सनातनी विचार !
मानव जीवन का परम लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति है ! अनासक्ति परमात्मा तक ले जाती है आसक्ति शमशान से नरक की ओर !
वासना के उपक्रम में पड़कर महाराज ययाति असमय ही वृद्ध हो गये। उनकी इन्द्रियाँ शिथिल पड़ गई, पर मन में वासना का भूत नहीं उतरा, अतएव वे अपने पुत्रों से यौवन की याचना करने लगे। पहले तीन पुत्रों ने तो इनकार कर दिया पर चौथे पुत्र ने कहा-पिताजी मनुष्य संसार में इन्द्रिय सुख व भोगों के लिए नहीं आत्मोत्थान के लिए आया है। आप मेरा यौवन लेकर अपनी जरा मुझे सहर्ष दे दें। मैं थोड़े से सुख लेकर क्या करूँगा मुझे जीवन लक्ष्य अभीष्ट है सो उसके लिये वृद्ध शरीर से भी काम चल जायेगा।
पुत्र की इस अनासक्ति ने केवल अन्य भाइयों की ही नहीं वरन् ययाति की भी आँखें खोल दीं।
''नयाल सनातनी''
मानव जीवन का परम लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति है ! अनासक्ति परमात्मा तक ले जाती है आसक्ति शमशान से नरक की ओर !
वासना के उपक्रम में पड़कर महाराज ययाति असमय ही वृद्ध हो गये। उनकी इन्द्रियाँ शिथिल पड़ गई, पर मन में वासना का भूत नहीं उतरा, अतएव वे अपने पुत्रों से यौवन की याचना करने लगे। पहले तीन पुत्रों ने तो इनकार कर दिया पर चौथे पुत्र ने कहा-पिताजी मनुष्य संसार में इन्द्रिय सुख व भोगों के लिए नहीं आत्मोत्थान के लिए आया है। आप मेरा यौवन लेकर अपनी जरा मुझे सहर्ष दे दें। मैं थोड़े से सुख लेकर क्या करूँगा मुझे जीवन लक्ष्य अभीष्ट है सो उसके लिये वृद्ध शरीर से भी काम चल जायेगा।
पुत्र की इस अनासक्ति ने केवल अन्य भाइयों की ही नहीं वरन् ययाति की भी आँखें खोल दीं।
''नयाल सनातनी''
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