सनातनी विचार !
एक मंदीर में रख्खी मूर्ति को अहंकार हो गया ! कहने लगी देखो लोग कितनी दूर-दूर से आ आकर मुझे शीश झुकाते हैं !
अभी मूर्ति अहंकार में फूल ही रही थी कि आकाश बोला-बावरी मनुष्य तुझे शीश नहीं झुकाते इन्हें तो अपनी श्रद्धा को दूर जाकर प्रणाम करने की आदत है।
आकाश फिर बोला अरे मूर्ति ये मानवों के घर पर 33 करोड़ देवो की मूर्ति गाय है उसको समय पर ये चारा तक नहीं देते ये सब स्वार्थी है --
इनको जो कुछ स्वीकार ना करें सिर्फ देता रहे ( देवता ) उसे प्रणाम करने की आदत है !
.''नयाल सनातनी''
एक मंदीर में रख्खी मूर्ति को अहंकार हो गया ! कहने लगी देखो लोग कितनी दूर-दूर से आ आकर मुझे शीश झुकाते हैं !
अभी मूर्ति अहंकार में फूल ही रही थी कि आकाश बोला-बावरी मनुष्य तुझे शीश नहीं झुकाते इन्हें तो अपनी श्रद्धा को दूर जाकर प्रणाम करने की आदत है।
आकाश फिर बोला अरे मूर्ति ये मानवों के घर पर 33 करोड़ देवो की मूर्ति गाय है उसको समय पर ये चारा तक नहीं देते ये सब स्वार्थी है --
इनको जो कुछ स्वीकार ना करें सिर्फ देता रहे ( देवता ) उसे प्रणाम करने की आदत है !
.''नयाल सनातनी''
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