Thursday, February 11, 2016

सनातनी विचार !
अहिंसा परमो धर्मः ! जो व्यक्ति हिंसा में प्रवृत्त होता है, उसका सारा धर्म नष्ट हो जाता है। हे मानव ! पुराणों में विद्द्वानो ने जीव-हिंसा छः प्रकार के बताये है। पहला हिंसक वह जो हिंसा का अनुमोदन करता है, यानि हिंसा करो कह कर लोगो को गलत राह की ओर भटकाता है। दूसरा हिंसक वह है जीव को मारता है। तीसरा हिंसक वह है जो विश्वास पैदा करके जीवो को फंसाता है। मारे गए जीव का मांस खाने वाला चौथा हिंसक है। उस मांस को पकाकर तैयार करने वाला पाँचवाँ हिंसक है। हे मानव ! जो उस मांस का बटवारा करता है वह छठा हिंसक है। क्रमशः ये एक के बाद एक बड़े हिंसक है, इन हिंसक प्रवृत्ति से बचकर ही श्रीमन-नारायण की शरणागति प्राप्त होती है बर्ना लाखों जन्म लेने पर भी भगवत भक्ति दुर्लभ ही मानना चाहिए जीव को ।
''नयाल सनातनी''

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