मैंने रावण नहीं जलाया !
जब मैंने झाँका अपने अंतर मन में !
ना रावण सा में भगवान आशुतोष शिव का अनन्य भक्त बन पाया हूँ ! न रावण सा तपस्वी योद्धा । जिसने शिव को पाया अपनी तपस्या से श्री राम को पाया अपनी मुक्ति से ।
मेरी हैसियत नहीं की मैं रावण के पुतले को अग्नि देता मैं न ही रावण सा दानी जो अपना एक सिर भी नहीं चढ़ा सकता जबकि रावण 10 सिर चढ़ा कर भी अपने संकल्प से टस से मस नहीं हुआ !
ना ही रावण सा विद्द्वान जो भगवान श्री राम को भी मजबूर कर दें कि मंदिर बना कर पूजा को उसे ही बुलाना पड़ा !
रावण में एक ही अवगुण था उसे अहंकार बहुत था । होगा क्यों नहीं उस समय का सबसे बड़ा धनाढ्य रावण था जिसके घर के ईट- पत्थर और दरवाजे भी सोने हीरे मोती-जवाहरात के थे । क्या आज अगर इतना धन मेरे-आप के पास होता ! तो रावण से कम अहंकारी होते !
क्या आज किसी अमीर के घर पर कोई महिला कई महीने उसके रहमो कर्मो पर रहे वह याचना करेगा की मेरे से विवाह कर ले मैं समझता हूँ नहीं आज का रावण जबदस्ती शादी कर लेता और नहीं मानने पर अनेक अत्याचार कर देता ।
रावण से बलवान, बुद्धिवान,ज्ञानवान, सुन्दर सुडौल शरीर जिसे देख देव लोक की अप्सराएं भी मोहित हो जाती थी ।
ऐसे अनेक अवगुण है आज के प्रत्येक मानव में है । पर फिर भी वह अपने अंदर के रावण को जलाने के बजाय उस महान विद्द्वान रावण के पुतले को जलाते है जिसने सिर्फ मुक्ति पाने के लिए भगवान राम से बैर लिया ।
विधि द्वारा मानव योनि मिलती ही इसलिए है इस संसार में की "पुनरिपी जननंम पुनरिपी मरणं" से मुक्ति मिल सके । पर क्या आज कोई भी मानव अपनी मुक्ति के लिए भगवान् से वैर ले सकता है ! या इतनी भक्ति भगवान की कर सकता है वह चाहे कितना भी बड़ा साधु- संत वर्त्तमान में हो !
उसकी मुक्ति हो सके ! उसकी भक्ति से भगवान वरदान दे दें ।
जब सीता जी अवतार भी नहीं ली थी तब वेदवती रूप में महान तप कर रही थी तब से जो श्राप रावण को मिला वेदवती द्वारा वह उसका प्राश्चित सिर्फ सीता जी के हरण और श्री राम के हाथों मरण से ही मुक्ति का मार्ग एक मात्र था । इतना ज्ञानी और तीनों लोकों की बातों को जानने वाला रावण सब जानता था कि भीभीषण ने तपश्या रत होकर अपने लिए वरदान स्वरुप शिव से अखंड राज माँगा है कुंभकर्ण-रावण ने राम के हाथों मुक्ति । भीभीषण आज भी मुक्त नहीं हो पाए जबकि रावण ने अपने पूरे कुल को लाखों वर्ष पूर्व "श्री हरि" के लोक में पंहुचा दिया । हम अपने परिवार के एक सदस्य की मौत पर भयंकर दुःख से दीवाने हो जाते है दहाड़े मार-मार के रोते है जबकि रावण ने अपने समस्त परिवार के वीरो को भी मरवा दिता ताकि वे भी रावण की तरह मुक्त हो कर "श्री हरि" के धाम में स्थान पा जाएं !
हमारे महान पीएम साहब ने कल लखनऊ में रावण का पुतला न जलाकर यह शिद्द किया कि वे सच में ज्ञानी है और सही लोगों से अब मार्गदर्शित है ।
फिर आप ही बताओं क्या मैं रावण का पुतला जलाने का अधिकारी हूँ ।
मैंने रावण का पुतला नहीं जला कर ठीक किया ना !
आपकी आप जानो पर मैंने अपने जीवन काल में आज तक कभी रावण का पुतला न जलाया न ही इस काम में कभी सहयोगी बना आगे बुद्दि में बैठ का माँ शारदे क्या खेल- खेलती है यह नहीं जानता !
मेरा दावा है ! राम तो हम कभी बन नहीं सकते पर रावण भी बन जाय आज का मानव तो वह कभी अपने स्वरुप का पुतला नहीं जलायेगा !
मेरा मानना है कि हर वर्ष विजयदशमी के दिन जगह- जगह सामूहिक रूप से अपने अहंकार को जलाने की परंपरा डालनी चाहिए !
जिसमें हम सभी को एक, दूसरे-तीसरे को हाथ जोड़ कर अपने किये अब तक के अपराधों के लिए माफ़ी मांगना चाहिए । ताकि हम दूसरे ही दिन से फूल की तरह हलके होकर भगवान को चढ़ने लायक हो जाये । बर्ना भगावन जिस सुगन्ध की तलाश में भारत भूमि में आते है वह सुगन्ध उनको कभी नहीं मिलेगी !
भगवान तो फूलो की तरह ही अभिमान रहित मानव के माथे को चूमते है और सुगन्ध लेते है । उसी तरह जिस तरह सच्ची मेहनत करके घर आये बेटे के माथे को माँ चूम लेती है ।
बर्ना सोना- हीरे आदि लाख कीमती हो खुशबु नहीं देते खुशबु तो भगवान एक पैसे के फूल का ही लेते है । समझदार को इसारा काफी ।
किसी के मन में यह बात न जचे तो उससे भी क्षमा !
"नयाल सनातनी" गौ चरणों का दास
राम राज्य वादी चिंतक-विचारक
जब मैंने झाँका अपने अंतर मन में !
ना रावण सा में भगवान आशुतोष शिव का अनन्य भक्त बन पाया हूँ ! न रावण सा तपस्वी योद्धा । जिसने शिव को पाया अपनी तपस्या से श्री राम को पाया अपनी मुक्ति से ।
मेरी हैसियत नहीं की मैं रावण के पुतले को अग्नि देता मैं न ही रावण सा दानी जो अपना एक सिर भी नहीं चढ़ा सकता जबकि रावण 10 सिर चढ़ा कर भी अपने संकल्प से टस से मस नहीं हुआ !
ना ही रावण सा विद्द्वान जो भगवान श्री राम को भी मजबूर कर दें कि मंदिर बना कर पूजा को उसे ही बुलाना पड़ा !
रावण में एक ही अवगुण था उसे अहंकार बहुत था । होगा क्यों नहीं उस समय का सबसे बड़ा धनाढ्य रावण था जिसके घर के ईट- पत्थर और दरवाजे भी सोने हीरे मोती-जवाहरात के थे । क्या आज अगर इतना धन मेरे-आप के पास होता ! तो रावण से कम अहंकारी होते !
क्या आज किसी अमीर के घर पर कोई महिला कई महीने उसके रहमो कर्मो पर रहे वह याचना करेगा की मेरे से विवाह कर ले मैं समझता हूँ नहीं आज का रावण जबदस्ती शादी कर लेता और नहीं मानने पर अनेक अत्याचार कर देता ।
रावण से बलवान, बुद्धिवान,ज्ञानवान, सुन्दर सुडौल शरीर जिसे देख देव लोक की अप्सराएं भी मोहित हो जाती थी ।
ऐसे अनेक अवगुण है आज के प्रत्येक मानव में है । पर फिर भी वह अपने अंदर के रावण को जलाने के बजाय उस महान विद्द्वान रावण के पुतले को जलाते है जिसने सिर्फ मुक्ति पाने के लिए भगवान राम से बैर लिया ।
विधि द्वारा मानव योनि मिलती ही इसलिए है इस संसार में की "पुनरिपी जननंम पुनरिपी मरणं" से मुक्ति मिल सके । पर क्या आज कोई भी मानव अपनी मुक्ति के लिए भगवान् से वैर ले सकता है ! या इतनी भक्ति भगवान की कर सकता है वह चाहे कितना भी बड़ा साधु- संत वर्त्तमान में हो !
उसकी मुक्ति हो सके ! उसकी भक्ति से भगवान वरदान दे दें ।
जब सीता जी अवतार भी नहीं ली थी तब वेदवती रूप में महान तप कर रही थी तब से जो श्राप रावण को मिला वेदवती द्वारा वह उसका प्राश्चित सिर्फ सीता जी के हरण और श्री राम के हाथों मरण से ही मुक्ति का मार्ग एक मात्र था । इतना ज्ञानी और तीनों लोकों की बातों को जानने वाला रावण सब जानता था कि भीभीषण ने तपश्या रत होकर अपने लिए वरदान स्वरुप शिव से अखंड राज माँगा है कुंभकर्ण-रावण ने राम के हाथों मुक्ति । भीभीषण आज भी मुक्त नहीं हो पाए जबकि रावण ने अपने पूरे कुल को लाखों वर्ष पूर्व "श्री हरि" के लोक में पंहुचा दिया । हम अपने परिवार के एक सदस्य की मौत पर भयंकर दुःख से दीवाने हो जाते है दहाड़े मार-मार के रोते है जबकि रावण ने अपने समस्त परिवार के वीरो को भी मरवा दिता ताकि वे भी रावण की तरह मुक्त हो कर "श्री हरि" के धाम में स्थान पा जाएं !
हमारे महान पीएम साहब ने कल लखनऊ में रावण का पुतला न जलाकर यह शिद्द किया कि वे सच में ज्ञानी है और सही लोगों से अब मार्गदर्शित है ।
फिर आप ही बताओं क्या मैं रावण का पुतला जलाने का अधिकारी हूँ ।
मैंने रावण का पुतला नहीं जला कर ठीक किया ना !
आपकी आप जानो पर मैंने अपने जीवन काल में आज तक कभी रावण का पुतला न जलाया न ही इस काम में कभी सहयोगी बना आगे बुद्दि में बैठ का माँ शारदे क्या खेल- खेलती है यह नहीं जानता !
मेरा दावा है ! राम तो हम कभी बन नहीं सकते पर रावण भी बन जाय आज का मानव तो वह कभी अपने स्वरुप का पुतला नहीं जलायेगा !
मेरा मानना है कि हर वर्ष विजयदशमी के दिन जगह- जगह सामूहिक रूप से अपने अहंकार को जलाने की परंपरा डालनी चाहिए !
जिसमें हम सभी को एक, दूसरे-तीसरे को हाथ जोड़ कर अपने किये अब तक के अपराधों के लिए माफ़ी मांगना चाहिए । ताकि हम दूसरे ही दिन से फूल की तरह हलके होकर भगवान को चढ़ने लायक हो जाये । बर्ना भगावन जिस सुगन्ध की तलाश में भारत भूमि में आते है वह सुगन्ध उनको कभी नहीं मिलेगी !
भगवान तो फूलो की तरह ही अभिमान रहित मानव के माथे को चूमते है और सुगन्ध लेते है । उसी तरह जिस तरह सच्ची मेहनत करके घर आये बेटे के माथे को माँ चूम लेती है ।
बर्ना सोना- हीरे आदि लाख कीमती हो खुशबु नहीं देते खुशबु तो भगवान एक पैसे के फूल का ही लेते है । समझदार को इसारा काफी ।
किसी के मन में यह बात न जचे तो उससे भी क्षमा !
"नयाल सनातनी" गौ चरणों का दास
राम राज्य वादी चिंतक-विचारक
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