भगवान श्रीकृष्ण ने कहा :-
यया धर्ममधर्मम् च कार्यं चाकार्यमेव च। अयथावत् प्रजानाति, बुद्धिः सा पार्थ राजसी।
अधर्मम् धर्ममिति या मन्यते तमसावृता। सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी।
हे अर्जुन !!
जो धर्म और अधर्म, कार्य और अकार्य को सही रूप से नहीं जानती, वह बुद्धि राजसी अर्थात् भौतिकवादी अर्थात् मोहग्रस्त है।
जो अधर्म को ही धर्म, और धर्म को ही अधर्म अर्थात् सबकुछ उल्टा ही समझती है, वह बुद्धि तामसी अर्थात् पतनकारिणी अर्थात् निम्नतम है।
आजकल ऐसी बुद्धि वर्तमान राजकारिणी यो में पायी जाती है।
नयाल सनातनी
यया धर्ममधर्मम् च कार्यं चाकार्यमेव च। अयथावत् प्रजानाति, बुद्धिः सा पार्थ राजसी।
अधर्मम् धर्ममिति या मन्यते तमसावृता। सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी।
हे अर्जुन !!
जो धर्म और अधर्म, कार्य और अकार्य को सही रूप से नहीं जानती, वह बुद्धि राजसी अर्थात् भौतिकवादी अर्थात् मोहग्रस्त है।
जो अधर्म को ही धर्म, और धर्म को ही अधर्म अर्थात् सबकुछ उल्टा ही समझती है, वह बुद्धि तामसी अर्थात् पतनकारिणी अर्थात् निम्नतम है।
आजकल ऐसी बुद्धि वर्तमान राजकारिणी यो में पायी जाती है।
नयाल सनातनी
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