सनातनी विचार !
मानव का कल्याण ब्रह्मा, विष्णु, महेश या गौमाता नहीं करती। मानव का कल्याण तो उसके अपने सत कर्म ही करते है .
इस लिए कहते है ( गायों के स्वामी ) गोस्वामी तुलसीदास जी राम चरित मानस में --
कर्म प्रधान विश्व रची राखा जो जस करही तस फल चाखा..
एक ब्राहमण देवता थे अनेक यज्ञं कीये हजारों कथा कीये खूब धर्म का प्रदर्शन किये अंत में नरक मिला पूछे यम-धर्मराज से येसा क्यों ?
यमराज बोले आपने अनेक यज्ञं किये हजारों कथा की पर सबका फल पहले ही ले लिया .आपने एक - एक कथा करने के लाखो रुपये वसूल किये यज्ञों में यजमान के समर्थ से अधिक दक्षिणा वसूल की और उस वसूल किये धन से कोई भी अपने कल्याण के लिए अनुष्ठान नहीं किया आपको समय भी कहाँ था दूसरो के भाग्य जगाने के आलावा परमात्मा के कार्य के लिए ? अब पस्ताये होत क्या ? जाओं फिर 84 के फेरो में यहाँ कोई रिसवत नहीं चलती .........
मानव का कल्याण ब्रह्मा, विष्णु, महेश या गौमाता नहीं करती। मानव का कल्याण तो उसके अपने सत कर्म ही करते है .
इस लिए कहते है ( गायों के स्वामी ) गोस्वामी तुलसीदास जी राम चरित मानस में --
कर्म प्रधान विश्व रची राखा जो जस करही तस फल चाखा..
एक ब्राहमण देवता थे अनेक यज्ञं कीये हजारों कथा कीये खूब धर्म का प्रदर्शन किये अंत में नरक मिला पूछे यम-धर्मराज से येसा क्यों ?
यमराज बोले आपने अनेक यज्ञं किये हजारों कथा की पर सबका फल पहले ही ले लिया .आपने एक - एक कथा करने के लाखो रुपये वसूल किये यज्ञों में यजमान के समर्थ से अधिक दक्षिणा वसूल की और उस वसूल किये धन से कोई भी अपने कल्याण के लिए अनुष्ठान नहीं किया आपको समय भी कहाँ था दूसरो के भाग्य जगाने के आलावा परमात्मा के कार्य के लिए ? अब पस्ताये होत क्या ? जाओं फिर 84 के फेरो में यहाँ कोई रिसवत नहीं चलती .........
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