी विचार !
यह कलिकाल कठिन उरगारी। पाप परायन सब नर नारी।।
गौ-कृपाकांक्षि मित्रो ! वैसे तो यह कल्युग बहुत ही कठिन है, यहाँ बिना स्वार्थ के कोई बीच रोड में पड़ा पत्थर भी नहीं हटाता,अपने माता-पिता को भी बिना स्वार्थ के रोटी नहीं देता, अपने बच्चो का पालन भी स्वार्थ बस ही करता है। अगर ऐसे कठिन समय में महाभयंकर कलयुग में जब चारो और गौहत्या जैसा जघन्य पाप हो रहा है। उस समय कुछ लोग स्वार्थ ही बस सही गौ-माता जो मूल प्रकृति है के लिए अपना समय दे रहे है। और बार - बार गौ की महिमा अथवा व्यथा लिख कर पोस्ट कर रहे है। तो हम समझते है वे इस समय के स्वार्थी लोगो में कुछ अधिक अच्छा काम कर रहे है। उनका स्वार्थ परमार्थ की ओर ले जाने वाला है। इस समय लोगो को अपनो के बारे में सोचने का समय नहीं चारों तरफ भागम-भाग है, ऐसे में अगर कोई गौशालाओं में सेवा दे रहा है, वहां पर फोटो खींचा कर फेस-बुक, सोसियल मीडियां आदि में डाल रहा है। तो उसने समझो कितना समय दिया वह गौशाला या गाय के पास गया तो उसके मन में कुछ विचार परिवर्तन तो आएगा ही आज नहीं तो कल वह गौमाता के पास जाते - जाते गौमाता का असली सेवक हो ही जायेगा थोड़ा धीरज हमें रखना चाहिए । ऐसे लोगो को हतोत्साहित न करो भाइयों क्योकि उनको देखा देखि एक दिन दूसरा भी गौशाला जायेगा या गाय घर पर पालेगा तो उस दिन उसका पुण्य जरूर मिल जायेगा आपको भी । ध्यान रहे घर बैठे किसी की निंदा कर हम देश की तरक्की में कोई योगदान नहीं दे रहे हां किसी को प्रोत्साहित कर जरूर श्रजन की ओर देश को आगे बढ़ाने में योगदान दे रहे है। हमेशा पॉजिटिव सोच ही मंजिल तक पहुँचती है।
धन्यबाद जय गौमाता की मित्रों ---
 ''नयाल सनातनी'' ;- सर्वदलीय गौरक्षा मंच
सनातनी विचार !
जब मर्यादा पुरुषोत्तम परमात्मा श्री राम भी मेढक राज की बात सुन निरुत्तर हो गए !
   त्रेतायुग -- बनवास काल में जब श्रीराम-लक्ष्मण जी के साथ सीता जी काे खाेजते हुए जा रहे थे, तो मार्ग में पड़ने वाले ''भक्त शिरोमणि शवरी'' के आश्रम में पहुंचे। परम उदार श्री राम जी ने उसे वह देव-दुर्लभ-गति दी जहां से लाैटना नहीं हाेता। भगवान् ने ''शवरी'' से कहा कि मेरे दर्शन का परम फल यह है कि जीव अपने सहज स्वरूप काे प्राप्त हाे जाता है। उसके बाद भगवान ने ''शवरी'' से पूछा कि यदि तुम्हें गज-गामिनी जानकी की कुछ खबर है ताे बता दो ।परम तपस्विनी ''शवरी'' ने कुछ येसा संकेत किया की श्रीराम और लक्ष्मण उसी दिशा में चल दिए।
    श्रीराम इस संकेत काे पाकर पम्पा नामक सराेवर की आेर चल दिए। जब श्रीराम जा रहे थे, उन्हें मार्ग में बहुत प्यास लगी। उन्हाेंने एक तरफ अपने तीर-कमान उतार कर फेंक दिए आैर कुछ दूर पर बहते हुए सराेवर के पास जाकर निर्मल आैर शीतल जल पीने लगे। लाैटकर भगवान राम ने धनुष काे उठाते समय देखा कि उनके धनुष से एक मेंढक घायल हाे गया है और वह लहूलुहान दशा में चुपचाप पड़ा था, राम जी काे बहुत दु:ख भी हुआ आैर कुछ आश्चर्य भी।
श्रीराम ने कहा, " हे मेढक राज जब तुम्हें इतनी चाेट लग गई थी, तुम चिल्लाए क्याें नहीं ?"
 मेंढक राज ने अपनी वेदना भरी आंखाें से श्री राम  की आेर देखा, थाेड़ा मुस्कुराया आैर फिर आंखें नीचे कर के बाेला, हे जगतनाथ ! जब पहले मुझे काेई दूसरा व्यक्ति सताता था ताे मैं अपनी रक्षा के लिए आपकाे पुकार लेता था, परन्तु जब आप ही ने मुझे घायल किया ताे भला मैं क्या और किसे पुकारता ?"
राम इस भक्त के तर्क काे सुनकर माैन हाे गए। उस मेंढक का यह प्रश्न ऐसा था जिसका उत्तर न तो राम दे सके न उनका काेई विद्वान् भक्त आज तक उत्तर दे सका।
                        ''नयाल सनातनी''
सनातनी विचार !
     सच्चा सन्यासी और सच्चा भगवान का भक्त नारी-मात्र को चाहे वह सति हो अथवा असति जगदम्बा के ही रूप में देखता है। इसीलिए भगवान के सबसे निकट माना गया है सन्यासी और भगवत भक्तों को। इसीलिए संसार का विश्वास भी प्राप्त इस भेष को सदा रहा है।
                            ''नयाल सनातनी''

Sunday, February 8, 2015

सनातनी विचार !
शिव ( कल्याण ) को पाना पहले भी आसान था आज भी, अपने अहंकार को त्यागना पहले भी कठिन था आज भी।  जिन्होंने अपने अहंकार को त्याग दिया उनका शिव (कल्याण) मय जीवन हुआ पहले भी आज भी।  .....हर हर महादेव ...
                               ''नयाल सनातनी''

Saturday, February 7, 2015

सनातनी विचार !
दूसरे के कपड़ों में गन्दा कीचड़ फेंका है सावधान नजर वालों को उसके दाग तुम्हारे कपड़ों में दिख रहे है। दूसरों के घर तोड़ोगे तो एक न एक दिन तुम्हारें घर भी टूटने वाला है। तैयारी कर लो जैसा का तैसा पाना के लिए, यह सनातन नियम है।
                                   ''नयाल सनातनी''
सनातनी विचार !
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान ''श्रीराम'' कहते है,  कैकई के ''भरत'' को राजा बनाने की बात छोडो ''प्रजा'' के विरुद्ध जाकर मुझे यानि ''श्रीराम'' को भी ''राजा'' (शासक) बनाना सम्भव नहीं, ना ही भगवती सीता जी को ''महारानी'' बनायें रखना।  प्रजा के आत्मा में ही परमात्मा का वास होता है।  ....
.                                                    ''नयाल सनातनी''
सनातनी विचार !
जब त्रेतायुग में माता कैकयी प्रजा के मत के विरुद्ध जाकर ''भरत'' को राजा नहीं बना सकी, तब तत्कालीन ''विद्द्वान संतों'' ने कहाँ प्रजा के विरुद्ध होकर तो ''विधाता'' ब्रह्मा जी भी किसी को राजा (शासक ) नहीं बना सकते । साधारण मानव की बात ही क्या ? प्रजाजनों के आत्मा में तो परमात्मा का वास है।  
                                                                ''नयाल सनातनी ''

Friday, February 6, 2015

सनातनी विचार !
    बाहर की खूबसूरती कुछ समय के लिए संसार को रिझा सकती है। पर अन्दर भी उतनी ही खूबसूरती हो तो सदा के लिए परमात्मा ही रिझ जाता है ।
                                                        ''नयाल सनातनी''
सनातनी विचार !
रेगिस्तान के प्यासे की तरह तृष्णा कभी हरि कृपा बिना मिटती नहीं । चेहरा पर झुर्रियां पड़ गई हो , सर के बाल सफ़ेद हो गये और सारे अंग-अंग ढीले पड़ गये हो परन्तु एक तृष्णा है जो तरुण होती जाती है। अतः तृष्णा को रोकने का एकमात्र उपाय ही हरि नाम संक्रितन है औरगौसेवा ....
                                                               ''नयाल सनातनी''
सनातनी विचार !
केवल धर्म की राह ही परम कल्याणकारी है। एकमात्र क्षमा ही शांति का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। संसार से दुरी ही परमात्मा की नजदीकी का एक मात्र साधन है। सत्य, अहिंसा , गहरी साधना, गौशाला-गोष्ठ में निवास और हरिनाम संक्रितन ही मुक्ति का मार्ग है।
                                                            '' नयाल सनातनी '' 
सनातनी विचार !
और माँगना है तो उस परम शक्ति से मांगों, जिसने सदा सब कुछ हमारे अधिकार से अधिक दिया है हमें । उसके यहाँ माप-तोल कर नहीं दिया जाता शर्त बस इतनी है उसके कानों तक आपके ह्रदय की सच्ची आवाज पहुचनी चाहिए, आपकी झोली में वह जल्दी से उतना जरूर डालेगा जितना झोला ( किसमत ) ले कर आप आये हो। यह गारण्टी है।
                                                   ''नयाल सनातनी''

Thursday, February 5, 2015

सनातनी विचार !
सत-धर्म परायण एवं सद-गुण अपनाने से ही मानव महान होता है ! ना की भेष-भूषा बदलने, उच्च सिंहासन पर बैठ जाने से ! जिस प्रकार उच्च शिखर पर बैठने से कौआ गरुड़ बन श्रीहरि का वाहन नहीं बन सकता उसी प्रकार निन्दित कर्म करने वाला व्यक्ति किसी भी युग में सदा पूजनीय नहीं हो सकता। आखिर कौआ एक न एक दिन जांघ का मांस नोचता ही है। यह सनातन सत्य है।  
                         ''नयाल सनातनी''
सनातनी विचार !
          मुर्ख और स्वार्थी मित्रों पर, अधर्म से कमाया धन पर - देश-धर्म के काम ना आये बेकार की जवानी पर, कभी गर्व ना करों ! काल कभी भी पलक मारते इनका अपहरण करने आने ही वाला है।  इसलिए तो कह गए है ''महापुरुष''  मुर्ख मित्र से विद्द्वान दुशमन हितकारी है।                   
                                 ''नयाल सनातनी'' 

Tuesday, February 3, 2015

सनातनी विचार !
    अगर आप सत्य मार्ग पर है, आप निस्वार्थ सेवा भावी है, तो आपका 'मौन'  ही ''पक्ष और विपक्ष'' दोनों की बेचैनी बढ़ा सकता है। 'मौन' रहना बहुत बड़ी साधना है इसकी ताकत को ''मौन साधना'' में लगे विद्द्वान जानते है।
                                         ''नयाल सनातनी''