Tuesday, February 23, 2016

सनातनी विचार !
किसी भी प्रकार के दान का थोडा होना या बहुत होना अभ्युदय का कारण नहीं होता ! अपितु श्रद्धा और शक्ति ही दान की वृद्धि और क्षय का कारण होती है । यदि कोई बिना श्रद्धा के अपना सर्वस्व दे दे अथवा अपना जीवन ही निछावर कर दे तो भी यह उसका फल नहीं पाता !
इसलिए दानी को श्रद्धालु होना चाहिए । श्रद्धा से ही धर्म का साधन किया जाता है, धन की बहुत बड़ी राशि से नहीं । अन्न दान देने का मतलब यह नहीं हम रुखा-सुखा भोजन परोषे !
शक्तिनुसार श्रदा से उत्तम भोजन कराने वाला ही अंत में उत्तम फल का भागी होता है ...
 ''नयाल सनातनी''

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