सनातनी विचार !
कितना भी बड़ा विद्द्वान क्यों न हो या उच्च कुल का कुलीन क्यों न हो ? करनी और कथनी में अंतर एक न एक दिन मानव को पतन की राह पर धकेल ही देता है। अधिक जोर से अपनी बात को सिद्द करना या मैं बहुत बड़ा काम कर रहा हूँ यह दर्शाने का मतलब है कुछ दाल में कला है। ''मैं'' मानव का ही नहीं दानव का भी अंत कर देता है।
कितना भी बड़ा विद्द्वान क्यों न हो या उच्च कुल का कुलीन क्यों न हो ? करनी और कथनी में अंतर एक न एक दिन मानव को पतन की राह पर धकेल ही देता है। अधिक जोर से अपनी बात को सिद्द करना या मैं बहुत बड़ा काम कर रहा हूँ यह दर्शाने का मतलब है कुछ दाल में कला है। ''मैं'' मानव का ही नहीं दानव का भी अंत कर देता है।
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