Sunday, October 23, 2016

जन्तर-मन्तर पर घटित सच्ची घटना !
सनातन शास्त्रों का मत है भगवान भोले नाथ को भजने वाले शिव लोक में , देवी के उपासक मणिद्वीप में , गणेश को आराध्य मानने वाले गणेश के लोक में , सूर्य और विष्णु के सच्चे भक्तों का स्थान वैकुण्ठ में सुनिश्चित होता है ।
आध्यत्म के शिखर पर अपना स्थान बनाये आदि शंकर के नये अवतार संसार के अब तक के एक मात्र धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज किस मत किस देव के अनुयायी थे आखिरी दिनों में ही यह भेद खुला !
जब बिरला जी और बहुत बड़े-बड़े महाराज जी के अनुयायी उनसे एक बार जिद कर पूछे की आपके इष्ट कोन है ? आप नित्य बाबा विश्वनाथ शिव का अभिषेक करते है , जय राम श्री राम जय जय राम से अपना कोई भी प्रवचन आदि शुरू करते है और सबको गाय की भक्ति का उपदेश देते है और आजीवन गाय की लड़ाई लड़ते रहे है । तब बहुत भक्तों के प्रयास के बाद स्वामी जी ने बताया कि शिव-राम में अंतर नहीं मेरे इष्ट शिव के भी जो इष्ट है वही है "इष्ट देव मम बालक रामु" और गाय की भक्ति का उपदेश एवं गाय की सेवा रक्षा का उपदेश मैं इसलिए देता हूँ "गाय परम सत्य" है इस पृथ्वी लोक में । भगवान कृष्ण को आप भजन करों पर गाय की तरह भगवन कृष्ण प्रत्यक्ष नहीं दिखते और आपकी सेवा वे प्रत्यक्ष स्वीकार कर रहे है या नहीं वह आपको मालूम नही पड़ती ! पर गाय उस अनंत ब्रह्माण्ड नायक कृष्ण की वह कृति है जो उनके बामांग से प्रकट हुई है वह आपकी सब सेवा - पूजा प्रत्यक्ष स्वीकार करती है और साथ ही साथ अमूत भी देती है । यह भी श्री कृष्ण का वचन है कि जो गाय की सेवा करेगा उसको अन्य किसी देवता की पूजा-सेवा करने की आवश्यकता नहीं क्योकि एक समय 33 करोड़ देवो ने गाय के शरीर में ही निवास बनाया था । और जो भी गाय या गौवंश की सेवा करता है उससे वचन वद्द होने के कारण सभी देवी-देवता सदा प्रसन्न रहते है । अतः देवताओं की पूजा सेवा में भूल चुके होने से जो पूजा कर्म में अपूर्णता आ जाती है उसे गाय की सेवा- पूजा पूर्ण कर देती है । यानि गाय गौवंश की सेवा पूजा के बिना कुछ आपकी देवो की पूजा भी पूर्ण नहीं । बड़ा से बड़ा यज्ञ कर लो देवताओं को भोग पहुचाने जिससे देवता पुष्ट होते है । अगर गौ घृत से नहीं किया तो देवता स्वीकार नही करते । देवता बलहीन होना पसंद करते है पर गाय के घी से हुए बिना यज्ञ का भाग स्वीकार नहीं करते । आज जितने यज्ञ हो रहे हैं उनमें से वही यज्ञ पूर्णहुति को प्राप्त होते है जो गाय के बिना मिलावटी घी के सहयोग से होते है बर्ना सब आग में डाल कर बर्बाद किया राशन के सामान है ।
स्वामी करपात्री जी महाराज की बातों को ब्रह्म लेख मानने वाला उनका कट्टर अनुयायी मैं "नयाल सनातनी" जब पिछले साल 7 नवम्बर को अपनी बीमारी की वजह से गौ भक्त शहीद संतो को श्रद्धांजलि देने दिल्ली नहीं पहुच पाया जो की में कई वर्षो से लगातार जाता रहा हूँ तो बड़ा आत्म ग्लानि से भर गया बिस्तर में लेट-लेट संकल्प कर लिया 7 को 3 से गुणा करने से जो योग आएगा उतने दिनों तक जन्तर-मन्तर पर बैठ कर उन संतो को श्रधानजली देते हुए ब्रह्म वैवर्त पुराण में जो सबसे बड़ा मन्त्र मुक्ति हेतु बताया गया उसका जप करूँगा और उन संतों को अर्पित कर दूंगा जो वहां शहीद हुए थे । मैंने किया भी वही 1 दिसंबर से 21 दिसंबर तक मैं जन्तर-मन्तर में बैठा रहा वही नारायण क्षेत्र में जपा जाने वाला महामंत्र जप करता रहा । मेरे लिए जन्तर-मन्तर भी नारायण क्षेत्र इसलिए बन गया कि आधुनिक स्वामी करपात्री के ही रूप संत गोपाल दास जी को जब पता चला मैं जन्तर-मन्तर पर तप कर रहा हूँ तो उन्होंने मेरे लिए दूध देने वाली दो गाये एक नंदी भेज दिया और उन गायो की सेवा के लिए दो सेवक भेज दिए एक नाम था दयालु दूसरे का नाम फौजी । जहाँ नारायण की गाय वहां नारायण क्षेत्र । जब 7 दिन बीत गए भारी ठण्ड थी रोज सुबह और रात में नाख लाल हो जाती थी । मच्छरों का आतंक ऐसे जैसे दुश्मन मुल्क से आतंकी भेजे हो ! 7वे दिन एक साधरण से कपडे में एक महात्मा आये और मेरे आसान के पास बैठ गए मैंने कोई खास ध्यान नहीं दिया वहां नित्य ही अनेक लोग-और महात्मा भेष में लोग आते रहते है और अपना सुझाव देते रहते थे । वे बोले कब से बैठे हो हमने कहाँ आज 7वा दिन है 21 तक बैठेंगे सांसदों से सत्याग्रह कर रहे है और नारायण नाम जप रहे है और मन बड़ा विचलित है क्योंकि आज सातवे दिन तक कुछ गिने- चुने लोग ही यहाँ आये है जबकि सबको मालूम है कि गौ रक्षा हेतु सांसदों से सत्याग्रह चल रहा है ।
तो वे बोले मैं यहाँ से वहां इस जन्तर-मन्तर पर 4 बार घुमा हूँ प्रत्येक पंडाल पर देखा सब अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहे है कोई पैन्सिन के लिए लड़ रहे है, कोई जमींन जर जोरू और जमींन के लिए और राजनैतिक लड़ाई के लिए अनेक लोग यहाँ बैठे है । पर तुम और तुम्हारा यह पांडाल गाय को सामने करके गौवंश की लड़ाई लड़ रहे हो इससे बड़ा पूण्य का काम मुझे और कोई नहीं दिखता ।
मन लगाकर जिस काम के लिए घर-परिवार त्याग कर हैदराबाद से यहाँ आये हो, जितने दिन का संकल्प करके बैठे हो वह काम पूरा करके ही यहाँ से जाना । तुम्हारी सफलता -असफलता यहाँ कोई माने नहीं रखती पर तुम्हारी दृण प्रतिज्ञा की कही न कही सुनवाई जरूर होगी । वह जो पल- पल का हिसाब रखता है क्या उसे मालूम नहीं एक बालक उसकी भी आराध्या गायों के हित में भूखे प्यासे यहाँ लड़ाई लड़ रहा है । इस कलिकाल में जब मानव एक घंटा गाय जैसे विषय पर जीवन भर बात नहीं करता तुम 21 अमूल्य दिन दे रहे हो । पीछे मत हटाना मिलेगा कुछ नहीं पर मिलेगा सबकुछ !
कह कर चले गए । उनकी अटपटी बात सुन मुझे कुछ समझ में नहीं आया ! तो मैं अपने जप माला में जप करने लगा और उनकी ओर से ध्यान हटा दिया जैसे ही माला पूरी हुई उस तरफ देखा वे महात्मा नहीं दिखे । मैंने बाद में सबको बताया एक महात्मा ने ऐसा कहाँ पर किसी ने अधिक ध्यान नहीं दिया । तभी उसी दिन पांडेय जी आये और ऐसा लगा जैसे जन्मो के साथी है और हमेशा के लिए जुड़ गए अनेको लोगो का आना तब से प्रारम्भ हो गया । भारत के अलावा इटली और जर्मनी आदि की मीडिया भी आके गई अनेक लोगो ने इंटरव्यू लिए कैसे 21 दिन बीत गए पता ही नहीं चला !
18 तारीख से हम ठाकुर रामपाल सिंह और संत गोपाल दास जी के साथ अनेक सांसदों से मिले । पालियामेन्ट चल रहा आप कृपया गाय का प्रसन्न संसद में उठाइये सबने कहा हाँ । पर कोंग्रेश संसद चलने दे तब न ! माननीय शिव सेना सांसद चंद्र कान्त खैरे जी से भी मिले उन्होंने कहाँ हम कल आपका प्रसन्न उठाएंगे । हम सभी संसद भवन में उस दिन की कार्यवाही देखने अंदर पहुच गए पर कोंग्रेश के सांसदों ने एक मिनट के लिए भी संसद नहीं चलने दी किसी को कोई प्रसन्न करने का मौका ही नहीं था ।
हम चले आये 21 तारीख को माननीय सांसद श्री खैरे जी ने संसद में गाय को राष्ट्र माता राष्ट्रिय प्राणी की मांग की और संत जी को फोन करके बताया आज संसद में आपका प्रसन्न उठाया गया । अगले दिन सभी अखबारों में वह खबर थी शिव सेना के मुख पत्र में बड़ा सा समाचार था । 21 को भाजपा के राष्ट्रीय कार्यालय में हमारे मित्र डॉ मित्तल साहब की गौ शास्त्र नामक किताब का लोकार्पण था । जहाँ उनकी कृपा से हमें 10 मिनट का सभी उपस्तिथ सांसदों और मंत्रियो के साथ गौ भक्तो को संबोधित करने का मौका मिला और सभी ने हमारा सम्मान भी किया जिसकी कल्पना हमने कभी नहीं की थी ।
इसलिए गाय साधारण नहीं असाधरण है । गाय माँ नहीं माँ से बढ़कर कर है , गाय देवता नहीं देवताओं की देवता है । गाय दिव्य नहीं दिव्यतम है । बस आपका संकल्प सत्य हो आपकी भक्ति और सेवा में खोट न हो । संसार के लोगो को निचा दिखाना और अपने को ऊँचा उठाना ही आपका मकसद न हो । तो गाय बहुत कुछ यहाँ और सबकुछ वहां देती है ।
यही "पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे सहनं" से कोई मुक्ति दे सकती है तो वह ही गाय । क्योकि वैतरणी पर राम-कृष्ण, शिव,सूर्य या गणेश को भी वह अधिकार नहीं की किसी भक्त का हाथ पकड़ कर पार लगा दे । वहां तो सिर्फ गाय का ही पूछ पकड़ कर ही वैतरणी पार हो सकती है यह सभी देवताओं का एक मत में लिया गया निर्णय है ।
उसी गौ भक्ति से लबरेज इस बार फिर 1 से 8 नवम्बर तक मैं अपने कुछ साथियों के साथ शून्य होकर उसी स्थान पर गोपाल नाम का जप करने और अपने उन वीर गौ भक्त शहीद संतों को श्रधानजली देने जा रहा हूँ । अगर आपके पास थोड़ा समय हो तो जरूर मेरा साहस बढ़ाने उन महात्मा की तरह जरूर आना ! ताकि मैं और मेरे साथी आराम से अपनी 8 दिन की तपस्या पूरी कर सकें ।
"नयाल सनातनी" गौ चरणों का दास, स्वामी करपात्री जी महाराज का कट्टर अनुयायी, राम राज्य वादि चिंतक- विचारक । हैदराबाद
जय गौ माता जय गोपाल , जय नंदीश्वर जय महाकाल ।
जन्तर-मन्तर पर घटित सच्ची घटना !
सनातन शास्त्रों का मत है भगवान भोले नाथ को भजने वाले शिव लोक में , देवी के उपासक मणिद्वीप में , गणेश को आराध्य मानने वाले गणेश के लोक में , सूर्य और विष्णु के सच्चे भक्तों का स्थान वैकुण्ठ में सुनिश्चित होता है ।
आध्यत्म के शिखर पर अपना स्थान बनाये आदि शंकर के नये अवतार संसार के अब तक के एक मात्र धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज किस मत किस देव के अनुयायी थे आखिरी दिनों में ही यह भेद खुला !
जब बिरला जी और बहुत बड़े-बड़े महाराज जी के अनुयायी उनसे एक बार जिद कर पूछे की आपके इष्ट कोन है ? आप नित्य बाबा विश्वनाथ शिव का अभिषेक करते है , जय राम श्री राम जय जय राम से अपना कोई भी प्रवचन आदि शुरू करते है और सबको गाय की भक्ति का उपदेश देते है और आजीवन गाय की लड़ाई लड़ते रहे है । तब बहुत भक्तों के प्रयास के बाद स्वामी जी ने बताया कि शिव-राम में अंतर नहीं मेरे इष्ट शिव के भी जो इष्ट है वही है "इष्ट देव मम बालक रामु" और गाय की भक्ति का उपदेश एवं गाय की सेवा रक्षा का उपदेश मैं इसलिए देता हूँ "गाय परम सत्य" है इस पृथ्वी लोक में । भगवान कृष्ण को आप भजन करों पर गाय की तरह भगवन कृष्ण प्रत्यक्ष नहीं दिखते और आपकी सेवा वे प्रत्यक्ष स्वीकार कर रहे है या नहीं वह आपको मालूम नही पड़ती ! पर गाय उस अनंत ब्रह्माण्ड नायक कृष्ण की वह कृति है जो उनके बामांग से प्रकट हुई है वह आपकी सब सेवा - पूजा प्रत्यक्ष स्वीकार करती है और साथ ही साथ अमूत भी देती है । यह भी श्री कृष्ण का वचन है कि जो गाय की सेवा करेगा उसको अन्य किसी देवता की पूजा-सेवा करने की आवश्यकता नहीं क्योकि एक समय 33 करोड़ देवो ने गाय के शरीर में ही निवास बनाया था । और जो भी गाय या गौवंश की सेवा करता है उससे वचन वद्द होने के कारण सभी देवी-देवता सदा प्रसन्न रहते है । अतः देवताओं की पूजा सेवा में भूल चुके होने से जो पूजा कर्म में अपूर्णता आ जाती है उसे गाय की सेवा- पूजा पूर्ण कर देती है । यानि गाय गौवंश की सेवा पूजा के बिना कुछ आपकी देवो की पूजा भी पूर्ण नहीं । बड़ा से बड़ा यज्ञ कर लो देवताओं को भोग पहुचाने जिससे देवता पुष्ट होते है । अगर गौ घृत से नहीं किया तो देवता स्वीकार नही करते । देवता बलहीन होना पसंद करते है पर गाय के घी से हुए बिना यज्ञ का भाग स्वीकार नहीं करते । आज जितने यज्ञ हो रहे हैं उनमें से वही यज्ञ पूर्णहुति को प्राप्त होते है जो गाय के बिना मिलावटी घी के सहयोग से होते है बर्ना सब आग में डाल कर बर्बाद किया राशन के सामान है ।
स्वामी करपात्री जी महाराज की बातों को ब्रह्म लेख मानने वाला उनका कट्टर अनुयायी मैं "नयाल सनातनी" जब पिछले साल 7 नवम्बर को अपनी बीमारी की वजह से गौ भक्त शहीद संतो को श्रद्धांजलि देने दिल्ली नहीं पहुच पाया जो की में कई वर्षो से लगातार जाता रहा हूँ तो बड़ा आत्म ग्लानि से भर गया बिस्तर में लेट-लेट संकल्प कर लिया 7 को 3 से गुणा करने से जो योग आएगा उतने दिनों तक जन्तर-मन्तर पर बैठ कर उन संतो को श्रधानजली देते हुए ब्रह्म वैवर्त पुराण में जो सबसे बड़ा मन्त्र मुक्ति हेतु बताया गया उसका जप करूँगा और उन संतों को अर्पित कर दूंगा जो वहां शहीद हुए थे । मैंने किया भी वही 1 दिसंबर से 21 दिसंबर तक मैं जन्तर-मन्तर में बैठा रहा वही नारायण क्षेत्र में जपा जाने वाला महामंत्र जप करता रहा । मेरे लिए जन्तर-मन्तर भी नारायण क्षेत्र इसलिए बन गया कि आधुनिक स्वामी करपात्री के ही रूप संत गोपाल दास जी को जब पता चला मैं जन्तर-मन्तर पर तप कर रहा हूँ तो उन्होंने मेरे लिए दूध देने वाली दो गाये एक नंदी भेज दिया और उन गायो की सेवा के लिए दो सेवक भेज दिए एक नाम था दयालु दूसरे का नाम फौजी । जहाँ नारायण की गाय वहां नारायण क्षेत्र । जब 7 दिन बीत गए भारी ठण्ड थी रोज सुबह और रात में नाख लाल हो जाती थी । मच्छरों का आतंक ऐसे जैसे दुश्मन मुल्क से आतंकी भेजे हो ! 7वे दिन एक साधरण से कपडे में एक महात्मा आये और मेरे आसान के पास बैठ गए मैंने कोई खास ध्यान नहीं दिया वहां नित्य ही अनेक लोग-और महात्मा भेष में लोग आते रहते है और अपना सुझाव देते रहते थे । वे बोले कब से बैठे हो हमने कहाँ आज 7वा दिन है 21 तक बैठेंगे सांसदों से सत्याग्रह कर रहे है और नारायण नाम जप रहे है और मन बड़ा विचलित है क्योंकि आज सातवे दिन तक कुछ गिने- चुने लोग ही यहाँ आये है जबकि सबको मालूम है कि गौ रक्षा हेतु सांसदों से सत्याग्रह चल रहा है ।
तो वे बोले मैं यहाँ से वहां इस जन्तर-मन्तर पर 4 बार घुमा हूँ प्रत्येक पंडाल पर देखा सब अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहे है कोई पैन्सिन के लिए लड़ रहे है, कोई जमींन जर जोरू और जमींन के लिए और राजनैतिक लड़ाई के लिए अनेक लोग यहाँ बैठे है । पर तुम और तुम्हारा यह पांडाल गाय को सामने करके गौवंश की लड़ाई लड़ रहे हो इससे बड़ा पूण्य का काम मुझे और कोई नहीं दिखता ।
मन लगाकर जिस काम के लिए घर-परिवार त्याग कर हैदराबाद से यहाँ आये हो, जितने दिन का संकल्प करके बैठे हो वह काम पूरा करके ही यहाँ से जाना । तुम्हारी सफलता -असफलता यहाँ कोई माने नहीं रखती पर तुम्हारी दृण प्रतिज्ञा की कही न कही सुनवाई जरूर होगी । वह जो पल- पल का हिसाब रखता है क्या उसे मालूम नहीं एक बालक उसकी भी आराध्या गायों के हित में भूखे प्यासे यहाँ लड़ाई लड़ रहा है । इस कलिकाल में जब मानव एक घंटा गाय जैसे विषय पर जीवन भर बात नहीं करता तुम 21 अमूल्य दिन दे रहे हो । पीछे मत हटाना मिलेगा कुछ नहीं पर मिलेगा सबकुछ !
कह कर चले गए । उनकी अटपटी बात सुन मुझे कुछ समझ में नहीं आया ! तो मैं अपने जप माला में जप करने लगा और उनकी ओर से ध्यान हटा दिया जैसे ही माला पूरी हुई उस तरफ देखा वे महात्मा नहीं दिखे । मैंने बाद में सबको बताया एक महात्मा ने ऐसा कहाँ पर किसी ने अधिक ध्यान नहीं दिया । तभी उसी दिन पांडेय जी आये और ऐसा लगा जैसे जन्मो के साथी है और हमेशा के लिए जुड़ गए अनेको लोगो का आना तब से प्रारम्भ हो गया । भारत के अलावा इटली और जर्मनी आदि की मीडिया भी आके गई अनेक लोगो ने इंटरव्यू लिए कैसे 21 दिन बीत गए पता ही नहीं चला !
18 तारीख से हम ठाकुर रामपाल सिंह और संत गोपाल दास जी के साथ अनेक सांसदों से मिले । पालियामेन्ट चल रहा आप कृपया गाय का प्रसन्न संसद में उठाइये सबने कहा हाँ । पर कोंग्रेश संसद चलने दे तब न ! माननीय शिव सेना सांसद चंद्र कान्त खैरे जी से भी मिले उन्होंने कहाँ हम कल आपका प्रसन्न उठाएंगे । हम सभी संसद भवन में उस दिन की कार्यवाही देखने अंदर पहुच गए पर कोंग्रेश के सांसदों ने एक मिनट के लिए भी संसद नहीं चलने दी किसी को कोई प्रसन्न करने का मौका ही नहीं था ।
हम चले आये 21 तारीख को माननीय सांसद श्री खैरे जी ने संसद में गाय को राष्ट्र माता राष्ट्रिय प्राणी की मांग की और संत जी को फोन करके बताया आज संसद में आपका प्रसन्न उठाया गया । अगले दिन सभी अखबारों में वह खबर थी शिव सेना के मुख पत्र में बड़ा सा समाचार था । 21 को भाजपा के राष्ट्रीय कार्यालय में हमारे मित्र डॉ मित्तल साहब की गौ शास्त्र नामक किताब का लोकार्पण था । जहाँ उनकी कृपा से हमें 10 मिनट का सभी उपस्तिथ सांसदों और मंत्रियो के साथ गौ भक्तो को संबोधित करने का मौका मिला और सभी ने हमारा सम्मान भी किया जिसकी कल्पना हमने कभी नहीं की थी ।
इसलिए गाय साधारण नहीं असाधरण है । गाय माँ नहीं माँ से बढ़कर कर है , गाय देवता नहीं देवताओं की देवता है । गाय दिव्य नहीं दिव्यतम है । बस आपका संकल्प सत्य हो आपकी भक्ति और सेवा में खोट न हो । संसार के लोगो को निचा दिखाना और अपने को ऊँचा उठाना ही आपका मकसद न हो । तो गाय बहुत कुछ यहाँ और सबकुछ वहां देती है ।
यही "पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे सहनं" से कोई मुक्ति दे सकती है तो वह ही गाय । क्योकि वैतरणी पर राम-कृष्ण, शिव,सूर्य या गणेश को भी वह अधिकार नहीं की किसी भक्त का हाथ पकड़ कर पार लगा दे । वहां तो सिर्फ गाय का ही पूछ पकड़ कर ही वैतरणी पार हो सकती है यह सभी देवताओं का एक मत में लिया गया निर्णय है ।
उसी गौ भक्ति से लबरेज इस बार फिर 1 से 8 नवम्बर तक मैं अपने कुछ साथियों के साथ शून्य होकर उसी स्थान पर गोपाल नाम का जप करने और अपने उन वीर गौ भक्त शहीद संतों को श्रधानजली देने जा रहा हूँ । अगर आपके पास थोड़ा समय हो तो जरूर मेरा साहस बढ़ाने उन महात्मा की तरह जरूर आना ! ताकि मैं और मेरे साथी आराम से अपनी 8 दिन की तपस्या पूरी कर सकें ।
"नयाल सनातनी" गौ चरणों का दास, स्वामी करपात्री जी महाराज का कट्टर अनुयायी, राम राज्य वादि चिंतक- विचारक । हैदराबाद
जय गौ माता जय गोपाल , जय नंदीश्वर जय महाकाल ।

Friday, October 21, 2016

भारतीय आदर्श संत समाज के नाम एक पत्र ! समस्त संत समाज को दास का कोटि-कोटि नमन । दास स्वामी करपात्री जी महाराज का अनुयायी है । और अयोध्या राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष गुरुदेव स्वामी नृत्य गोपाल दास जी महाराज का शिष्य है । साथ में "सर्वदलीय गौरक्षा मंच" हैदराबाद से पंजीकृत संस्था का वर्तमान में अध्यक्ष हूँ । और पिछले 17 वर्षों से स्वामी करपात्री जी महाराज के गौरक्षा आंदोलन से जुड़ा हुआ हूँ । संत भगवान हम अपने गौ भक्त साथियों के साथ स्वामी करपात्री जी महाराज एवं देश के 10 लाख साधु-संतों और गौभक्तों के ऐतिहासिक 1966 के गौरक्षा आंदोलन की 50वी वर्षगाठ पर 1 से 8 नवम्बर 2016 तक जन्तर - मंतर दिल्ली में 9 सूत्रीय मांगों के साथ केंद्र सरकार एवं समस्त पक्ष-विपक्ष के सांसदों से सत्याग्रह ( सत्य का आग्रह * गाय ही परम सत्य है ) करने जा रहे हैं । हमने पिछले वर्ष भी ऐसा ही 21 दिवासित सत्याग्रह 1 से 21 दिसंबर तक जन्तर-मन्तर पर किया था । जिसके परिणाम स्वरुप शिव सेना के माननीय सांसद श्री चंद्र कान्त खैरे जी ने संसद में यह संपूर्ण गौ रक्षा का यक्ष प्रश्न उठाया था । जिसे सभी मिडिया घरानों ने खुल कर छापा । उसी का नतीजा था कि तब से राष्ट्रिय चैनल आज तक,ज़ी न्यूज़, सुदर्शन चैनल आदि अनेक और लगभग सारे मिडिया घराने गाय पर पिछले एक साल में टीवी के माध्यम से एक बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिए है । और गाय की उपयोगिता को जग जाहिर किये । माननीय सांसद खैरे जी के साथ-साथ उन सभी चैनलो को भी हम धन्यबाद देते है । इस वर्ष हमने सभी पक्ष -विपक्ष के सांसदों को भी निवेदन पत्र देते हुए अभी तक 240 सांसदों तक अपनी बात पहुचाई है । और बाकी के सांसदों को हम 1 से 8 नवम्बर तक होने वाले सत्याग्रह में पत्र लिख कर भेज रहे है । कई सांसदों मंत्रियों से हम मिले भी है जिनका कहना है इस बार शीतकालीन सत्र में वे इसपर जरूर संसद में चर्चा कराएँगे । अब आगे के आंदोलन हेतु आप सभी संतों के पवित्र आशीर्वाद का दास आकांक्षी है । अगर संभव हो तो एक दिन 7 नवम्बर ऐतिहासिक गौरक्षा आंदोलन की 50वीं वर्षगाठ पर दिल्ली आने की कृपा करें ! अगर किसी कारण वस दिल्ली आना संभव नहीं हो पाए तो आप इस आंदोलन में अपने समर्थन देते हुए अपने व्यान को स्थानीय मिडिया में जरूर देने की कृपा करें । क्योकि जब गौरक्षा हेतु शहीद हुए संतों की 100 वी पूण्य तिथि आएगी आप और हम होंगे की नहीं यह राम जी को ही पता होगा ! इसलिए यह मत्वपूर्ण दिन न भूले ।। हमने सरकार एवं सभी सांसदों से जो मुख्य 9 मांग रखी है वे नीचे बैनर में प्रदर्शित है । अगर अज्ञान वस कोई मत्वपूर्ण मांग रह गई हो तो आप संत इस दास को आदेशित करें । उसे भी शामिल किया जा सकता है । किसी भी प्रकार की अधिक जानकारी हेतु आप दास को कभी भी फोन कर सकते है । "नयाल सनातनी" - 9849702915 जय गौ माता-जय गोपाल, जय नंदीश्वर-जय महाकाल ।
सृष्टि चक्र में कीट से लेकर हाथी तक सब सहायक ।
उत्तराखंड के प्रत्येक गाँव में पहले नंदी अलमस्त घुमते दिख जाते थे ! इन नन्दियों को शिव गण कहाँ जाता था ।लोग इनको पूजते इनको गौ ग्रास देते और कभी कभार खेत -खलिहान से ये थोड़ा बहुत खेती या अनाज खा लेते भी तो उनको हाँक कर भगा देते ! डंडा उठाकर कभी नहीं मारते थे । यह सब आँखों देखि बता रहा हूँ ।
पर ---
समय का चक्र बदला,लोगो की भावना भी बदली, आधुनिकता ने गाँवों को भी अपने आगोश में ले लिए ।पहले लोग अपने पितरों के नाम पर उनकी मुक्ति हेतु नंदी छोड़ देते थे ! अब नहीं के बराबर यह परमपरा रह गई । कुछ तो लोग आधुनिक हो गए कुछ स्वार्थी । स्वार्थी इसलिए की अगर कोई नन्दी छोड़ता है तो दूसरे लोग थोड़ा उनके खेतो में नंदी के चले जाने पर स्वर्ग गए नंदी छोड़ने वाले के पितरो को नरक में भेजने वाली गलियों की बौछार कर देते है । नंदी को डंडों से लहूलुहां कर देते है अलग । परिणाम जो नंदी के भय से रात में उसकी शेर की तरह चमकती आँखों से और शेर जैसी हुंकार से जंगली शुवर, आदमखोर बाघ , लकड़बग्गा दिन में बन्दर आदि जंगली जानवर गाँव की सरहद से दूर रहते थे आज प्रत्येक ग्रामीण के घर के आंगन में तांडव कर रहे है ।
जंगली शुवर तो दिन में बोये बीजो को रात होते होते सफाचट कर दे रहे है । बन्दर घर में घुस कर गुड़ की भेली ले भाग रहे है । आँगन में भोजन करना दुर्भर हो गया है आदमी के एक निवाला खाने से पहले बन्दर झपटा मार सब ले भाग रहे है । बाघ और लक्डबघों की डर से पहाड़ी लोग 7 बजे बाद घर से बहार निकलने में डरते है । नंदी शिव का वाहन है इसलिए जहाँ नंदी हो वहां से भूत-प्रेत बाधा दूर भाग जाते थे क्योंकि जहाँ भूत नाथ शिव का मुख्य गण हो वहां छोटे-मोटे भूत-प्रेतों की क्या औकात है !
पर ग्रामीणों ने नंदी के साथ-साथ गायों को भी गाँव से बहार का रास्ता दिखा कर अपने लिए ही बड़ा भारी गड्ढा खोद लिया । गाय लक्ष्मी का प्रत्यक्ष रूप है पर जब आप लक्ष्मी को गावँ की सरहद में घुसने नहीं देंगे तो कल्याण कैसे होगा !
जिस गाय के गौमूत्र में पितरों को मुक्ति देने वाली "गंगा माँ" निवास कर छुवा-छूत, भूत-प्रेत, अला-बला आदि अनेक ग्रामीण बिमारियों का इलाज सहज ही करती थी । उसी परोपकारी गाय को लोगो ने घर से ही नहीं गावँ की परिधि से दूर भेज दिया और कुछ कलयुग के एजेंट इसका फायदा उठाकर धन के लालच में उनको एक जगह इकट्ठा कर कसाई की गाडी में चढ़ा दिए ।
अब भला जब मनुष्य अपने लिए खुद गड्ढा खोद कर बैठा हुआ हो तो उसको कौन बचाये ।!
अब भी देरी नहीं हुई अगर प्रत्येक ग्रामीण हर गाँव में 2-4 उत्तम नस्ल के नंदी छोड़े और गाय-बैल को फिर से अपने जीवन साथी की तरह अपने घर में स्थान दें तो सब फिर से सूखी हो जायेंगे । उत्तम नस्ल के नंदी सुंदर गौवंश को जन्म देकर अधिक दूध देने वाली गौ वत्सा को जन्म देंगे ।
पहले नंदी दिनभर गावँ के मंदिर में पड़े रहते थे हम बच्चे लोग उसको वही रोटियां खिला आते थे । कुछ माताएं उसको वही घास डाल देती थी । शाम होते ही नंदी अपनी मस्त चाल से गावँ की सरहद में घूमने निकल जाता था। । पर अब 100 गाँवों में घूमने पर भी एक-दो नंदी नहीं दिखते । क्योकि लोगो ने उसे चारा डालना बंद कर दिया है । कुछ नंदी यदा-कदा गाँवों के हाट- बाजारों में दिखते है क्योंकि वहां उनको कुछ दुकानदारों द्वारा फैंक सब्जियों के बचे डंठल आदि मिलता है । और बाकी पोलोथि खाकर जीवन यापन कर रहे है और असमय मृत्य के इंतजार में दिखते है ।
क्या कर दिया है न हमारी आधुनिकता ने ! बाजार बाद ने ! पश्चिम संस्कृति के अपनाने से !!
आ फिर लौट चलें ---
नयाल सनातनी" सर्वदलीय गौरक्षा मंच

Monday, October 17, 2016

सनातनी विचार !
परमात्मा की सबसे प्यारी रचना "गौवंश" के हित में कार्य करने वाले का कोई दुश्मन नहीं हो सकता ! अगर दुर्भाग्य बस विधि का मारा कोई दुश्मनी करें तो उसपर हमें विचार नहीं करना चाहिए गौ माता और उनके गोपाल कृष्ण उसका और आपका नियम अनुसार ध्यान रखने को काफी है ।
हमसे कोई दुश्मनी रखें तो कोई बात नहीं पर जब उस दुश्मन पर मुसीबत आये तो हमें जरूर याद करें हम भगवती की दी हुई शक्ति अनुसार सहायक जरूर हूँगें यह एक क्षत्रिय बालक की कसम है ।
"नयाल सनातनी"
सनातनी विचार !
सूर्य और क्षत्रिय वीरो को कभी आजमाना नहीं चाहिए !
अधिक देर तक प्रचंड सूर्य की किरणों का सेवन कैंसर जैसे घातक रोग का कारण हो सकता है पर प्रेम से सुबह की हलकी सेकन अनेक बीमारियों से निजात दिला देता है । उसी प्रकार क्षत्रिय कुमार प्रेम और अपने पन में जीता हुआ लंका का राज भी विभीषण जैसे विनम्र को समर्पित कर देते है और आंख दिखाने गौ वंश का अहित करने पर अपने कंस जैसे मामा का ही वध कर देते हैं ।
"नयाल सनातनी"
सनातनी विचार !
अपनों से दूर रहकर बड़ा बनने और अधिक कमाने की चाह में कभी जिंदगी के असली मजे न लुटा देना ! ईश्वर एकबार ही तो मानव जीवन देता है । कम खाके-गम खाके भी जीवो के दुःख बांटने में जो आनंद है वह स्वर्ण की थाली में परोशे 56 भोगो वाले भोजन से लाख गुणा बेहतर है । अरबो कमा लो पर जाएगा साथ कुछ नहीं क्योकि कफ़न में जेब नहीं होती !
मालूम है अधिक पैसे वाली जयललिता कभी नहीं सोती !
इसलिये उनकी बीमारी की चर्चा भी टीवी आजतक पर होती !😢
"नयाल सनातनी"
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा :-
यया धर्ममधर्मम् च कार्यं चाकार्यमेव च। अयथावत् प्रजानाति, बुद्धिः सा पार्थ राजसी।
अधर्मम् धर्ममिति या मन्यते तमसावृता। सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी।


हे अर्जुन !!
जो धर्म और अधर्म, कार्य और अकार्य को सही रूप से नहीं जानती, वह बुद्धि राजसी अर्थात् भौतिकवादी अर्थात् मोहग्रस्त है।

जो अधर्म को ही धर्म, और धर्म को ही अधर्म अर्थात् सबकुछ उल्टा ही समझती है, वह बुद्धि तामसी अर्थात् पतनकारिणी अर्थात् निम्नतम है।

आजकल ऐसी बुद्धि वर्तमान राजकारिणी यो में पायी जाती है।

नयाल सनातनी
याद रहे सूर्य मंडल का भेदन या तो योगी या वीर गति को प्राप्त सूरवीर ही कर सकता है इसके अलावा कोई सूर्य मंडल का भेदन कर सकता है तो वह गौ माता का कृपा प्राप्त सेवक । जो आप सडयंत्र कारी तो कतई नहीं है ! हां किसी सच्चे गौ सेवक से भूल कर भी ना टकराना नष्ट होने में अधिक देर नहीं लगेगी ! 
 "नयाल सनातनी"
सनातनी विचार !
लाखों की भीड़ इक्कठा कर ढोल- तासे बजाने से भालू नहीं पकडे जाते ! भालू पकड़ने के लिए चंद कुशल मदारी काफी होता है ।
वैसे ही साल भर उदासीन रहकर एक दिन लाखों की भीड़ इकठ्ठा कर गौरक्षा के नारे लगाने से गौवंश की रक्षा कदापि नहीं हो सकती । गौ रक्षा-गौसेवा तो वे 80%गुंडे ही करते थे । और करते रहेंगे ! जो आपके चाल-छल से वाकिफ न थे । इसलिए गौ प्रेम मे जेल चले गए , कुछ आपकी गन्दी चाल में बदनाम हो गए और कुछ हँसते हँसते जान दे गए । आप तो सरकारी खर्चे से जब भी जाम पिए आज भी और कल भी मैदान ही मारोगे । ऊपर वाले को न जाने आप अपना यह दागदार चेहरा कैसे दिखाएंगे ? ये आप जानो ये आप जानो उसके यहाँ सबका न्याय होता है यह बात का ध्यान रख कर चाल चलिए हुजूर ।
।। सत्ता विष भी और अमृत भी होती है ।।
"नयाल सनातनी" :-- सर्वदलीय गौरक्षा मंच
साक्षात देवी !
इंदौर की महारानी गौ माता की अनन्य भक्त देवी अहिल्या बाई होल्कर की मूर्ति आदरणीय लोकसभा अध्यक्षा श्रीमती सुमित्रा ताई महाजन के अथक प्रयास और सभी पक्ष -विपक्ष के माननीय सांसदों के पूर्ण समर्थन से अब संसद में विराजमान है ।
भगवान आसुतोष शिव की पुजारिन बद्रीनाथ से लेकर काशी , रामेश्वरम तक अनेक शिव मंदिरों का जीणोद्धार कराने वाली माता अहिल्या बाई होल्कर के इस मूर्ति के हाथ में भी शिव लिंग स्थापित है । ऐसी महान देवी के सामने ही संसद से पास कानून गौ-हत्या कर करोडो टन शिव के वाहन नंदी, गौ माता और उनके बछड़ो का मांस निर्यात कर रहा है ।
क्या यह संसद और देवी अहिल्या बाई का अपमान नहीं है ।? सोचो !!
"नयाल सनातनी" गौ चरणों का दास --
"सर्वदलीय गौरक्षा मंच परिवार"
सनातनी विचार !
अहंकार इंद्र के पद से भी गिरा देता है । ब्रह्मा का सिर छेदन कर सकता है । सोने की चमकती लंका में कालिख पोत सकता ! इसलिए संसार में अहंकार से बड़ा सत्रु अपना कोई नहीं हो सकता । और इस रोग से प्रत्येक मानव किसी न किसी रूप में ग्रसित हो ही जाता है !
इससे मुक्ति का मार्ग सिर्फ भगवान के गुणवाद और परमात्मा की सुध जीव के मन में सदा बनी रहे एक मात्र मार्ग महापुरुषों ने सनातन शास्त्रो के माध्यम से हमें बताया है ।
"नयाल सनातनी"
सिर्फ अपने लिए अपने परिवार के लिए प्रार्थना करने वाले को सनातन धर्म में कैकई बुद्धि वाला कहते है और सबके कल्याण के लिए प्रार्थना करने वाले को गौ - बुद्धि या संत बुद्धि कहते है ।
"नयाल सनातनी"
सनातनी विचार !
माँ से मिलो तो सबका कल्याण मांगो आपका कल्याण अपने आप होगा । क्योंकि आप और आपका परिवार भी सबमे आ जाते है ।
"नयाल सनातनी"💐
सनातनी विचार !
थोड़ी सी रामायण,बहुत बड़ा ज्ञान !
सिर्फ अपने और अपने पुत्र के हित की बात कहने-सोचने के कारण ही आज भारत वर्ष में कोई अपने बेटी का नाम कैकई नहीं रखता या रख कर लज्जित नहीं होना चाहता !
और अपना हित छोड़ सब कुछ भगवान का समझ कर त्याग देने वाला कैकई के ही सुपुत्र के नाम से आज भारत है और लाखों भारतीय अपने बेटे का नाम भरत रख कर गौरान्वित होते है ।
"नयाल सनातनी"
सनातनी विचार !
थोड़ी सी भागवत बड़ा सा ज्ञान ।
श्रीमद भागवत कथा में कई विद्द्वान भागवताचार्य के मुख से आता है कि सुदामा गरीब ब्राह्मण थे !
भक्त को लगता है कि भगवान के अनन्य भक्त सुदामा से बड़ा अमीर संसार में कोई नहीं था । जिनके चरण धोने स्वयंग त्रिलोकी के नाथ राजाधिराज श्री कृष्ण चंद्र लालयत थे अपने अमृत तुल्य आशुओं से ही जिनके पाँव धो डालें वह ब्राह्मण गरीब कैसा !
गरीब तो कंस- जरासंघ आदि लक्ष्मी पुत्र राजा लोग थे जिनके अधर्मी प्राणों के प्यासे स्वयंग भगवान थे ।
"नयाल सनातनी"
हा हा हा आज विजयादशमी पर अनेकों अहंकारी और बलात्कारी आम और खास और बड़े -बडे नेता- अभिनेता भी किस अहंकारी रावण का वध करने ( जलाने निकले )है आज ! !
क्या रावण धन के अहंकार रूप-रंग, बल और महिलाओं के मान-मर्दन का प्रतीक भी नही था !
अगर हां तो आज भी प्रति दिन हजारों बहन-बेटियों का मान - मर्दन की आये-दिन खबर टीवी-अख़बार में आती ही नहीं रहती है ? क्या उनको पहले अपने अहंकार का पुतला नहीं फूंकना चाहिए । ? रावण का अहंकार ने तो सिर्फ सीता जी का अपहरण किया था ! जबकि आधुनिक रावण तो बलात्कार कर एसिड से तक बहन-बेटियों को जला देता है ।
आज भी कल भी और कल भी मानव को अपने अंदर के अहंकार रुपी रावण को जलाने की जरूरत है !राम के द्वारा मारा गया हजारों वर्ष पूर्व लंका पति रावण के पुतले को जलाने की कतई जरूरत नहीं !
मेरा मानना है रावण के पुतले को जलाकर हम ब्रह्म ज्ञानी रावण का अपमान ही करते है ।
जबकि अज्ञान रुपी आतंकवाद का पुतला फूंकना चाहिए !
मैं आज अपने अंदर के पहाड़ जैसे अहंकार को जला कर अपने सभी इष्ट-मित्रो और साथियों को अपने द्वारा जाने -अनजाने में हुए दुर्व्यवहार के लिए हाथ जोड़कर माफ़ी मांगता हूँ ।
"नयाल सनातनी" गौ चरणों का दास, रामराज्य वादी चिंतक-विचारक ।
मैंने रावण नहीं जलाया !
जब मैंने झाँका अपने अंतर मन में !
ना रावण सा में भगवान आशुतोष शिव का अनन्य भक्त बन पाया हूँ ! न रावण सा तपस्वी योद्धा । जिसने शिव को पाया अपनी तपस्या से श्री राम को पाया अपनी मुक्ति से ।
मेरी हैसियत नहीं की मैं रावण के पुतले को अग्नि देता मैं न ही रावण सा दानी जो अपना एक सिर भी नहीं चढ़ा सकता जबकि रावण 10 सिर चढ़ा कर भी अपने संकल्प से टस से मस नहीं हुआ !
ना ही रावण सा विद्द्वान जो भगवान श्री राम को भी मजबूर कर दें कि मंदिर बना कर पूजा को उसे ही बुलाना पड़ा !
रावण में एक ही अवगुण था उसे अहंकार बहुत था । होगा क्यों नहीं उस समय का सबसे बड़ा धनाढ्य रावण था जिसके घर के ईट- पत्थर और दरवाजे भी सोने हीरे मोती-जवाहरात के थे । क्या आज अगर इतना धन मेरे-आप के पास होता ! तो रावण से कम अहंकारी होते !
क्या आज किसी अमीर के घर पर कोई महिला कई महीने उसके रहमो कर्मो पर रहे वह याचना करेगा की मेरे से विवाह कर ले मैं समझता हूँ नहीं आज का रावण जबदस्ती शादी कर लेता और नहीं मानने पर अनेक अत्याचार कर देता ।
रावण से बलवान, बुद्धिवान,ज्ञानवान, सुन्दर सुडौल शरीर जिसे देख देव लोक की अप्सराएं भी मोहित हो जाती थी ।
ऐसे अनेक अवगुण है आज के प्रत्येक मानव में है । पर फिर भी वह अपने अंदर के रावण को जलाने के बजाय उस महान विद्द्वान रावण के पुतले को जलाते है जिसने सिर्फ मुक्ति पाने के लिए भगवान राम से बैर लिया ।
विधि द्वारा मानव योनि मिलती ही इसलिए है इस संसार में की "पुनरिपी जननंम पुनरिपी मरणं" से मुक्ति मिल सके । पर क्या आज कोई भी मानव अपनी मुक्ति के लिए भगवान् से वैर ले सकता है ! या इतनी भक्ति भगवान की कर सकता है वह चाहे कितना भी बड़ा साधु- संत वर्त्तमान में हो !
उसकी मुक्ति हो सके ! उसकी भक्ति से भगवान वरदान दे दें ।
जब सीता जी अवतार भी नहीं ली थी तब वेदवती रूप में महान तप कर रही थी तब से जो श्राप रावण को मिला वेदवती द्वारा वह उसका प्राश्चित सिर्फ सीता जी के हरण और श्री राम के हाथों मरण से ही मुक्ति का मार्ग एक मात्र था । इतना ज्ञानी और तीनों लोकों की बातों को जानने वाला रावण सब जानता था कि भीभीषण ने तपश्या रत होकर अपने लिए वरदान स्वरुप शिव से अखंड राज माँगा है कुंभकर्ण-रावण ने राम के हाथों मुक्ति । भीभीषण आज भी मुक्त नहीं हो पाए जबकि रावण ने अपने पूरे कुल को लाखों वर्ष पूर्व "श्री हरि" के लोक में पंहुचा दिया । हम अपने परिवार के एक सदस्य की मौत पर भयंकर दुःख से दीवाने हो जाते है दहाड़े मार-मार के रोते है जबकि रावण ने अपने समस्त परिवार के वीरो को भी मरवा दिता ताकि वे भी रावण की तरह मुक्त हो कर "श्री हरि" के धाम में स्थान पा जाएं !
हमारे महान पीएम साहब ने कल लखनऊ में रावण का पुतला न जलाकर यह शिद्द किया कि वे सच में ज्ञानी है और सही लोगों से अब मार्गदर्शित है ।
फिर आप ही बताओं क्या मैं रावण का पुतला जलाने का अधिकारी हूँ ।
मैंने रावण का पुतला नहीं जला कर ठीक किया ना !
आपकी आप जानो पर मैंने अपने जीवन काल में आज तक कभी रावण का पुतला न जलाया न ही इस काम में कभी सहयोगी बना आगे बुद्दि में बैठ का माँ शारदे क्या खेल- खेलती है यह नहीं जानता !
मेरा दावा है ! राम तो हम कभी बन नहीं सकते पर रावण भी बन जाय आज का मानव तो वह कभी अपने स्वरुप का पुतला नहीं जलायेगा !
मेरा मानना है कि हर वर्ष विजयदशमी के दिन जगह- जगह सामूहिक रूप से अपने अहंकार को जलाने की परंपरा डालनी चाहिए !
जिसमें हम सभी को एक, दूसरे-तीसरे को हाथ जोड़ कर अपने किये अब तक के अपराधों के लिए माफ़ी मांगना चाहिए । ताकि हम दूसरे ही दिन से फूल की तरह हलके होकर भगवान को चढ़ने लायक हो जाये । बर्ना भगावन जिस सुगन्ध की तलाश में भारत भूमि में आते है वह सुगन्ध उनको कभी नहीं मिलेगी !
भगवान तो फूलो की तरह ही अभिमान रहित मानव के माथे को चूमते है और सुगन्ध लेते है । उसी तरह जिस तरह सच्ची मेहनत करके घर आये बेटे के माथे को माँ चूम लेती है ।
बर्ना सोना- हीरे आदि लाख कीमती हो खुशबु नहीं देते खुशबु तो भगवान एक पैसे के फूल का ही लेते है । समझदार को इसारा काफी ।
किसी के मन में यह बात न जचे तो उससे भी क्षमा !
"नयाल सनातनी" गौ चरणों का दास
राम राज्य वादी चिंतक-विचारक
What is Karam? How it works?
मैंने रावण को नहीं जलाया शीर्षक से आगे की कहानी !
रावण पाप करके भी मुक्त हो गया !
राम उस ब्राह्मण को मार कर भी अपने शुध्द धर्म रक्षा के कर्म के कारण पाप से मुक्त हो गए !
बाल्मीकि रामायण लिख कर मुक्त हो गए !
बाबा तुलसीदास राम चरित लिख कर मुक्त हो गए ।
!
रावण के सारे पाप कर्मों को लिखा पर उसका पुतला नहीं जलाया !
पर आधुनिक मानव जरूर रावण के पाप को चटकारे लेकर बखान करता है । और उसे सबसे बड़ा पापी जान उसके पुतले को जलाता है । अपने आचरण को नहीं देखता इसलिए रावण के पाप कर्मों का फल भुगत रहा है । सावधान !
: अनजाने कर्म का फल
VERY INTRESTING
एक राजा ब्राह्मणों को लंगर में महल के आँगन में भोजन करा रहा था ।
राजा का रसोईया खुले आँगन में भोजन पका रहा था ।
उसी समय एक चील अपने पंजे में एक जिंदा साँप को लेकर राजा के महल के उपर से गुजरी ।
तब पँजों में दबे साँप ने अपनी आत्म-रक्षा में चील से बचने के लिए अपने फन से ज़हर निकाला ।
तब रसोईया जो लंगर ब्राह्मणो के लिए पका रहा था, उस लंगर में साँप के मुख से निकली जहर की कुछ बूँदें खाने में गिर गई ।
किसी को कुछ पता नहीं चला ।
फल-स्वरूप वह ब्राह्मण जो भोजन करने आये थे उन सब की जहरीला खाना खाते ही मौत हो गयी ।
अब जब राजा को सारे ब्राह्मणों की मृत्यु का पता चला तो ब्रह्म-हत्या होने से उसे बहुत दुख हुआ ।
ऐसे में अब ऊपर बैठे यमराज के लिए भी यह फैसला लेना मुश्किल हो गया कि इस पाप-कर्म का फल किसके खाते में जायेगा .... ???
(1) राजा .... जिसको पता ही नहीं था कि खाना जहरीला हो गया है ....
या
(2 ) रसोईया .... जिसको पता ही नहीं था कि खाना बनाते समय वह जहरीला हो गया है ....
या
(3) वह चील .... जो जहरीला साँप लिए राजा के उपर से गुजरी ....
या
(4) वह साँप .... जिसने अपनी आत्म-रक्षा में ज़हर निकाला ....
बहुत दिनों तक यह मामला यमराज की फाईल में अटका (Pending) रहा ....
फिर कुछ समय बाद कुछ ब्राह्मण राजा से मिलने उस राज्य मे आए और उन्होंने किसी महिला से महल का रास्ता पूछा ।
उस महिला ने महल का रास्ता तो बता दिया पर रास्ता बताने के साथ-साथ ब्राह्मणों से ये भी कह दिया कि "देखो भाई ....जरा ध्यान रखना .... वह राजा आप जैसे ब्राह्मणों को खाने में जहर देकर मार देता है ।"
बस जैसे ही उस महिला ने ये शब्द कहे, उसी समय यमराज ने फैसला (decision) ले लिया कि उन मृत ब्राह्मणों की मृत्यु के पाप का फल इस महिला के खाते में जाएगा और इसे उस पाप का फल भुगतना होगा ।
यमराज के दूतों ने पूछा - प्रभु ऐसा क्यों ??
जब कि उन मृत ब्राह्मणों की हत्या में उस महिला की कोई भूमिका (role) भी नहीं थी ।
तब यमराज ने कहा - कि भाई देखो, जब कोई व्यक्ति पाप करता हैं तब उसे बड़ा आनन्द मिलता हैं । पर उन मृत ब्राह्मणों की हत्या से ना तो राजा को आनंद मिला .... ना ही उस रसोइया को आनंद मिला .... ना ही उस साँप को आनंद मिला .... और ना ही उस चील को आनंद मिला ।
पर उस पाप-कर्म की घटना का बुराई करने के भाव से बखान कर उस महिला को जरूर आनन्द मिला । इसलिये राजा के उस अनजाने पाप-कर्म का फल अब इस महिला के खाते में जायेगा ।
बस इसी घटना के तहत आज तक जब भी कोई व्यक्ति जब किसी दूसरे के पाप-कर्म का बखान बुरे भाव से (बुराई) करता हैं तब उस व्यक्ति के पापों का हिस्सा उस बुराई करने वाले के खाते में भी डाल दिया जाता हैं ।
अक्सर हम जीवन में सोचते हैं कि हमने जीवन में ऐसा कोई पाप नहीं किया, फिर भी हमारे जीवन में इतना कष्ट क्यों आया .... ??
ये कष्ट और कहीं से नहीं, बल्कि लोगों की बुराई करने के कारण उनके पाप-कर्मो से आया होता हैं जो बुराई करते ही हमारे खाते में ट्रांसफर हो जाता हैं ....
: A very deep philosophy of Karma example
संतो की वाणी समझे कोई कम बुद्दिमान !
नयाल सनातनी
संत के विचार !
कभी मेरा अहंकार मुझे दुसरो की सच्ची बात भी मानने से रोकता था और हर किसी को गलत साबित करने में ही मैं अपनी विद्द्वत्ता समझता था । मुझसे बड़ा ज्ञानी कोई नहीं यह अहंकार मेरे अंदर घर बना कर रहता था । पर प्रभु कृपा से एक दिन ऐसा आया मैं इस महां दोष से मुक्त हुआ । आज में सबकी बात सुनता हूँ, सोचता हूँ फिर अपने अहंकार रुपी रावण को दूर रख कर राम रुपी आदर्श सोच से विचार कर आखिर मे सबका मंगल चाहता हूँ । सायद यही मेरे पूर्व के पाप कर्म रुपी दोषों को पूण्य में बदलने का मार्ग हो ।
नयाल सनातनी
बलिदानी संतों एवं स्वामी करपात्री महाराज के नेतृक्त में हुए 1966 के गौ-रक्षा आंदोलन के वे 8 दिन !
1 नवम्बर से 8 नवम्बर 1916 तक फिर उसी तरह दुहराये जायेंगे दिल्ली जन्तर- मंतर पर तब 7 नवम्बर 1966 को गोपाष्ठामि थी अब 50 वर्ष बाद इस बार 8 नवम्बर 2016 को गोपाष्ठामि है ।
8 नवम्बर 1966 को तत्कालीन सरकार ने स्वामी करपात्री जी महाराज को जेल में डाल कर लोहे के राडो से पिटवाया,उनका सर फोड़ दिया था जिससे उनकी आँखों की रौशनी जाती रही । बाद में उस महान तपस्वी स्वामी करपात्री महाराज ने काशी में तप-योग और ''सूर्य चाक्षुषी विध्या'' के बल पर फिर से अपने आँखों की रौशनी पाई और अनेक ग्रंथो की रचना की ।
इसलिए स्वामी करपात्री जी और उनके साथी हजारों संतों के उन ऐतिहासिक 8 महान ''गौ-क्रांति'' के दिनों को उसी तरह तप करके, सुरभि महा मन्त्र और गोपाल मन्त्र का जप करके हम सभी गौ-प्रेमी दिल्ली जन्तर-मन्तर पर ही मनाएंगे ।

आप सभी गौप्रेमी 1966 के बलिदानी संतों-स्वामी करपात्री जी और 10 लाख उन गौ-भक्तो के संतान इस महायज्ञं में जरूर अपनी-अपनी जुम्मेवारी समझकर अपनी उपस्थिति दर्ज करें ।
!! जो सहीद हुए गौ संस्कृति के लिए, उनकी याद करें क़ुरबानी !!
निवेदक --- "सर्वदलीय गौरक्षा मंच" एवं सहयोगी समस्त गौ-भक्त समाज ।
ध्यान रहे ! मैं नहीं हम सब सनातन गौ - संस्कृति के अनुयाई
एक संत की वाणी !
प्राचीन समय में जंगल में अपने परिवार और शिष्यों के साथ रहते हुए विष्णु का काम कर रहे एक संत के पास भूखा-प्यासा-हलकान एक राजा पंहुचा जो शिकार खेलने जंगल आया राजा रास्ता भटक गया । घोड़े की दुर्घटना में मौत के बाद वह चलते -चलते थक कर चूर था आते ही संत से बोला मेरी रक्षा करों और बेहोश होगया । संत और शिष्यों ने उसके कपडे और उसके पास लटकी तलवार देख कर समझ लिया की या तो यह राजा है या राजा कोई बड़ा सैनिक अधिकारी उन्होंने उसकी खूब सेवा की कपडे जो कही -कही से फट चुके थे सी दिए । शरीर के घावों में जड़ी-बूटी की दवा लगाई और जगाने के बाद जो भोजन उपलब्ध था वह खिलाया। राजा तृप्त होगया । जाते वक्त राजा बोला मेरे पास इस वक्त दो ही वस्तु है जिसमे से एक आप को भेंट करना चाहता हूँ महात्मा । एक मेरे पास यह सोने की मुठ और हीरे जड़ित सावा करोड़ की तलवार है एक सावा आने की सुई जो मेरी पत्नी ने दी है जिसका मैं खुद कोई मूल्य नहीं मानता ।आप जो चाहे ले सकते है ।
संत ने कहाँ तलवार की हमें आवश्यकता नहीं हम जंगल में रहते है यहाँ जिव-जंतुओं के साथ । वे भी निहत्थे और हम भी निहत्थे रहेंगे तो ही सुरक्षित रहंगे यही जंगल का कानून है जो परमात्मा ने बनाया है । जंगल का नियम है जब तक हम उनको दुःख नहीं देंगे वे हमें दुखी नहीं करते हमारी नित्य संख और घंटे की ध्वनि से ही हिंसक जीव हमारे अहाते से दूर रहते है ।
हां आप सुई दे सकते हैं हमारे पास एक ही सुई है जो अनेक विद्यार्थियों के कपडे सिलने के लिए पर्याप्त नहीं हो पाती । अब दो सुई होगी तो हम अधीक कपडे सीलकर शर्दी में इन बच्चों को ठण्ड से बचा पाएंगे । वैसे भी संतो के पास श्रजन की वस्तु का रहना ही उचित है । तलवार कभी न कभी विनाश ही कराती है ।
राजा ने कहाँ आपको ठण्ड कैसा !
जंगल में इतनी सारी लकड़ियाँ पड़ी है उनको रात-दिन खूब जलाओ मैं राजा हूँ अपने हकीम को हुक्म दूंगा की आप पूरा जंगल भी जला दें तो आपको कुछ न कहाँ जाय ।
संत बोले हमारी आवश्यकता सिर्फ भोजन बनाने के लिए जलावन की है वह हम अपने गायो के गोबर के कंडे से पूर्ति करते है क्योंकि भगवान के भोग हम गाय की कृपा से ही करा पाते है । हम जंगल में रहते जरूर है कभी जंगल की लकड़ी को नहीं जलाते अधिक ठण्ड होने पर गौशाला में गायों के बीच ही सोते और विद्यर्थियों को पढ़ाते है । जो एक साधरण गृहस्थ एक महीने में अपने परिवार के लिए लकड़ी जलाता है । उतना हम एक साल में भी नहीं जलाते । साधु होने की जुम्मेवारी के कारण भी हम संसार को विनाश नहीं श्रजन सिखाने के लिए नारायण की आज्ञा से बाध्य है । हम ही संसार को और अपने विद्यार्थियों को विनाश सीखा देंगे तो ये कभी श्रजन नहीं करंगे और विष्णु का काम श्रजन करना है साधु भी विष्णु का स्वरुप है ।
ॐ नमो नारायण ।
तब राजा ने कहाँ संत जी मैं अपने राज्य में जाकर आपके परिवार और आपके शिष्यों के लिए खूब सारा अन्न भेजता हूँ ताकि आप आराम से बिना मेहनत के भोजन करें और अधिक शिष्यों को पढ़ाएं ।
सद्गृहस्थ संत ने कहाँ जब तक मैं मेरे साथी ऋषि इन विद्यार्थियों को शिक्षित करते रहते है उतने समय में मेरी पत्नी और मेरे साथी ऋषियों की पत्नियां इस जंगल में ही गौ माता की कृपा से इतना अन्न उपजा लेती है कि हमें साल भर अपनी आवश्यकताओं के लिए किसी के दर पर नहीं जाना पड़ता ।
संत समाज को देने आया है इस जगत में लेने नहीं ।
हम अपने परमात्मा को भिक्षा में मिला अन्न का भोग कभी नहीं लगा सकते यही शिक्षा हमारे पूज्य गुरुदेव ने दी थी ।
राजा ने कहाँ आप संत है आपको काम करने की क्या आवश्यकता है आपको देने वाले तो हजारों तैयार हो जायेंगे आप और अधिक वेदपाठी तैयार कीजिये ताकि मेरे राज्य का कल्याण हो ।
संत ने कहाँ सबसे पहले तो जंगल में रहने वाले सद्गृहस्थ संत हो या गृहस्थ में रहने वाले मेहनत कर परिवार पालने वाले असली संत बिना मेहनत की रोटी खाने वाला, बिना अपनी मेहनत के कमाये अन्न का भोग जो परमात्मा को देता है उसका भोग चाहे 656 प्रकार के ही क्यों न हो ! नारायण स्वीकार नहीं करते ।
इसलिए राजा जी आपके राज्य में भी कभी अन्न की आवश्यकता हो तो हम अधिक मेहनत करके आपकी मेहनत न करने वाली गरीब जनता के लिए अन्न जरूर भेजेंगे । पर आप कोशिश करना की आपकी सारी जनता मेहनत कर भोजन करें ।
निठल्लों के पुण्य ततकाल नष्ट हो जाते है चाहे वह साधु-संत या देवता ही क्यों न हो ।
और आप भी सुई से अधिक काम लीजिये आपकी पत्नी ने आपको सुई इसलिए भेट की थी उनको मालूम था एक दिन यह सुई आपको संसार का सबसे कीमती ज्ञान प्राप्त करा देगी । उस ज्ञान का नाम है ।
हक़ हलाल की कमाई ।
नयाल सनातनी
अभी नहीं तो कभी नहीं !
एक दिन ऐसा आएगा जब लालची हिन्दू अपनी संपूर्ण गौवंश को बेच कर ख़त्म कर देंगे तब लालची सरकारें धन के मद में अंधी-बहरी होकर आपके गौशाला के गायों को मांस के लिए बेच देंगी । तब से पहले जागों 7 नवम्बर को गौवंश रक्षा के महाआंदोलन में अपनी जुम्मेवारी समझ भाग लीजिये ।
चलो जन्तर-मंतर दिल्ली 7 नवम्बर संपूर्ण गौरक्षा मिशन पर ।
निवेदक :-- सर्वदलीय गौरक्षा मंच
समस्त देश वासियों से एक पवित्र अपील ।
गाय को भारत के प्राण मानने वाला एवं स्वामी करपात्री जी महाराज का कट्टर अनुयायी होने के नाते !
मैं देश की समस्त मत- संप्रदायों की जनता-जनार्दन से एक अपील करता हूँ की इसबार 1 से 8 नवम्बर तक भारत ही नहीं विश्व जननी "गाय माता" के लिए 1966 में शहीद हो गए हजारों संतो की 50 वी वर्षगाठ पर जरूर जन्तर-मंतर दिल्ली पहुचे ।
सामूहिक रूप से अपनी सरकार और विपक्ष के सभी सांसदों से भारत की एकता-अखंडता और भाई चारे के लिए देश में संपूर्ण गौरक्षा का कड़क क़ानून मांगे ।
मैं समस्त भारतीय मुस्लिम और इसाई संप्रदाय के अनुयायियों से भी आग्रह करता हूँ आप अगर मुहमद साहब एवं इसामशीह जी के सच्चे अनुयायी हो तो उनकी कुरान और बाइबिल में कही बात गाय का दूध, दही, घी मानव के लिए अत्यंत लाभकारी और गौ मांस शरीर के लिए हानिकारक और धर्म को नष्ट करने वाला है उसे भी माने । मुस्लिम भाइयों क्या आप बाबर, हुमायु,अकबर से भी बड़े इस्लाम धर्म के रक्षक है । या उनसे अधिक मानवतावादी है जिन्होंने भारत में लंबे समय तक राज ही नहीं किया भारत की जनता के ह्रदयों पर भी राज किया । इसका कारण एकमात्र यह था कि वे अल्ला के आलावा अन्य धर्म के लोगो की भावनाओं को भी इबादत समझते थे । देश के राष्ट्रपति डॉ अब्दुल कलाम को भारत का जनमानस धर्म-जाती से ऊपर उठकर देवता की तरह सम्मान देता है । क्योंकि वे सभी धर्मों के लोगो के पूजनीय प्रतीकों को आदर करते थे । गाय और बैल आदि को चुनाव चिन्ह की तरह इस्तेमाल कर भारत पर एक क्षत्र राज करने वाली कोंग्रेस के शासन काल में अहंकार बस एक समय संतों और गौरक्षको पर बड़े जुल्म हुए परिणाम स्वरुप उनके शासन करने वाले शासको एवं पार्टी का लगभग सूर्य अस्त हुआ सा प्रतीत होता है । जिसकी शायद ही कोई कल्पना कर सकता था !
वही जिस पार्टी के मुखिया अटल बिहारी बाजपेई जी ने 1966 में गौरक्षा के आंदोलन में संतों का साथ दिया लाठिया खाई गोली लगते- लगते बचे !
जिस पार्टिय का आजादी के बाद आज तक नारा रहा गौ हत्या बंद करो उस पार्टी को पहली बार देश के सभी गौभक्तों ने बहुमत से जिताया तो अहंकार बस वह पार्टी के मुखिया भी वही गलती दुहराते से दिखे !
पर उस पार्टी के मार्गदर्शक एक सत्य की राह पर देश हित में सब सुख कुर्बान कर देने वाला संगठन भी है जिसे संघ कहते है वे सजग पहरी की तरह उस पार्टी को कभी कोंग्रेश की तरह अहंकार के गटर में नही उतरने देगी यह विश्वास भी देश की जनता को हो गया । जब संघ प्रमुख ने कहाँ गौरक्षक और गौ सेवक भले मानव होते है । उनका उद्देश्य देश को बर्बाद करना नहीं बल्किन देश को आवाद करना है ।
वर्तमान में एवम पूर्व में सर्ववोच्च पदों पर बैठे देश के हुक्मरानों अभी अधिक देर नहीं हुई है हम देश की सत्ता पक्ष और विपक्ष के सभी सांसदों से कर वद्द निवेदन करते है कि गाय भारत माता की आत्मा और भारतीयों की जीवन में बसी साँस की तरह सुख देने वाली है ममता मई माँ के सामान हितकारी है । या यों कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी भारत माता ही गाय माता है । गाय की हत्या भारत की हत्या के सामान जघन्य अपराध है ।वह अपने हत्यारे को भी हत्या से पूर्व दूध देकर गर्दन देने वाली परोपकारी प्राणी है ।
जब कोई बहुत ही अच्छा और सीधा व्यक्ति होता है तो मुस्लिम भाई कहते है यह तो अल्ला मिया की गाय है यानि जो सिर्फ देती ही देती है उसको काट कर खाना कहाँ का न्याय है ? सनातन धर्म में गाय को संत की उपाधि से नवाज गया है । संत जो समाज को देता है लेता नहीं ।
गौ चरणों का दास मैं "नयाल सनातनी" आप सभी देश वासियों से फिर एक बार मन में बैठे परमात्मा की ओर से अपील करता हूँ गाय और उसके वंश को नष्ट होने से बचाने सरकार को और विपक्ष को मनाने सभी देश के गौ- गोपाल प्रेमी 7 नवम्बर को सिर्फ एक दिन जंतर - मंतर आकर अपना निवेदन भारत की संसद जो भारतीय संविधान का रक्षक है उसके सामने रखें ।
क्या आज संचार के युग में भी हम एक दिन 20 लाख लोग अपनी माँ को भी जीवन दान देने वाली माँ से भी बढ़कर निस्वार्थ सेवा करने वाली गाय और उसके वंश की रक्षा के लिए सरकार से निवेदन करने दिल्ली नहीं पहुच सकते !
1966 में हमारे संतों से कैसे किया हूँगा प्रचार ? सोचो कैसे उस वक्त 20 लाख लोग दिल्ली आये होंगे ?
कितनी श्रद्धा होगी उनके मनो में अपनी गाय माता के लिए ? आज क्या होगया देश की जनता को कही हम स्वार्थी तो नहीं हो गए ! अगर हां तो यह बात याद रखिए स्वार्थी सिर्फ अपना नुकसान करता है लोगो का नहीं !
मैं अपने साथियों के साथ पूरे 8 दिन जंतर-मंतर पर लाखों मच्छरों के बीच डेंगू और चिकन गुनिया के भय के विपरीत जो मुझे हो चूका है पिछले साल 21 दिन जन्तर- मन्तर पर सत्याग्रह के बाद फिर वहां देश की कानून बनाने वाली संसद में बैठने वाले सभी पक्ष- विपक्ष के माननीय सांसदों से "सत्य का आग्रह" सत्याग्रह" करने एक झोपड़ी बना कर जन्तर-मंतर पर फिर आंदोलन करूँगा ।
आप में अगर गाय और उसके वंश के त्याग तपस्या के प्रति थोड़ी भी श्रद्धा है ! तो मेरा साथ देने आ पहुँचिये । मैं 1 तारीख नवम्बर से आपको 8 तरीख नवम्बर तक वही बैठा टकटकी लगाए आपके इंतजार में मिलूंगा ।
मेरा जन्म भले देव भूमि उत्तराखंड में हुआ हो पर मैंने अपनी कर्म भूमि हैदराबाद को बनाया है । अपने परिवार को उनके हाल पर इतने दूर छोड़ कर मैं दिल्ली में भूख़े- प्यासे अपनी या अपने परिवार की लड़ाई लड़ने नहीं आप सबके कल्याण की लड़ाई लड़ने जा रहा हूँ । मुझे आपका साथ चाहिए । क्योकि गौवंश के कटने से संसार पर बड़ी भारी विपदाएं आती है जिनको आप महामारी, भूकंप-सुनामी आदि नामो से जानते है । कुछ साल पहले केदार नाथ-बद्रीनाथ की घटना आपको याद हो तो समझ जाइये वह पहाड़ी गौवंश के नाश का ही बीज था ।
आपको याद होगा उज्जैन,ओंकारेश्वर, इंदौर आदि का वह प्रलय जिससे संत जन भी त्राहिमाम- त्राहिमाम करने लगा था । जब महाराष्ट्र हाय कोट ने हजारों बैल और गौहत्या पर बैन लगा दिया था तो चेन्नई में कुछ दुष्टो ने हाय कोट के सामने कुछ नंदी बैलो को खुलेआम क़त्ल कर विरोध किया । तब दुनिया ने देखा की चैन्नई के लोगो को अपनी जान बचाने आर्मी की मदद लेनी पड़ी और उनका सब कुछ तबाह हो गया । नेपाल में पहाड़ी गौवंश के अनादर के कारण ही पिछले साल क्या हुआ दुनिया को मालूम है । ये तो कुदरत के कानून को न मानने और कुदरत और पृकृति की सबसे हमदम गाय के कत्लेआम से होने वाले दुष्परिणाम की एक बानगी भर था । आगे जो होने वाला है उसकी कल्पना से ही विद्द्वानो की रूह कांप रही है ।
"नयाल सनातनी"स्वामी करपात्री जी महाराज का कट्टर अनुयायी रामराज्य वादी चिंतक विचारक ।