Thursday, February 11, 2016

सनातन सत्य विचार !
महर्षि मनु की सन्तान मानव जाती के कल्याण के लिए सम्पूर्ण वेद-शास्त्रों का सार !
सहज मृत्यु हो या अकाल मृत्यु मुक्ति हेतु ''श्रीमद् भागवत कथा'' अन्तिम विकल्प !!
श्रीमद भागवत महापुराण 'सनातन हिन्दू धर्म' के 18 पुराणों का मुकुट मणि है। जिसमे भगवान योगी-महा-योगेश्व श्री कृष्ण भगवान की प्राप्ति एवं भक्ति-ज्ञान-वैराग्य और मुक्ति के सरल शाधनों को चारों वेदो की सहायता से सूक्ष्म रूप में भगवान वेद व्यास ने विशाल बुद्दी वाले श्री गणेश की लेखनी की मदद से सहज ही रूपांतरित कर दिया है। जो 'जीव' एक बार ''श्रीमद् भागवत'' का आश्रय ले-लेता है, उसे फिर भक्ति एवं मुक्ति के लिए फटकना नहीं पड़ता।
महाज्ञानी ''गाय के पुत्र गोकर्ण'' ने इस 'महापुराण' में नारद जी ने यही कथा में यह सिद्द किया है जब जीव के गंगा में अस्ति विषर्जन से, 13 दिनों तक पवित्र नदी के तट पर पिंड दान से, एक वर्ष तक विभिन्न श्राद कर्मों से, अनेको प्रकार तिर्थादी एवं अन्य श्राद कर्मों से, अनेको प्रकार के दानादि कर्मो से, अनेको ब्राह्मण-यतियों के भोजन से, गया में श्राद एवं पिंड दान से भी जिस प्रेत आत्मा की मुक्ति नहीं होती उसको किसी 'विद्द्वान वेदपाठी भागवत वक्ता' से अंतिम विकल्प के रूप में ''श्रीमद् भागवत कथा'' सुनानी चाहिए। तब निश्चित ही जीव मुक्त होकर गौलोक धाम चला जाता है। फिर उसे इस 84 लाख योनियों के चक्कर में नहीं आना पड़ता उसे 'पुनर्पि जन्मम पुनर्पि मरणम' से मुक्ति मिल जाती है। यही सनातन सत्य है। यही अमर कथा भगवान शिव ने अमरनाथ में भगवती शिवा को सुनाई थी जिसे एक सुक ने सुनी और सुखदेव नाम से विख्यात होकर श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम वक्ता-श्रोता हुए। और महायोगी सुखदेवजी ने यह कथा प्रथम बार मृत्यु के द्वार पर खड़े राजा परीक्षित को सुनाई जो अंत में भगवान में ही बिलीन हो गए। भगवान नारायण के ही अंस श्री नारदजी ने यही कथा जवान भक्ति के बूढ़े पुत्र ज्ञान एवं वैराग्य को सुनाई थी जो फिर से जवान हो गए , सरांस यह है जिसने भी यह अमर फल खाया वही अमर हो गया,मुक्त हो गया -------
''नयाल सनातनी'' स्वामी करपात्री जी महाराज का अनुयाई
संस्थापक अध्यक्ष ;--- ''सर्वदलीय गौरक्षा मंच''

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