Tuesday, December 30, 2014

सनातनी विचार !
जो महर्षि मनु की सन्तान मनुष्य ( मानव ) अपनी सारी जिन्दगी ज्ञान प्राप्ति और उसके बाद ज्ञान बाटने में लगा देता है , मूल सनातन धर्म के अनुसार उसकी कभी मृत्यु नहीं होती। वह परलोक गमन के बाद भी किताबो के माध्यम से सदा जीवित बना रहता है। जैसे स्वामी करपात्री जी महाराज,भाई श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार, स्वामी विवेकानंद, स्वातंत्रत वीर सावरकर आदि
 ''नयाल सनातनी''

Monday, December 29, 2014

सनातनी विचार !
व्यक्ति चाहे पूरा गेरुवे रंग में रंग जाये, वैराग्य अपना ले, तांत्रिक कालनेमि की तरह काले कपड़ो के साथ तंत्र-मन्त्र की अनेको अंगूठी पहन ले,चाहे जितना कर्म-कांड करें ,दिन-रात भक्ति में डूबा रहे, तो भी अगर ईर्ष्या, अहंकार- अहंभाव, ममत्व को नहीं छोड़ता तब तक उसे ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती ना ही सत मार्ग पर ले जाने वाले ज्ञानी गुरु के दर्शन होंगे।
                       ''नयाल सनातनी''  
सनातनी विचार !
जब आप एकनिष्ठ होकर किसी सतकर्म को करने लगते है। तो आप में सब कुछ करने की शक्ति का संचार होने लगता है। और जब आप पूर्ण सफल होने ही वाले होते है। तब सबसे पहले इंद्र आदि देवता आपकी परीक्षा हेतु आसुरी शक्तियों की सहायता से आपके राह की रूकावट बन जाते है। आप पर अनेक आरोप -प्रत्यारोपो का दौर चल पड़ता है,आप घबरा कर उस राह को छोड़ देते हो या परिवार और समाज छुडवा देता है। पर सत्य संकल्प का व्यक्ति कभी सत-मार्ग  नहीं छोड़ता भले दुनिया को लगे यह रुक गया वह आखिर तक प्रयत्न नहीं छोड़ता और अंत में विजयी होता है।
                           ''नयाल सनातनी''
सनातनी विचार !
सनातन धर्म में बड़े उचे खजूर के पेड़ की बजाय उपयोगी तुलसी का छोटा पोधा पूजा जाता है। धनवान की उसके धन रसूक के कारण आदर करो ना करो पर उदार मन वाले का आदर होना ही चाहिए। सूर्य की कद्र अत्यधिक उचाई में होने के कारण नहीं बल्किन उदार मन से नियमित संसार की सेवा में रत रहने के कारण होती है।
                    ''नयाल सनातनी''
सनातनी विचार !
जब आपका समय बुरा हो,बिपत्ति ने चारो ओर से घेरा हो उस वक्त अपनों और मित्रो से कोई मदद मत मांगों। कही इनकी एक हलकी मुश्कराहट, या एक तंज आपके दुःख को दुगुना ना कर दें। ऐसे वक्त सिर्फ परमात्मा को ही अपना सच्चा मित्र, हितैसी जान प्रार्थना करो। प्रार्थना में बड़ी शक्ति है।
                                 ''नयाल सनातनी''
सनातनी विचार !
सावधान दुःख-विप्पति किसी पर भी आ सकती है, दुसरो के दुःख-विपत्ति में दया दिखा कर या दुखी मनुष्य का साहस बढ़ा कर आप आने वाले दुःखो से छूट जाओगे। और जो दुखी मनुष्य की अवगणना करता है या उस पर हर्ष मनाता है , वह कभी न कभी स्वयं उस दुःख में जा पड़ता है। कुदरत का नियम है जो बोया वह काटना पड़ेगा।
  ''नयाल सनातनी''
सनातनी विचार !
   अपने पर विजय प्राप्त करना ही असली विजय है जिसने अपने पर, अपने तन-मन, पर अपने व्योहार पर विजय पा ली समझो उसके लिए संसार पर विजय पाना कठिन नहीं। मन के जीते जीत है मन के हारे हार। आत्म विजेता ही इस संसार से विजय होकर उस लोक की विजय यात्रा पर निकलता है। जहाँ अनेको ब्रह्मांडो का विजयी परमात्मा का निवास है। 
                                  ''नयाल सनातनी'' 
सनातनी विचार !
  तुम्हारे ह्रदय के मंदिर में बैठा सच्चा मन ही बता सकता है की तुम अच्छा और पवित्र कार्य में रत हो। जब मन-आत्मा गवाही दे रहा है तो दुनिया लाख खुदगर्ज, मतलब-परस्त होने का दोषारोपण करें तो परवाह ना करो।  अच्चा और सच्चा कार्य करते रहों। क्योकि सच्चा मन-आत्मा ही परमात्मा है।और परमात्मा कभी गलत राह नहीं दिखातें। 
                                ''नयाल सनातनी'' 
सनातनी विचार !
  तुम्हारे ह्रदय के मंदिर में बैठा सच्चा मन ही बता सकता है की तुम अच्छा और पवित्र कार्य में रत हो। जब मन-आत्मा गवाही दे रहा है तो दुनिया लाख खुदगर्ज, मतलब-परस्त होने का दोषारोपण करें तो परवाह ना करो।  अच्चा और सच्चा कार्य करते राहों। क्योकि सच्चा मन-आत्मा ही परमात्मा है। और परमात्मा कभी गलत राह नहीं दिखातें। 
                                ''नयाल सनातनी'' 
सनातनी विचार !
जिन्होंने दुनिया को बदलने की ठानी है वे खुद बदल गए ये दुनिया को बदलना बहुत कठिन है।  भगवान राम को भी इस दुनिया को बदलने से पहले 14 वर्ष वन - वन भटकना पड़ा तब जा के कही ''राम-राज्य'' आया यानि बदलाव आया। अगर आप में वह सामर्थ्य है जो राम जैसा जीवन जी सको सारी मर्यादाओं का पालन कर सको तो आप भी दुनिया को बदल सकते है। पर कमजोर संकल्प वालो के बस की बात नहीं दुनिया बदलना।
                                        ''नयाल सनातनी''
सनातनी विचार !
श्री रामचरित मानस बाल कांड १४२ सो० के अगले चौपाई के अनुसार --
आये मिलन सिद्द मुनि ज्ञानी,धरमधुरंधर नृपऋषि ज्ञानी। 
 जब सम्पूर्ण पृथ्वी जलमग्न हो गई मानव रूप में सिर्फ मनु ही बचे तो महर्षि मनु ने ही मानव जाति की फिर से उत्पति की इस लिए  राजर्षि मनु ही पूरी मानव जाती के जन्म दाता यानि पिता है . और राजर्षि का मतलब क्षत्रिय राजा फिर ब्राहमण क्षत्रिय से श्रेष्ठ कैसे ? क्या पिता से पुत्र श्रेष्ठ होता है ? अगर सब एक ही पिता की संतान है तो फिर कुछ ब्राहमणों द्वारा श्रेष्ठता का जगतीय व्योहार क्यों ?
 कुछ विद्द्वानो के अनुसार ! अगर ब्राहमण ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न है तो वे मृत्य लोक में क्या कर रहे है ? जबकि अनेक ब्रह्मा के मानस पुत्र ऋषि लोक या ब्रह्म लोक में निवास करते है। ‘’नयाल सनातनी’’

Sunday, December 28, 2014


सनातनी विचार !
 देने वाला सदा उचे पद का अधिकारी होता है . और लेने वाला ( मांगने वाला ) सदा निचे स्थान प्राप्त करता है . उच्च पद पाने हेतु सदा देने की आदत डालना चाहिए . देवताओं की उचे स्थान पर पूजा-आराधना इसलिए होती है क्योकि देवता सदा देते रहते है . सूर्य अन्धकार से निकाल कर प्रकाश देते है, इसलिए उनको सूर्य देवता कहते है .
‘’नयाल सनातनी’’
सनातनी विचार !
ज्ञानी वह जो परमात्मा के गुणों का बखान करे , ज्ञानी वह जो यह समझ गया की वही परमतत्व ही सब कर्ता-धर्ता है जो एक छोटे से बीज से विशाल काय पेड़ की उत्पति का कारक है। जो कल-कल बहती निर्मल नदियों का कारक है और समुन्द्र के रूप में सब का पति है , जो हरे पेड़ में लाल, नीले, पीले फूल उगा रहा है। ज्ञानी वह है जो संसार को नहीं परमात्मा की लगन लगाये है। ज्ञानी वह नहीं जो अपने और अपने गुरु के ज्ञान का बखान में लगा रहे। ज्ञानी वह है जो यह जान चुका की मेरे और गुरु के अन्दर ज्ञान के रूप में कोन बोल रहा है ?
                                                    ''नयाल सनातनी''
सनातनी विचार !
एक पेड़ लगाने का मतलब लाखों निराश्रय जीव-जंतु ,पशु-पक्षी को आसरा देना। मानव के लिए घाम-बारिशा में बचाव का साधन करना,अनेको पुण्यों का अर्जन करना। और एक हरा-भरा पेड़ काटने का मतलब इन सबके साथ धोखा कर पाप की राह पकड़ना। एक हरा- भरा पेड़ अपने जीवन काल में करोडो लोगो को आक्सीजन देकर जीवन दान देता है। और हरा-भरा पेड़ काटने वाला इन सब लोगो का गुनाहगार बन जाता है।
       ''नयाल सनातनी''
सनातनी विचार !
जो मनुष्य खेतों से अनाज प्राप्त करने के बाद खेतों को आग के हवाले कर देते है। वे महान पाप के भागी होते है। क्योकि वे अविवेकी मनुष्य लाखों जीव-जंतुओं के हत्या एवं भोजन-निवाला छिनने के कारक बनते है खेतों और जंगलों में आग लगाने के कारण लाखों पशु-पक्षी अपना हक़ से बंचित हो जाते है।
 ''नयाल सनातनी''
सनातनी विचार !
 मानव जीवन में ही परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है ! ईश्वर कृपा से मानव को विवेक की प्राप्ति है। और विवेक ही परमात्मा के द्वार तक ले जाने वाली चेतना शक्ति है। और विवेकी अहंकारी नहीं समर्पित होता है। जो फूल की तरह समर्पित हो गया वह भगवान को स्वीकार हो गया।
                      ''नयाल सनातनी''
सनातनी विचार !
गुरु वह नहीं है जो शिष्य का धन हरण करे ! वह तो ठग है। सच्चा गुरु तो वह है जो शिष्य का अज्ञान हर लें, और शिष्य के ह्रदय में परमात्मा की ओर ले जाने वाली ज्योति जला  दें। ''नयाल सनातनी''

Friday, December 26, 2014

सनातनी विचार !
  सावधान -- सतकर्म हो या दुष्कर्म फल समय आने पर जरूर मिलता है। जिस तरह लाखों रुपये से लगाई गई फैक्ट्री सही दिशा में मेहनत न करने पर खाक हो सकती है और मेहनत करने पर करोड़पति बना देती है। वैसे ही सत-कर्म और दुष्कर्म का चक्र है। सतकर्म स्वर्ग और दुष्कर्म नर्क की राह दिखाता ही है।
                                         ''नयाल सनातनी''
सनातनी विचार !
कभी-कभी आपके द्वारा तेजी से किये जा रहे सत-कर्म की राह में अचानक वे लोग विघ्न पैदा कर देते है, जिनको आप वर्तमान में जानते तक नहीं ! पर यह ना समझो की वे किसी के द्वारा भेजे गए विघ्नकारक दूत है, ये तो आपके पूर्व के अज्ञानता में किये गए दुष्कर्म है।  जो अब आपको सतमार्ग की राह में सावधान करने फिर सामने खड़े है। और आगे के लिए आपको निष्पाप बनाने आये है। यह जानियें ये आपके हितचिंतक ही है। 
    ''नयाल सनातनी''
सनातनी विचार !
ब्राह्मण वाद ब्राहमणों के ज्ञान पर नहीं बल्किन सनातन शास्त्र ना पड़ने वाले मूल सनातन धर्म की राह से भटके लोगो के अज्ञान पर टिका है। जिस दिन साधारण मनुष्य भी सनातन वेद-शास्त्रों का मनन करने लग जायेगा उसी दिन ब्राहमण वाद , क्षत्रिय वाद आदि सारे वाद-विवाद ख़त्म हो जायेगा।
फिर सिर्फ मानवता वाद चलेगा जो सम्पूर्ण मानव जाति के लिए सुखद है। 
                                               ''नयाल सनातनी''

Wednesday, December 24, 2014

सनातनी विचार !
 जो मनुष्य सकल ब्रह्माण्ड की अधिष्ठात्री देवी गौ-माता से प्राप्त पञ्च-गव्यों के इस्तेमाल से ही संतुष्ट हो उन्ही का दोहन कर धन-यस कमा लिया और संतुष्ट हो गया . उस व्यक्ति को सायद ही बैतरणी पर गौमाता पार लगाने आये ! क्योकि उस व्यक्ति ने गौ-माता की असली महिमा को तो जाना ही नहीं आखिर गौमाता का प्राकट्य क्यों हुआ इस मृत्य लोक में ?
जबकि गौ-माता को तो भगवान ने बिना जाति-वर्ण-धर्म का विचार करे सच्चे सेवक को मोक्ष देने की शक्ति प्रदान की है .
‘’नयाल सनातनी’’

Wednesday, December 17, 2014

सनातनी विचार !
  हम सब मानव जाती नित्य अपनी मर्यादाओं का उलंघन करते रहते है। सोचा है एक भी दिन अगर भगवान सूर्य नारयण ने अपनी मर्यादा का थोडा भी उलंघन किया ( अपने स्थान से थोडा निचे खिसके से ) तो पूरा विश्व जल कर ख़ाक हो जायेगा। सावधन मर्यादाओं का उलंघन मानव जाति को पतन की ओर ले जा रहा है। और मर्यादा में रहने वाला मर्यादा-पुरुषोत्तम श्री राम की तरह पूजनीय- बंदनीय बना रहता है युगो-युगों तक ।
                                     ''नयाल सनातनी''

Tuesday, December 16, 2014

सनातनी प्रार्थना !
जो सबको अपनी ओर आकृष्ट करने वाले सच्चिनानन्द स्वरुप है, इसलिए 'कृष्ण' कहलाते है, सर्वव्यापी होनेके कारण जिनकी 'विष्णु' संज्ञा है, सबके भीतर निवास करने से जिनका नाम 'वासुदेव' है, जो 'परमात्मा' एवं 'ईश्वर' है, 'गोविन्द,  'परमानन्द,' 'एक',  'अक्षर', 'अच्युत', 'गोपेश्वर', 'गोपीश्वर', 'गोप', 'गौरक्षक', 'विभु', 'गौओं के स्वामी', 'गोष्ठनिवासी', 'गोवत्स-पुच्छधारी', 'ग्वालो, गोपों' और गोपियों के मध्य विराजमान',  'प्रधान' , 'पुरुषोत्तम' , 'नवघनश्याम', 'रासवास' और मनोहर' आदि अनेक नाम धारण करते है उन श्री कृष्ण से हम नित्य प्रातः एवं सायं पूजा काल में गौवंश की रक्षा हेतु प्राथना रत है।
                                                                                                 ''नयाल सनातनी'' संस्थापक अध्यक्ष '-- सर्वदलीय गौरक्षा मंच
सनातनी विचार !
      जो आपके सद कार्यों को देख, बढ़ते कदमो को रोकने हेतु ईर्ष्या वस आपको बदनाम कर अपने को उठाना चाहते है।  समझ लीजिये आपका कद समाज में और बड रहा है। बदनाम करने वालो का निश्चित ही पतन हो रहा है।  ''नयाल सनातनी''

Monday, December 15, 2014

सनातनी विचार !
जिस स्थान में ,शहर में , गावं में  या तालुका में अतियधिक दुर्जन बस गए हो ! जहाँ का वातावरण सज्जनों के रहने लायक न रह गया हो ! उस स्थान का विद्द्वानो को तुरंत त्याग कर देना चाहिए।  बर्ना दुर्जनो के क्रियाकलापों से पहले विद्द्वान का रजोगुण जाग्रत होगा फिर तमोगुणो की अधिकता होने लगेगी अंत में सतोगुण नष्ट होकर विद्द्वान सज्जन भी उन दुर्जनों के जैसा ही आचरण करते देखा-सुना जायेगा।
पूर्व में संत - विद्द्वान कहाँ करते थे की लाख दुर्जनों से भेट हो दिन भर में पर शाम होते-होते एक विद्द्वान सज्जन के दर्शन पुरे दिन की दुर्जनता को दूर कर देती है।  ''नयाल सनातनी''