Thursday, February 11, 2016

सनातनी विचार !
संसार में रहकर भी आप विरक्त हो सकते है विदेह हो सकते है !
एक साधु कह रहे थे यह संसार मिथ्या है, स्त्री, पुत्री छोड़ कर आत्म कल्याण की बात सोचनी चाहिए। जंगल की ओर चलना चाहिए। एक बालक ने पूछा-महात्मन् मैं कौन हूँ-साधु बोले-आत्मा। अच्छा तो अब यह बताइये लड़के ने पूछा- मेरी माँ मेरी सेवा सहायता करती है, मेरे हित की बात सोचती है क्या वह आत्म-कल्याण न हुआ ?
प्रवचन करता साधु को कोई उत्तर देते न बना। उनको समझ आ गया संसार खराब नहीं अपना दृष्टिकोण खराब होता है। उसे ठीक कर लिया जाये तो समाज में रहकर ही मुक्ति का आनन्द लिया जा सकता है।
''नयाल सनातनी''

No comments:

Post a Comment