Monday, October 17, 2016

संत के विचार !
कभी मेरा अहंकार मुझे दुसरो की सच्ची बात भी मानने से रोकता था और हर किसी को गलत साबित करने में ही मैं अपनी विद्द्वत्ता समझता था । मुझसे बड़ा ज्ञानी कोई नहीं यह अहंकार मेरे अंदर घर बना कर रहता था । पर प्रभु कृपा से एक दिन ऐसा आया मैं इस महां दोष से मुक्त हुआ । आज में सबकी बात सुनता हूँ, सोचता हूँ फिर अपने अहंकार रुपी रावण को दूर रख कर राम रुपी आदर्श सोच से विचार कर आखिर मे सबका मंगल चाहता हूँ । सायद यही मेरे पूर्व के पाप कर्म रुपी दोषों को पूण्य में बदलने का मार्ग हो ।
नयाल सनातनी

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