Friday, October 21, 2016

सृष्टि चक्र में कीट से लेकर हाथी तक सब सहायक ।
उत्तराखंड के प्रत्येक गाँव में पहले नंदी अलमस्त घुमते दिख जाते थे ! इन नन्दियों को शिव गण कहाँ जाता था ।लोग इनको पूजते इनको गौ ग्रास देते और कभी कभार खेत -खलिहान से ये थोड़ा बहुत खेती या अनाज खा लेते भी तो उनको हाँक कर भगा देते ! डंडा उठाकर कभी नहीं मारते थे । यह सब आँखों देखि बता रहा हूँ ।
पर ---
समय का चक्र बदला,लोगो की भावना भी बदली, आधुनिकता ने गाँवों को भी अपने आगोश में ले लिए ।पहले लोग अपने पितरों के नाम पर उनकी मुक्ति हेतु नंदी छोड़ देते थे ! अब नहीं के बराबर यह परमपरा रह गई । कुछ तो लोग आधुनिक हो गए कुछ स्वार्थी । स्वार्थी इसलिए की अगर कोई नन्दी छोड़ता है तो दूसरे लोग थोड़ा उनके खेतो में नंदी के चले जाने पर स्वर्ग गए नंदी छोड़ने वाले के पितरो को नरक में भेजने वाली गलियों की बौछार कर देते है । नंदी को डंडों से लहूलुहां कर देते है अलग । परिणाम जो नंदी के भय से रात में उसकी शेर की तरह चमकती आँखों से और शेर जैसी हुंकार से जंगली शुवर, आदमखोर बाघ , लकड़बग्गा दिन में बन्दर आदि जंगली जानवर गाँव की सरहद से दूर रहते थे आज प्रत्येक ग्रामीण के घर के आंगन में तांडव कर रहे है ।
जंगली शुवर तो दिन में बोये बीजो को रात होते होते सफाचट कर दे रहे है । बन्दर घर में घुस कर गुड़ की भेली ले भाग रहे है । आँगन में भोजन करना दुर्भर हो गया है आदमी के एक निवाला खाने से पहले बन्दर झपटा मार सब ले भाग रहे है । बाघ और लक्डबघों की डर से पहाड़ी लोग 7 बजे बाद घर से बहार निकलने में डरते है । नंदी शिव का वाहन है इसलिए जहाँ नंदी हो वहां से भूत-प्रेत बाधा दूर भाग जाते थे क्योंकि जहाँ भूत नाथ शिव का मुख्य गण हो वहां छोटे-मोटे भूत-प्रेतों की क्या औकात है !
पर ग्रामीणों ने नंदी के साथ-साथ गायों को भी गाँव से बहार का रास्ता दिखा कर अपने लिए ही बड़ा भारी गड्ढा खोद लिया । गाय लक्ष्मी का प्रत्यक्ष रूप है पर जब आप लक्ष्मी को गावँ की सरहद में घुसने नहीं देंगे तो कल्याण कैसे होगा !
जिस गाय के गौमूत्र में पितरों को मुक्ति देने वाली "गंगा माँ" निवास कर छुवा-छूत, भूत-प्रेत, अला-बला आदि अनेक ग्रामीण बिमारियों का इलाज सहज ही करती थी । उसी परोपकारी गाय को लोगो ने घर से ही नहीं गावँ की परिधि से दूर भेज दिया और कुछ कलयुग के एजेंट इसका फायदा उठाकर धन के लालच में उनको एक जगह इकट्ठा कर कसाई की गाडी में चढ़ा दिए ।
अब भला जब मनुष्य अपने लिए खुद गड्ढा खोद कर बैठा हुआ हो तो उसको कौन बचाये ।!
अब भी देरी नहीं हुई अगर प्रत्येक ग्रामीण हर गाँव में 2-4 उत्तम नस्ल के नंदी छोड़े और गाय-बैल को फिर से अपने जीवन साथी की तरह अपने घर में स्थान दें तो सब फिर से सूखी हो जायेंगे । उत्तम नस्ल के नंदी सुंदर गौवंश को जन्म देकर अधिक दूध देने वाली गौ वत्सा को जन्म देंगे ।
पहले नंदी दिनभर गावँ के मंदिर में पड़े रहते थे हम बच्चे लोग उसको वही रोटियां खिला आते थे । कुछ माताएं उसको वही घास डाल देती थी । शाम होते ही नंदी अपनी मस्त चाल से गावँ की सरहद में घूमने निकल जाता था। । पर अब 100 गाँवों में घूमने पर भी एक-दो नंदी नहीं दिखते । क्योकि लोगो ने उसे चारा डालना बंद कर दिया है । कुछ नंदी यदा-कदा गाँवों के हाट- बाजारों में दिखते है क्योंकि वहां उनको कुछ दुकानदारों द्वारा फैंक सब्जियों के बचे डंठल आदि मिलता है । और बाकी पोलोथि खाकर जीवन यापन कर रहे है और असमय मृत्य के इंतजार में दिखते है ।
क्या कर दिया है न हमारी आधुनिकता ने ! बाजार बाद ने ! पश्चिम संस्कृति के अपनाने से !!
आ फिर लौट चलें ---
नयाल सनातनी" सर्वदलीय गौरक्षा मंच

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