एक संत की वाणी !
प्राचीन समय में जंगल में अपने परिवार और शिष्यों के साथ रहते हुए विष्णु का काम कर रहे एक संत के पास भूखा-प्यासा-हलकान एक राजा पंहुचा जो शिकार खेलने जंगल आया राजा रास्ता भटक गया । घोड़े की दुर्घटना में मौत के बाद वह चलते -चलते थक कर चूर था आते ही संत से बोला मेरी रक्षा करों और बेहोश होगया । संत और शिष्यों ने उसके कपडे और उसके पास लटकी तलवार देख कर समझ लिया की या तो यह राजा है या राजा कोई बड़ा सैनिक अधिकारी उन्होंने उसकी खूब सेवा की कपडे जो कही -कही से फट चुके थे सी दिए । शरीर के घावों में जड़ी-बूटी की दवा लगाई और जगाने के बाद जो भोजन उपलब्ध था वह खिलाया। राजा तृप्त होगया । जाते वक्त राजा बोला मेरे पास इस वक्त दो ही वस्तु है जिसमे से एक आप को भेंट करना चाहता हूँ महात्मा । एक मेरे पास यह सोने की मुठ और हीरे जड़ित सावा करोड़ की तलवार है एक सावा आने की सुई जो मेरी पत्नी ने दी है जिसका मैं खुद कोई मूल्य नहीं मानता ।आप जो चाहे ले सकते है ।
संत ने कहाँ तलवार की हमें आवश्यकता नहीं हम जंगल में रहते है यहाँ जिव-जंतुओं के साथ । वे भी निहत्थे और हम भी निहत्थे रहेंगे तो ही सुरक्षित रहंगे यही जंगल का कानून है जो परमात्मा ने बनाया है । जंगल का नियम है जब तक हम उनको दुःख नहीं देंगे वे हमें दुखी नहीं करते हमारी नित्य संख और घंटे की ध्वनि से ही हिंसक जीव हमारे अहाते से दूर रहते है ।
हां आप सुई दे सकते हैं हमारे पास एक ही सुई है जो अनेक विद्यार्थियों के कपडे सिलने के लिए पर्याप्त नहीं हो पाती । अब दो सुई होगी तो हम अधीक कपडे सीलकर शर्दी में इन बच्चों को ठण्ड से बचा पाएंगे । वैसे भी संतो के पास श्रजन की वस्तु का रहना ही उचित है । तलवार कभी न कभी विनाश ही कराती है ।
राजा ने कहाँ आपको ठण्ड कैसा !
जंगल में इतनी सारी लकड़ियाँ पड़ी है उनको रात-दिन खूब जलाओ मैं राजा हूँ अपने हकीम को हुक्म दूंगा की आप पूरा जंगल भी जला दें तो आपको कुछ न कहाँ जाय ।
संत बोले हमारी आवश्यकता सिर्फ भोजन बनाने के लिए जलावन की है वह हम अपने गायो के गोबर के कंडे से पूर्ति करते है क्योंकि भगवान के भोग हम गाय की कृपा से ही करा पाते है । हम जंगल में रहते जरूर है कभी जंगल की लकड़ी को नहीं जलाते अधिक ठण्ड होने पर गौशाला में गायों के बीच ही सोते और विद्यर्थियों को पढ़ाते है । जो एक साधरण गृहस्थ एक महीने में अपने परिवार के लिए लकड़ी जलाता है । उतना हम एक साल में भी नहीं जलाते । साधु होने की जुम्मेवारी के कारण भी हम संसार को विनाश नहीं श्रजन सिखाने के लिए नारायण की आज्ञा से बाध्य है । हम ही संसार को और अपने विद्यार्थियों को विनाश सीखा देंगे तो ये कभी श्रजन नहीं करंगे और विष्णु का काम श्रजन करना है साधु भी विष्णु का स्वरुप है ।
ॐ नमो नारायण ।
तब राजा ने कहाँ संत जी मैं अपने राज्य में जाकर आपके परिवार और आपके शिष्यों के लिए खूब सारा अन्न भेजता हूँ ताकि आप आराम से बिना मेहनत के भोजन करें और अधिक शिष्यों को पढ़ाएं ।
सद्गृहस्थ संत ने कहाँ जब तक मैं मेरे साथी ऋषि इन विद्यार्थियों को शिक्षित करते रहते है उतने समय में मेरी पत्नी और मेरे साथी ऋषियों की पत्नियां इस जंगल में ही गौ माता की कृपा से इतना अन्न उपजा लेती है कि हमें साल भर अपनी आवश्यकताओं के लिए किसी के दर पर नहीं जाना पड़ता ।
संत समाज को देने आया है इस जगत में लेने नहीं ।
हम अपने परमात्मा को भिक्षा में मिला अन्न का भोग कभी नहीं लगा सकते यही शिक्षा हमारे पूज्य गुरुदेव ने दी थी ।
राजा ने कहाँ आप संत है आपको काम करने की क्या आवश्यकता है आपको देने वाले तो हजारों तैयार हो जायेंगे आप और अधिक वेदपाठी तैयार कीजिये ताकि मेरे राज्य का कल्याण हो ।
संत ने कहाँ सबसे पहले तो जंगल में रहने वाले सद्गृहस्थ संत हो या गृहस्थ में रहने वाले मेहनत कर परिवार पालने वाले असली संत बिना मेहनत की रोटी खाने वाला, बिना अपनी मेहनत के कमाये अन्न का भोग जो परमात्मा को देता है उसका भोग चाहे 656 प्रकार के ही क्यों न हो ! नारायण स्वीकार नहीं करते ।
इसलिए राजा जी आपके राज्य में भी कभी अन्न की आवश्यकता हो तो हम अधिक मेहनत करके आपकी मेहनत न करने वाली गरीब जनता के लिए अन्न जरूर भेजेंगे । पर आप कोशिश करना की आपकी सारी जनता मेहनत कर भोजन करें ।
निठल्लों के पुण्य ततकाल नष्ट हो जाते है चाहे वह साधु-संत या देवता ही क्यों न हो ।
और आप भी सुई से अधिक काम लीजिये आपकी पत्नी ने आपको सुई इसलिए भेट की थी उनको मालूम था एक दिन यह सुई आपको संसार का सबसे कीमती ज्ञान प्राप्त करा देगी । उस ज्ञान का नाम है ।
हक़ हलाल की कमाई ।
नयाल सनातनी
प्राचीन समय में जंगल में अपने परिवार और शिष्यों के साथ रहते हुए विष्णु का काम कर रहे एक संत के पास भूखा-प्यासा-हलकान एक राजा पंहुचा जो शिकार खेलने जंगल आया राजा रास्ता भटक गया । घोड़े की दुर्घटना में मौत के बाद वह चलते -चलते थक कर चूर था आते ही संत से बोला मेरी रक्षा करों और बेहोश होगया । संत और शिष्यों ने उसके कपडे और उसके पास लटकी तलवार देख कर समझ लिया की या तो यह राजा है या राजा कोई बड़ा सैनिक अधिकारी उन्होंने उसकी खूब सेवा की कपडे जो कही -कही से फट चुके थे सी दिए । शरीर के घावों में जड़ी-बूटी की दवा लगाई और जगाने के बाद जो भोजन उपलब्ध था वह खिलाया। राजा तृप्त होगया । जाते वक्त राजा बोला मेरे पास इस वक्त दो ही वस्तु है जिसमे से एक आप को भेंट करना चाहता हूँ महात्मा । एक मेरे पास यह सोने की मुठ और हीरे जड़ित सावा करोड़ की तलवार है एक सावा आने की सुई जो मेरी पत्नी ने दी है जिसका मैं खुद कोई मूल्य नहीं मानता ।आप जो चाहे ले सकते है ।
संत ने कहाँ तलवार की हमें आवश्यकता नहीं हम जंगल में रहते है यहाँ जिव-जंतुओं के साथ । वे भी निहत्थे और हम भी निहत्थे रहेंगे तो ही सुरक्षित रहंगे यही जंगल का कानून है जो परमात्मा ने बनाया है । जंगल का नियम है जब तक हम उनको दुःख नहीं देंगे वे हमें दुखी नहीं करते हमारी नित्य संख और घंटे की ध्वनि से ही हिंसक जीव हमारे अहाते से दूर रहते है ।
हां आप सुई दे सकते हैं हमारे पास एक ही सुई है जो अनेक विद्यार्थियों के कपडे सिलने के लिए पर्याप्त नहीं हो पाती । अब दो सुई होगी तो हम अधीक कपडे सीलकर शर्दी में इन बच्चों को ठण्ड से बचा पाएंगे । वैसे भी संतो के पास श्रजन की वस्तु का रहना ही उचित है । तलवार कभी न कभी विनाश ही कराती है ।
राजा ने कहाँ आपको ठण्ड कैसा !
जंगल में इतनी सारी लकड़ियाँ पड़ी है उनको रात-दिन खूब जलाओ मैं राजा हूँ अपने हकीम को हुक्म दूंगा की आप पूरा जंगल भी जला दें तो आपको कुछ न कहाँ जाय ।
संत बोले हमारी आवश्यकता सिर्फ भोजन बनाने के लिए जलावन की है वह हम अपने गायो के गोबर के कंडे से पूर्ति करते है क्योंकि भगवान के भोग हम गाय की कृपा से ही करा पाते है । हम जंगल में रहते जरूर है कभी जंगल की लकड़ी को नहीं जलाते अधिक ठण्ड होने पर गौशाला में गायों के बीच ही सोते और विद्यर्थियों को पढ़ाते है । जो एक साधरण गृहस्थ एक महीने में अपने परिवार के लिए लकड़ी जलाता है । उतना हम एक साल में भी नहीं जलाते । साधु होने की जुम्मेवारी के कारण भी हम संसार को विनाश नहीं श्रजन सिखाने के लिए नारायण की आज्ञा से बाध्य है । हम ही संसार को और अपने विद्यार्थियों को विनाश सीखा देंगे तो ये कभी श्रजन नहीं करंगे और विष्णु का काम श्रजन करना है साधु भी विष्णु का स्वरुप है ।
ॐ नमो नारायण ।
तब राजा ने कहाँ संत जी मैं अपने राज्य में जाकर आपके परिवार और आपके शिष्यों के लिए खूब सारा अन्न भेजता हूँ ताकि आप आराम से बिना मेहनत के भोजन करें और अधिक शिष्यों को पढ़ाएं ।
सद्गृहस्थ संत ने कहाँ जब तक मैं मेरे साथी ऋषि इन विद्यार्थियों को शिक्षित करते रहते है उतने समय में मेरी पत्नी और मेरे साथी ऋषियों की पत्नियां इस जंगल में ही गौ माता की कृपा से इतना अन्न उपजा लेती है कि हमें साल भर अपनी आवश्यकताओं के लिए किसी के दर पर नहीं जाना पड़ता ।
संत समाज को देने आया है इस जगत में लेने नहीं ।
हम अपने परमात्मा को भिक्षा में मिला अन्न का भोग कभी नहीं लगा सकते यही शिक्षा हमारे पूज्य गुरुदेव ने दी थी ।
राजा ने कहाँ आप संत है आपको काम करने की क्या आवश्यकता है आपको देने वाले तो हजारों तैयार हो जायेंगे आप और अधिक वेदपाठी तैयार कीजिये ताकि मेरे राज्य का कल्याण हो ।
संत ने कहाँ सबसे पहले तो जंगल में रहने वाले सद्गृहस्थ संत हो या गृहस्थ में रहने वाले मेहनत कर परिवार पालने वाले असली संत बिना मेहनत की रोटी खाने वाला, बिना अपनी मेहनत के कमाये अन्न का भोग जो परमात्मा को देता है उसका भोग चाहे 656 प्रकार के ही क्यों न हो ! नारायण स्वीकार नहीं करते ।
इसलिए राजा जी आपके राज्य में भी कभी अन्न की आवश्यकता हो तो हम अधिक मेहनत करके आपकी मेहनत न करने वाली गरीब जनता के लिए अन्न जरूर भेजेंगे । पर आप कोशिश करना की आपकी सारी जनता मेहनत कर भोजन करें ।
निठल्लों के पुण्य ततकाल नष्ट हो जाते है चाहे वह साधु-संत या देवता ही क्यों न हो ।
और आप भी सुई से अधिक काम लीजिये आपकी पत्नी ने आपको सुई इसलिए भेट की थी उनको मालूम था एक दिन यह सुई आपको संसार का सबसे कीमती ज्ञान प्राप्त करा देगी । उस ज्ञान का नाम है ।
हक़ हलाल की कमाई ।
नयाल सनातनी
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