जन्तर-मन्तर पर घटित सच्ची घटना !
सनातन शास्त्रों का मत है भगवान भोले नाथ को भजने वाले शिव लोक में , देवी के उपासक मणिद्वीप में , गणेश को आराध्य मानने वाले गणेश के लोक में , सूर्य और विष्णु के सच्चे भक्तों का स्थान वैकुण्ठ में सुनिश्चित होता है ।
आध्यत्म के शिखर पर अपना स्थान बनाये आदि शंकर के नये अवतार संसार के अब तक के एक मात्र धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज किस मत किस देव के अनुयायी थे आखिरी दिनों में ही यह भेद खुला !
जब बिरला जी और बहुत बड़े-बड़े महाराज जी के अनुयायी उनसे एक बार जिद कर पूछे की आपके इष्ट कोन है ? आप नित्य बाबा विश्वनाथ शिव का अभिषेक करते है , जय राम श्री राम जय जय राम से अपना कोई भी प्रवचन आदि शुरू करते है और सबको गाय की भक्ति का उपदेश देते है और आजीवन गाय की लड़ाई लड़ते रहे है । तब बहुत भक्तों के प्रयास के बाद स्वामी जी ने बताया कि शिव-राम में अंतर नहीं मेरे इष्ट शिव के भी जो इष्ट है वही है "इष्ट देव मम बालक रामु" और गाय की भक्ति का उपदेश एवं गाय की सेवा रक्षा का उपदेश मैं इसलिए देता हूँ "गाय परम सत्य" है इस पृथ्वी लोक में । भगवान कृष्ण को आप भजन करों पर गाय की तरह भगवन कृष्ण प्रत्यक्ष नहीं दिखते और आपकी सेवा वे प्रत्यक्ष स्वीकार कर रहे है या नहीं वह आपको मालूम नही पड़ती ! पर गाय उस अनंत ब्रह्माण्ड नायक कृष्ण की वह कृति है जो उनके बामांग से प्रकट हुई है वह आपकी सब सेवा - पूजा प्रत्यक्ष स्वीकार करती है और साथ ही साथ अमूत भी देती है । यह भी श्री कृष्ण का वचन है कि जो गाय की सेवा करेगा उसको अन्य किसी देवता की पूजा-सेवा करने की आवश्यकता नहीं क्योकि एक समय 33 करोड़ देवो ने गाय के शरीर में ही निवास बनाया था । और जो भी गाय या गौवंश की सेवा करता है उससे वचन वद्द होने के कारण सभी देवी-देवता सदा प्रसन्न रहते है । अतः देवताओं की पूजा सेवा में भूल चुके होने से जो पूजा कर्म में अपूर्णता आ जाती है उसे गाय की सेवा- पूजा पूर्ण कर देती है । यानि गाय गौवंश की सेवा पूजा के बिना कुछ आपकी देवो की पूजा भी पूर्ण नहीं । बड़ा से बड़ा यज्ञ कर लो देवताओं को भोग पहुचाने जिससे देवता पुष्ट होते है । अगर गौ घृत से नहीं किया तो देवता स्वीकार नही करते । देवता बलहीन होना पसंद करते है पर गाय के घी से हुए बिना यज्ञ का भाग स्वीकार नहीं करते । आज जितने यज्ञ हो रहे हैं उनमें से वही यज्ञ पूर्णहुति को प्राप्त होते है जो गाय के बिना मिलावटी घी के सहयोग से होते है बर्ना सब आग में डाल कर बर्बाद किया राशन के सामान है ।
स्वामी करपात्री जी महाराज की बातों को ब्रह्म लेख मानने वाला उनका कट्टर अनुयायी मैं "नयाल सनातनी" जब पिछले साल 7 नवम्बर को अपनी बीमारी की वजह से गौ भक्त शहीद संतो को श्रद्धांजलि देने दिल्ली नहीं पहुच पाया जो की में कई वर्षो से लगातार जाता रहा हूँ तो बड़ा आत्म ग्लानि से भर गया बिस्तर में लेट-लेट संकल्प कर लिया 7 को 3 से गुणा करने से जो योग आएगा उतने दिनों तक जन्तर-मन्तर पर बैठ कर उन संतो को श्रधानजली देते हुए ब्रह्म वैवर्त पुराण में जो सबसे बड़ा मन्त्र मुक्ति हेतु बताया गया उसका जप करूँगा और उन संतों को अर्पित कर दूंगा जो वहां शहीद हुए थे । मैंने किया भी वही 1 दिसंबर से 21 दिसंबर तक मैं जन्तर-मन्तर में बैठा रहा वही नारायण क्षेत्र में जपा जाने वाला महामंत्र जप करता रहा । मेरे लिए जन्तर-मन्तर भी नारायण क्षेत्र इसलिए बन गया कि आधुनिक स्वामी करपात्री के ही रूप संत गोपाल दास जी को जब पता चला मैं जन्तर-मन्तर पर तप कर रहा हूँ तो उन्होंने मेरे लिए दूध देने वाली दो गाये एक नंदी भेज दिया और उन गायो की सेवा के लिए दो सेवक भेज दिए एक नाम था दयालु दूसरे का नाम फौजी । जहाँ नारायण की गाय वहां नारायण क्षेत्र । जब 7 दिन बीत गए भारी ठण्ड थी रोज सुबह और रात में नाख लाल हो जाती थी । मच्छरों का आतंक ऐसे जैसे दुश्मन मुल्क से आतंकी भेजे हो ! 7वे दिन एक साधरण से कपडे में एक महात्मा आये और मेरे आसान के पास बैठ गए मैंने कोई खास ध्यान नहीं दिया वहां नित्य ही अनेक लोग-और महात्मा भेष में लोग आते रहते है और अपना सुझाव देते रहते थे । वे बोले कब से बैठे हो हमने कहाँ आज 7वा दिन है 21 तक बैठेंगे सांसदों से सत्याग्रह कर रहे है और नारायण नाम जप रहे है और मन बड़ा विचलित है क्योंकि आज सातवे दिन तक कुछ गिने- चुने लोग ही यहाँ आये है जबकि सबको मालूम है कि गौ रक्षा हेतु सांसदों से सत्याग्रह चल रहा है ।
तो वे बोले मैं यहाँ से वहां इस जन्तर-मन्तर पर 4 बार घुमा हूँ प्रत्येक पंडाल पर देखा सब अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहे है कोई पैन्सिन के लिए लड़ रहे है, कोई जमींन जर जोरू और जमींन के लिए और राजनैतिक लड़ाई के लिए अनेक लोग यहाँ बैठे है । पर तुम और तुम्हारा यह पांडाल गाय को सामने करके गौवंश की लड़ाई लड़ रहे हो इससे बड़ा पूण्य का काम मुझे और कोई नहीं दिखता ।
मन लगाकर जिस काम के लिए घर-परिवार त्याग कर हैदराबाद से यहाँ आये हो, जितने दिन का संकल्प करके बैठे हो वह काम पूरा करके ही यहाँ से जाना । तुम्हारी सफलता -असफलता यहाँ कोई माने नहीं रखती पर तुम्हारी दृण प्रतिज्ञा की कही न कही सुनवाई जरूर होगी । वह जो पल- पल का हिसाब रखता है क्या उसे मालूम नहीं एक बालक उसकी भी आराध्या गायों के हित में भूखे प्यासे यहाँ लड़ाई लड़ रहा है । इस कलिकाल में जब मानव एक घंटा गाय जैसे विषय पर जीवन भर बात नहीं करता तुम 21 अमूल्य दिन दे रहे हो । पीछे मत हटाना मिलेगा कुछ नहीं पर मिलेगा सबकुछ !
कह कर चले गए । उनकी अटपटी बात सुन मुझे कुछ समझ में नहीं आया ! तो मैं अपने जप माला में जप करने लगा और उनकी ओर से ध्यान हटा दिया जैसे ही माला पूरी हुई उस तरफ देखा वे महात्मा नहीं दिखे । मैंने बाद में सबको बताया एक महात्मा ने ऐसा कहाँ पर किसी ने अधिक ध्यान नहीं दिया । तभी उसी दिन पांडेय जी आये और ऐसा लगा जैसे जन्मो के साथी है और हमेशा के लिए जुड़ गए अनेको लोगो का आना तब से प्रारम्भ हो गया । भारत के अलावा इटली और जर्मनी आदि की मीडिया भी आके गई अनेक लोगो ने इंटरव्यू लिए कैसे 21 दिन बीत गए पता ही नहीं चला !
18 तारीख से हम ठाकुर रामपाल सिंह और संत गोपाल दास जी के साथ अनेक सांसदों से मिले । पालियामेन्ट चल रहा आप कृपया गाय का प्रसन्न संसद में उठाइये सबने कहा हाँ । पर कोंग्रेश संसद चलने दे तब न ! माननीय शिव सेना सांसद चंद्र कान्त खैरे जी से भी मिले उन्होंने कहाँ हम कल आपका प्रसन्न उठाएंगे । हम सभी संसद भवन में उस दिन की कार्यवाही देखने अंदर पहुच गए पर कोंग्रेश के सांसदों ने एक मिनट के लिए भी संसद नहीं चलने दी किसी को कोई प्रसन्न करने का मौका ही नहीं था ।
हम चले आये 21 तारीख को माननीय सांसद श्री खैरे जी ने संसद में गाय को राष्ट्र माता राष्ट्रिय प्राणी की मांग की और संत जी को फोन करके बताया आज संसद में आपका प्रसन्न उठाया गया । अगले दिन सभी अखबारों में वह खबर थी शिव सेना के मुख पत्र में बड़ा सा समाचार था । 21 को भाजपा के राष्ट्रीय कार्यालय में हमारे मित्र डॉ मित्तल साहब की गौ शास्त्र नामक किताब का लोकार्पण था । जहाँ उनकी कृपा से हमें 10 मिनट का सभी उपस्तिथ सांसदों और मंत्रियो के साथ गौ भक्तो को संबोधित करने का मौका मिला और सभी ने हमारा सम्मान भी किया जिसकी कल्पना हमने कभी नहीं की थी ।
इसलिए गाय साधारण नहीं असाधरण है । गाय माँ नहीं माँ से बढ़कर कर है , गाय देवता नहीं देवताओं की देवता है । गाय दिव्य नहीं दिव्यतम है । बस आपका संकल्प सत्य हो आपकी भक्ति और सेवा में खोट न हो । संसार के लोगो को निचा दिखाना और अपने को ऊँचा उठाना ही आपका मकसद न हो । तो गाय बहुत कुछ यहाँ और सबकुछ वहां देती है ।
यही "पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे सहनं" से कोई मुक्ति दे सकती है तो वह ही गाय । क्योकि वैतरणी पर राम-कृष्ण, शिव,सूर्य या गणेश को भी वह अधिकार नहीं की किसी भक्त का हाथ पकड़ कर पार लगा दे । वहां तो सिर्फ गाय का ही पूछ पकड़ कर ही वैतरणी पार हो सकती है यह सभी देवताओं का एक मत में लिया गया निर्णय है ।
उसी गौ भक्ति से लबरेज इस बार फिर 1 से 8 नवम्बर तक मैं अपने कुछ साथियों के साथ शून्य होकर उसी स्थान पर गोपाल नाम का जप करने और अपने उन वीर गौ भक्त शहीद संतों को श्रधानजली देने जा रहा हूँ । अगर आपके पास थोड़ा समय हो तो जरूर मेरा साहस बढ़ाने उन महात्मा की तरह जरूर आना ! ताकि मैं और मेरे साथी आराम से अपनी 8 दिन की तपस्या पूरी कर सकें ।
"नयाल सनातनी" गौ चरणों का दास, स्वामी करपात्री जी महाराज का कट्टर अनुयायी, राम राज्य वादि चिंतक- विचारक । हैदराबाद
जय गौ माता जय गोपाल , जय नंदीश्वर जय महाकाल ।
सनातन शास्त्रों का मत है भगवान भोले नाथ को भजने वाले शिव लोक में , देवी के उपासक मणिद्वीप में , गणेश को आराध्य मानने वाले गणेश के लोक में , सूर्य और विष्णु के सच्चे भक्तों का स्थान वैकुण्ठ में सुनिश्चित होता है ।
आध्यत्म के शिखर पर अपना स्थान बनाये आदि शंकर के नये अवतार संसार के अब तक के एक मात्र धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज किस मत किस देव के अनुयायी थे आखिरी दिनों में ही यह भेद खुला !
जब बिरला जी और बहुत बड़े-बड़े महाराज जी के अनुयायी उनसे एक बार जिद कर पूछे की आपके इष्ट कोन है ? आप नित्य बाबा विश्वनाथ शिव का अभिषेक करते है , जय राम श्री राम जय जय राम से अपना कोई भी प्रवचन आदि शुरू करते है और सबको गाय की भक्ति का उपदेश देते है और आजीवन गाय की लड़ाई लड़ते रहे है । तब बहुत भक्तों के प्रयास के बाद स्वामी जी ने बताया कि शिव-राम में अंतर नहीं मेरे इष्ट शिव के भी जो इष्ट है वही है "इष्ट देव मम बालक रामु" और गाय की भक्ति का उपदेश एवं गाय की सेवा रक्षा का उपदेश मैं इसलिए देता हूँ "गाय परम सत्य" है इस पृथ्वी लोक में । भगवान कृष्ण को आप भजन करों पर गाय की तरह भगवन कृष्ण प्रत्यक्ष नहीं दिखते और आपकी सेवा वे प्रत्यक्ष स्वीकार कर रहे है या नहीं वह आपको मालूम नही पड़ती ! पर गाय उस अनंत ब्रह्माण्ड नायक कृष्ण की वह कृति है जो उनके बामांग से प्रकट हुई है वह आपकी सब सेवा - पूजा प्रत्यक्ष स्वीकार करती है और साथ ही साथ अमूत भी देती है । यह भी श्री कृष्ण का वचन है कि जो गाय की सेवा करेगा उसको अन्य किसी देवता की पूजा-सेवा करने की आवश्यकता नहीं क्योकि एक समय 33 करोड़ देवो ने गाय के शरीर में ही निवास बनाया था । और जो भी गाय या गौवंश की सेवा करता है उससे वचन वद्द होने के कारण सभी देवी-देवता सदा प्रसन्न रहते है । अतः देवताओं की पूजा सेवा में भूल चुके होने से जो पूजा कर्म में अपूर्णता आ जाती है उसे गाय की सेवा- पूजा पूर्ण कर देती है । यानि गाय गौवंश की सेवा पूजा के बिना कुछ आपकी देवो की पूजा भी पूर्ण नहीं । बड़ा से बड़ा यज्ञ कर लो देवताओं को भोग पहुचाने जिससे देवता पुष्ट होते है । अगर गौ घृत से नहीं किया तो देवता स्वीकार नही करते । देवता बलहीन होना पसंद करते है पर गाय के घी से हुए बिना यज्ञ का भाग स्वीकार नहीं करते । आज जितने यज्ञ हो रहे हैं उनमें से वही यज्ञ पूर्णहुति को प्राप्त होते है जो गाय के बिना मिलावटी घी के सहयोग से होते है बर्ना सब आग में डाल कर बर्बाद किया राशन के सामान है ।
स्वामी करपात्री जी महाराज की बातों को ब्रह्म लेख मानने वाला उनका कट्टर अनुयायी मैं "नयाल सनातनी" जब पिछले साल 7 नवम्बर को अपनी बीमारी की वजह से गौ भक्त शहीद संतो को श्रद्धांजलि देने दिल्ली नहीं पहुच पाया जो की में कई वर्षो से लगातार जाता रहा हूँ तो बड़ा आत्म ग्लानि से भर गया बिस्तर में लेट-लेट संकल्प कर लिया 7 को 3 से गुणा करने से जो योग आएगा उतने दिनों तक जन्तर-मन्तर पर बैठ कर उन संतो को श्रधानजली देते हुए ब्रह्म वैवर्त पुराण में जो सबसे बड़ा मन्त्र मुक्ति हेतु बताया गया उसका जप करूँगा और उन संतों को अर्पित कर दूंगा जो वहां शहीद हुए थे । मैंने किया भी वही 1 दिसंबर से 21 दिसंबर तक मैं जन्तर-मन्तर में बैठा रहा वही नारायण क्षेत्र में जपा जाने वाला महामंत्र जप करता रहा । मेरे लिए जन्तर-मन्तर भी नारायण क्षेत्र इसलिए बन गया कि आधुनिक स्वामी करपात्री के ही रूप संत गोपाल दास जी को जब पता चला मैं जन्तर-मन्तर पर तप कर रहा हूँ तो उन्होंने मेरे लिए दूध देने वाली दो गाये एक नंदी भेज दिया और उन गायो की सेवा के लिए दो सेवक भेज दिए एक नाम था दयालु दूसरे का नाम फौजी । जहाँ नारायण की गाय वहां नारायण क्षेत्र । जब 7 दिन बीत गए भारी ठण्ड थी रोज सुबह और रात में नाख लाल हो जाती थी । मच्छरों का आतंक ऐसे जैसे दुश्मन मुल्क से आतंकी भेजे हो ! 7वे दिन एक साधरण से कपडे में एक महात्मा आये और मेरे आसान के पास बैठ गए मैंने कोई खास ध्यान नहीं दिया वहां नित्य ही अनेक लोग-और महात्मा भेष में लोग आते रहते है और अपना सुझाव देते रहते थे । वे बोले कब से बैठे हो हमने कहाँ आज 7वा दिन है 21 तक बैठेंगे सांसदों से सत्याग्रह कर रहे है और नारायण नाम जप रहे है और मन बड़ा विचलित है क्योंकि आज सातवे दिन तक कुछ गिने- चुने लोग ही यहाँ आये है जबकि सबको मालूम है कि गौ रक्षा हेतु सांसदों से सत्याग्रह चल रहा है ।
तो वे बोले मैं यहाँ से वहां इस जन्तर-मन्तर पर 4 बार घुमा हूँ प्रत्येक पंडाल पर देखा सब अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहे है कोई पैन्सिन के लिए लड़ रहे है, कोई जमींन जर जोरू और जमींन के लिए और राजनैतिक लड़ाई के लिए अनेक लोग यहाँ बैठे है । पर तुम और तुम्हारा यह पांडाल गाय को सामने करके गौवंश की लड़ाई लड़ रहे हो इससे बड़ा पूण्य का काम मुझे और कोई नहीं दिखता ।
मन लगाकर जिस काम के लिए घर-परिवार त्याग कर हैदराबाद से यहाँ आये हो, जितने दिन का संकल्प करके बैठे हो वह काम पूरा करके ही यहाँ से जाना । तुम्हारी सफलता -असफलता यहाँ कोई माने नहीं रखती पर तुम्हारी दृण प्रतिज्ञा की कही न कही सुनवाई जरूर होगी । वह जो पल- पल का हिसाब रखता है क्या उसे मालूम नहीं एक बालक उसकी भी आराध्या गायों के हित में भूखे प्यासे यहाँ लड़ाई लड़ रहा है । इस कलिकाल में जब मानव एक घंटा गाय जैसे विषय पर जीवन भर बात नहीं करता तुम 21 अमूल्य दिन दे रहे हो । पीछे मत हटाना मिलेगा कुछ नहीं पर मिलेगा सबकुछ !
कह कर चले गए । उनकी अटपटी बात सुन मुझे कुछ समझ में नहीं आया ! तो मैं अपने जप माला में जप करने लगा और उनकी ओर से ध्यान हटा दिया जैसे ही माला पूरी हुई उस तरफ देखा वे महात्मा नहीं दिखे । मैंने बाद में सबको बताया एक महात्मा ने ऐसा कहाँ पर किसी ने अधिक ध्यान नहीं दिया । तभी उसी दिन पांडेय जी आये और ऐसा लगा जैसे जन्मो के साथी है और हमेशा के लिए जुड़ गए अनेको लोगो का आना तब से प्रारम्भ हो गया । भारत के अलावा इटली और जर्मनी आदि की मीडिया भी आके गई अनेक लोगो ने इंटरव्यू लिए कैसे 21 दिन बीत गए पता ही नहीं चला !
18 तारीख से हम ठाकुर रामपाल सिंह और संत गोपाल दास जी के साथ अनेक सांसदों से मिले । पालियामेन्ट चल रहा आप कृपया गाय का प्रसन्न संसद में उठाइये सबने कहा हाँ । पर कोंग्रेश संसद चलने दे तब न ! माननीय शिव सेना सांसद चंद्र कान्त खैरे जी से भी मिले उन्होंने कहाँ हम कल आपका प्रसन्न उठाएंगे । हम सभी संसद भवन में उस दिन की कार्यवाही देखने अंदर पहुच गए पर कोंग्रेश के सांसदों ने एक मिनट के लिए भी संसद नहीं चलने दी किसी को कोई प्रसन्न करने का मौका ही नहीं था ।
हम चले आये 21 तारीख को माननीय सांसद श्री खैरे जी ने संसद में गाय को राष्ट्र माता राष्ट्रिय प्राणी की मांग की और संत जी को फोन करके बताया आज संसद में आपका प्रसन्न उठाया गया । अगले दिन सभी अखबारों में वह खबर थी शिव सेना के मुख पत्र में बड़ा सा समाचार था । 21 को भाजपा के राष्ट्रीय कार्यालय में हमारे मित्र डॉ मित्तल साहब की गौ शास्त्र नामक किताब का लोकार्पण था । जहाँ उनकी कृपा से हमें 10 मिनट का सभी उपस्तिथ सांसदों और मंत्रियो के साथ गौ भक्तो को संबोधित करने का मौका मिला और सभी ने हमारा सम्मान भी किया जिसकी कल्पना हमने कभी नहीं की थी ।
इसलिए गाय साधारण नहीं असाधरण है । गाय माँ नहीं माँ से बढ़कर कर है , गाय देवता नहीं देवताओं की देवता है । गाय दिव्य नहीं दिव्यतम है । बस आपका संकल्प सत्य हो आपकी भक्ति और सेवा में खोट न हो । संसार के लोगो को निचा दिखाना और अपने को ऊँचा उठाना ही आपका मकसद न हो । तो गाय बहुत कुछ यहाँ और सबकुछ वहां देती है ।
यही "पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे सहनं" से कोई मुक्ति दे सकती है तो वह ही गाय । क्योकि वैतरणी पर राम-कृष्ण, शिव,सूर्य या गणेश को भी वह अधिकार नहीं की किसी भक्त का हाथ पकड़ कर पार लगा दे । वहां तो सिर्फ गाय का ही पूछ पकड़ कर ही वैतरणी पार हो सकती है यह सभी देवताओं का एक मत में लिया गया निर्णय है ।
उसी गौ भक्ति से लबरेज इस बार फिर 1 से 8 नवम्बर तक मैं अपने कुछ साथियों के साथ शून्य होकर उसी स्थान पर गोपाल नाम का जप करने और अपने उन वीर गौ भक्त शहीद संतों को श्रधानजली देने जा रहा हूँ । अगर आपके पास थोड़ा समय हो तो जरूर मेरा साहस बढ़ाने उन महात्मा की तरह जरूर आना ! ताकि मैं और मेरे साथी आराम से अपनी 8 दिन की तपस्या पूरी कर सकें ।
"नयाल सनातनी" गौ चरणों का दास, स्वामी करपात्री जी महाराज का कट्टर अनुयायी, राम राज्य वादि चिंतक- विचारक । हैदराबाद
जय गौ माता जय गोपाल , जय नंदीश्वर जय महाकाल ।