सनातनी विचार !
सनातन सत्य !
शंकराचार्य ज्योतिष पीठ बद्रिकाश्रम के अनुसार आज से 1 करोड़ 62 लाख 84 हजार वर्ष पूर्व श्री राम जो राम राज्य की स्थापना किये। उनकी सत्ता इस धरा धाम पर थी।
तब भगवान श्री राम ने एक दिन अपने कुलगुरु वशिष्ठ महामुनि से एक प्रसन्न पूछा !
हे महामुनि ! हे कुलगुरु ! सनातन धर्म की व्याख्या कीजिये ? तब सम्पूर्ण वेद-शास्त्रों के जानकार वशिष्ठ महामुनि ने कहाँ।
हे राम आप सर्वग्य है, सब जानते है पर शायद अपने कुल गुरु को ईतिहास में सम्मान दिलाने ही यह प्रसन्न किये है। पर जब प्रसन्न पूछा है तो जबाब सुनो।
हे सर्वग्य श्री राजा राम ! हे मर्यादा पुरुषोत्तम ! सनातन धर्म की व्याख्या करने की मेरी सामर्थ नहीं है। ना ही मेरे पूर्वजों की थी। यह सनातन धर्म स्वयम्भू है ना इसे किसी ने बनाया, ना ही कोई बना सकता था। सनातन का मतलब ही है जो सदा था सदा रहेगा।
हे राम ! आप और हम रहे या ना रहें पर यह सनातन धर्म हमेशा रहेगा। वेद भी नेति-नेति करके इस ''सनातन धर्म'' की प्रसंसा करते है। पर व्याखया नहीं करते।
"असित गिरी समं स्यात, कज्जलं सिन्धु पात्रे,
सुरतरुवर शाखा, लेखनी पत्र मूर्वी।
लिखति यदि गृहीत्वा, शारदा सर्व कालं,
तदपि तव गुणानामीश! पारं ना याति।"
अर्थात -- हिमालय जैसे असीमित पर्वत के बराबर स्याही को समुद्र के पात्र में घोलकर देववृक्ष की शाखा की लेखनी बनाकर अनंत आकाश में यदि स्वयं ज्ञान की देवी सरस्वती भी कल्प कल्पांत तक यानी सदैव लिखती रहें तो भी शिव की महिमा का गुणगान लिखना संभव नहीं है ।
जिस तरह भगवान शिव की महिमा को कोई नहीं लिख सकता उसी तरह ''सनातन धर्म'' की गहराई नापने को कोई पैमाना नहीं है, ना होगा।
''नयाल सनातनी''
सनातन सत्य !
शंकराचार्य ज्योतिष पीठ बद्रिकाश्रम के अनुसार आज से 1 करोड़ 62 लाख 84 हजार वर्ष पूर्व श्री राम जो राम राज्य की स्थापना किये। उनकी सत्ता इस धरा धाम पर थी।
तब भगवान श्री राम ने एक दिन अपने कुलगुरु वशिष्ठ महामुनि से एक प्रसन्न पूछा !
हे महामुनि ! हे कुलगुरु ! सनातन धर्म की व्याख्या कीजिये ? तब सम्पूर्ण वेद-शास्त्रों के जानकार वशिष्ठ महामुनि ने कहाँ।
हे राम आप सर्वग्य है, सब जानते है पर शायद अपने कुल गुरु को ईतिहास में सम्मान दिलाने ही यह प्रसन्न किये है। पर जब प्रसन्न पूछा है तो जबाब सुनो।
हे सर्वग्य श्री राजा राम ! हे मर्यादा पुरुषोत्तम ! सनातन धर्म की व्याख्या करने की मेरी सामर्थ नहीं है। ना ही मेरे पूर्वजों की थी। यह सनातन धर्म स्वयम्भू है ना इसे किसी ने बनाया, ना ही कोई बना सकता था। सनातन का मतलब ही है जो सदा था सदा रहेगा।
हे राम ! आप और हम रहे या ना रहें पर यह सनातन धर्म हमेशा रहेगा। वेद भी नेति-नेति करके इस ''सनातन धर्म'' की प्रसंसा करते है। पर व्याखया नहीं करते।
"असित गिरी समं स्यात, कज्जलं सिन्धु पात्रे,
सुरतरुवर शाखा, लेखनी पत्र मूर्वी।
लिखति यदि गृहीत्वा, शारदा सर्व कालं,
तदपि तव गुणानामीश! पारं ना याति।"
अर्थात -- हिमालय जैसे असीमित पर्वत के बराबर स्याही को समुद्र के पात्र में घोलकर देववृक्ष की शाखा की लेखनी बनाकर अनंत आकाश में यदि स्वयं ज्ञान की देवी सरस्वती भी कल्प कल्पांत तक यानी सदैव लिखती रहें तो भी शिव की महिमा का गुणगान लिखना संभव नहीं है ।
जिस तरह भगवान शिव की महिमा को कोई नहीं लिख सकता उसी तरह ''सनातन धर्म'' की गहराई नापने को कोई पैमाना नहीं है, ना होगा।
''नयाल सनातनी''
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